एक शिकंजा है जाति

वोट बैंक राजनीति के चक्कर में पड़ गई अंबेडकरवादी पार्टियों को अब वास्तव में इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उन का क्या होगा।...

हाइलाइट्स

डॉ.अंबेडकर के अनुसार, हर समाज का वर्गीकरण और उप वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे सांचों में फिट हो जाता है कि एक दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं। यही जाति का शिकंजा है और इसे खत्म किये बिना कोई तरक्की नहीं हो सकती। सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बंटा हुआ था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह वर्गीकरण मूलरूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था। एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हजारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक दूसरे वर्ग में आने-जाने की रीति खत्म हो गई। और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा।

शेष नारायण सिंह

डॉ.अंबेडकर के निर्वाण को साठ साल से ऊपर हो गए। इस मौके पर उनको हर साल याद किया जाता  है, इस साल भी किया जाएगा। इस अवसर पर है कि उनकी सोच और दर्शन के सबसे अहम पहलू पर गौर किया जाए। सब को मालूम है कि डॉ. अंबेडकर के दर्शन ने 20वीं सदी के भारत के राजनीतिक आचरण को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। लेकिन उनके दर्शन की सबसे खास बात पर जानकारी की भारी कमी है। शायद ऐसा इसलिए है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले उन्हीं बातों को प्रचारित करते हंै जो उनको अपने स्वार्थ के हिसाब से उपयोगी लगती हैं। आम अवधारणा यह है कि बाबा साहेब जाति व्यवस्था के खिलाफथे। यह सच है लेकिन इतना ही सच नहीं है। और  भी बहुत कुछ है। मसलन डॉ. साहब मानते थे कि  जाति की व्यवस्था शताब्दियों की साजाश का नतीजा है और उसका खात्मा सामाजिक विकास की एक शर्त है। अंबेडकर ने कहा था कि जब तक अंतरजातीय शादी-ब्याह नहीं होंगे, तब तक बात बनने वाली नहीं है, जाति प्रथा को तोड़ना नामुमकिन होगा। सहविवाह और सहभोजन बहुत है।

अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर न होते !

डॉ. अंबेडकर के दर्शन में इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो देश के हर नागरिक को जानना चाहिए।  उनके दर्शनशास्त्र की कई बातों के बारे में ज़्यादातर लोग अन्धकार में हैं। उन्हीं कुछ बातों का करना आज के दिन सही रहेगा।

डॉ. अंबेडकर को इतिहास एक ऐसे राजनीतिक चिन्तक के रूप में याद रखेगा जिन्होंने जाति के विनाश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की बुनियाद माना था। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली पार्टी की नेता आज जाति की संस्था को संभाल कर रखना चाहती है, उसके विनाश में उनकी कोई रुचि नहीं है।

वोट बैंक राजनीति के चक्कर में पड़ गई अंबेडकरवादी पार्टियों को अब वास्तव में इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उन का क्या होगा। डॉ. अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांतियां भी हैं। कांशीराम और मायावती ने इस कदर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस्था का मनु ने ही फैलाया था, वही इसके संस्थापक थे और मनु की सोच को खत्म कर देने मात्र से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बाबा साहेब ऐसा नहीं मानते थे। उनके एक बहुचर्चित और अकादमिक भाषण के हवाले से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस्था की सारी बुराइयों के लिए मनु को ही नहीं ठहराया जा सकता। मनु के बारे में उन्होंने कहा कि अगर कभी मनु रहे भी होंगे तो बहुत ही हिम्मती रहे होंगे। डॉ. अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यक्ति बना दे और बाकी पूरा समाज उसको स्वीकार कर ले। उनके अनुसार इस बात की कल्पना करना भी बेमतलब है कि कोई एक आदमी कानून बना देगा और पीढ़ियां दर पीढ़ियां उसको मानती रहेंगी।

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हां, इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मनु नाम के कोई तानाशाह रहे होंगे जिनकी ताकत के नीचे पूरी आबादी दबी रही होगी और वे जो कह देंगे, उसे सब मान लेंगे और उन लोगों की आने वाली नस्लें भी उसे मानती रहेंगी। उन्होंने कहा कि, मैं इस बात को जोर दे कर कहना चाहता हूं कि मनु ने जाति की व्यवस्था की स्थापना नहीं की क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं थी।  मनु के जन्म के पहले भी जाति की व्यवस्था कायम थी।  मनु का योगदान बस इतना है कि उन्होंने इसे एक दार्शनिक आधार दिया। जहां तक हिन्दू समाज के स्वरूप  और उसमें जाति के महत्व की बात है, वह मनु की हैसियत के बाहर था और उन्होंने वर्तमान हिन्दू समाज की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभाई। उनका योगदान बस इतना ही है उन्होंने जाति को एक धर्म के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।  जाति का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक आदमी, चाहे वह जितना ही बड़ा ज्ञाता या शातिर हो, संभाल ही नहीं सकता। इसी तरह से यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि ब्राह्मणों ने जाति की संस्था की स्थापना की। मेरा मानना है कि ब्राह्मणों ने बहुत सारे गलत काम किये हैं लेकिन उनकी औकात यह कभी नहीं थी कि वे पूरे समाज पर जाति व्यवस्था को थोप सकते।

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बाबा साहेब ने अपने इसी भाषण में एक चेतावनी और दी थी कि उपदेश देने से जाति की स्थापना नहीं हुई थी और इसको खत्म भी उपदेश के नहीं किया जा सकता। इस बात में दो राय नहीं है कि डॉ. अंबेडकर पर अपने पहले के महान समाजसुधारक, ज्योतिबा फुले का बड़ा प्रभाव था। उन्हें यह पूरा विश्वास था कि जाति प्रथा को किसी व्यक्ति से जोड़ कर उसकी तार्किक परिणति तक नहीं ले जाया जा सकता। कहीं ऐसा न हो कि केवल मनु को लक्ष्य करने के चक्कर में  मनु के विचार तो खत्म हो जाएं लेकिन जाति प्रथा ज्यों की त्यों बनी रह जाये। जाति प्रथा का खात्मा जरूरी है लेकिन अगर केवल मनु को टारगेट किया जाता रहा तो बात बनेगी नहीं। पूरे सिस्टम पर हमला करना पड़ेगा।

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डॉ. अंबेडकर के अनुसार, हर समाज का वर्गीकरण और उप वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे सांचों में फिट हो जाता है कि एक दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं। यही जाति का शिकंजा है और इसे खत्म किये बिना कोई तरक्की नहीं हो सकती। सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बंटा हुआ था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह वर्गीकरण मूलरूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था। एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हजारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक दूसरे वर्ग में आने-जाने की रीति खत्म हो गई। और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा। अगर आर्थिक विकास की गति को तेज किया जाय और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराये जाएं तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा। और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा। अगर ऐसा हुआ तो जाति के  विनाश के ज्योतिबा फुले, डॉ. राम मनोहर लोहिया और डॉ. अम्बेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा।

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