मोदी को हटाने की कवायद और विकल्पहीनता का संकट

मोदी को हटा पाना आसान नहीं है। जितनी जनविरोधी ताकते हैं, सब मोदी के साथ हैं। ...

अतिथि लेखक
मोदी को हटाने की कवायद और विकल्पहीनता का संकट

          - मनोज कुमार झा

वर्तमान मोदी सरकार के हर मोर्चे पर फेल हो जाने के बावजूद ऐसा लगता है कि विकल्पहीनता का संकट बना हुआ है। भूलना नहीं होगा कि मोदी विकल्पहीनता के शून्य में ही उभर कर सामने आए थे। उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के प्रति लोगों के मन में भारी गुस्सा था। तरहर-तरह के घोटालों में सरकार फंसी हुई थी। अर्थव्यवस्था की गति मंद पड़ चुकी थी। वामपंथियों ने बहुत पहले ही सरकार को समर्थन देना बंद कर दिया था। यही नहीं, यूपीए सरकार की विफलता के साथ ही क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों की ताकत में भी कमी आई थी। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत बढ़ाती चली गई।

खास बात यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा में नये नेतृत्व को उभारना शुरू कर दिया था। आडवाणी जैसे नेताओं को पहले ही ठिकाने लगा दिया गया था। उनके पाकिस्तान जा कर जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ाने के विवाद ने एक तरह से उनका राजनीतिक करियर ही खत्म कर दिया, यद्यपि वे हिंदुत्व के आर्किटेक्ट माने जाते थे और राममंदिर का आंदोलन चला कर भाजपा को सत्ता में लाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। पर संघ के नेतृत्व ने उन्हें किनारे कर दिया और उनकी जगह गुजरात दंगों के मास्टरमाइंड नरेंद्र मोदी और अमित शाह को मुख्य भूमिका दे दी। इसके पीछे वजह ये रही कि ये बुद्धिहीन और मवाली किस्म के लोग हैं, जबकि आडवाणी पुराने संस्कारों के मर्यादित व्यक्ति हैं, वे खुल कर नंगई पर नहीं उतर सकते थे। पर मोदी और अमित शाह सिरे से मर्यादाविहीन हैं। इनका कोई चरित्र नहीं है। झूठ बोलने और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने में इनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। इसके अलावा साजिशें रचने में भी ये अव्वल रह चुके हैं। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी पर अमित शाह के सहयोग से जैसा नरसंहार करवाने के आरोप हैं, उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता। आजाद भारत में इससे बड़ा दूसरा नरसंहार कोई नहीं हुआ। बहरहाल, इनके इन्हीं गुणों को देखते हुए संघ नेतृत्व ने कमान इनके हाथों में सौंपना सही समझा, क्योंकि आडवाणी जैसे नेता नरेंद्र मोदी के स्तर पर नहीं उतर सकते थे। 

यूपीए सरकार के दौरान ही देश के बड़े पूंजीपति जिनमें अंबानी, अडानी और टाटा तक शामिल थे, मोदी से जाकर मिल चुके थे और उनसे प्रधानमंत्री बनने का आग्रह किया था। उन्हें पता था कि कांग्रेस के खिलाफ जैसा जन असंतोष है, उसे देखते हुए सरकार जा सकती है और फिर भाजपा ही सत्ता में आएगी। ये पूंजीपति समझ चुके थे कि नरेंद्र मोदी अनपढ़ और बुद्धिहीन है, इसलिए इससे अपने हित के काम करना आसान होगा, जबकि कोई दमदार व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री बना तो वह उनकी हर बात नहीं मानेगा। इन पूंजीपतियों ने संघ नेतृत्व से साफ-साप कहा कि यदि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा, तभी वे भाजपा को चुनाव जितने के लिए अपना खजाना खोलेंगे। हुआ भी वही। अंदरूनी विरोध के बावजूद संघ ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया और परिस्थितियां ऐसी बनीं कि भाजपा की जीत हुई।

मोदी प्रधानमंत्री बन गए। इसके बाद इस ‘चायवाले’ ने जो कारगुजारियां की, वो भला कौन नहीं जानता है। अब सभी त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे हैं। मोदी जहां जाते हैं, तमाशा कर जनता को लुभाने की कोशिश करते हैं। पहले लोग इनकी बातों में आ जाते थे, पर अब सब समझने लगे हैं कि ये आदमी मदारी है, जोकर है, इसके पास अपनी कोई नीति नहीं है, यह सिर्फ अपने पूंजीपति आकाओं के इशारे पर काम करता है। महंगाई, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध और अल्पसंख्यकों की जान को हमेशा खतरा देख कर आम जनता किसी भी हाल में भाजपा सरकार और मोदी से मुक्ति चाहती है, पर सवाल है कि कैसे।

मोदी को हटा पाना आसान नहीं है। जितनी जनविरोधी ताकते हैं, सब मोदी के साथ हैं। रहा सवाल विकल्प की शक्तियों का, तो वे कहीं भी सरजमीं पर दिखाई नहीं पड़ रहीं।

भाजपा के बरक्स कांग्रेस ही राष्ट्रीय स्तर की एकमात्र पार्टी है, बाकी क्षेत्रीय दल हैं जिनकी हालत अभी बहुत खराब है। तमाम बड़े राज्यों में भाजपा सत्ता में है। आम चुनाव होने में अब ज्यादा समय नहीं रह गया है। पर कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों की कोई तैयारी नहीं दिखाई पड़ती। कांग्रेस में ऐसा नेतृत्व उभरता नहीं दिखता जो मोदी को चुनौती दे सके।

राहुल गांधी और उनकी मंडली चुनावों के लिहाज से बहुत कमजोर दिखती है। फिर जन असंतोष से मोदी का क्या बिगड़ने वाला है। मोदी और उनकी मंडली रोज ही नये-नये शिगूफे छोड़ कर बुद्धिजीवियों और जनता को भ्रम में डाल रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी ने नोटबंदी कर अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई आने वाले दिनों में कोई सरकार नहीं कर सकेगी। रिजर्व बैंक का नोटबंदी को लेकर जो आकलन आया है, उससे साफ है कि यह कितना बड़ा आत्मघाती कदम था।

जीएसटी लागू करने से व्यवसायियों को जो नुकसान हुआ है और जितने बड़े पैमाने पर लोगों का रोजगार छिना है, वह भी अभूतपूर्व है। सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को जितना नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है, उसके बारे में सभी जानते हैं।

स्वतंत्र भारत में यह पहली सरकार आई है जो हर स्तर पर जनता की दुश्मन है। पर मोदी की जगह कौन, यह है यक्ष प्रश्न। इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है। कांग्रेस अभी तक पता नहीं किस खामख्याली में है और दूसरे दल भी किस कुंभकर्णी निद्रा में डूबे हैं, कहना मुश्किल है। बहरहाल, अगर दोबारा भाजपा सत्ता में आ गई और नरेंद्र मोदी की जगह कोई दूसरा भी प्रधानमंत्री संघ ने बनवाया तो क्या होगा, इसकी कल्पना भी कर पाना आसान नहीं है। यह कांग्रेस के लिए भी जीवन-मरण का प्रश्न होगा और विपक्ष के लिए भी।

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