औरतों के लिए नहीं है यह मुल्क : प्रेम करने के अधिकार पर डाका

जसमंद की घटना, पहली ऐसी घटना नहीं है, जब मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के इतने भयावह नतीजे हुए हों। मुसलमानों को बदनाम करने और उनके दानवीकरण का सुनियोजित अभियान लंबे समय से जारी है।...

नेहा दाभाड़े
हाइलाइट्स

किसी भी समुदाय को इस प्रकार निशाना बनाया जाना घोर निंदनीय है परंतु इसके साथ-साथ, हमें इस प्रश्न पर भी विचार करना होगा कि इस तरह के अभियानों का महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है।

नेहा दाभाड़े

हाल में राजस्थान के राजसंमद में, शम्भूलाल रैगर नामक एक व्यक्ति ने पश्चिम बंगाल के मालदा से वहां आए एक प्रवासी मजदूर मोहम्मद अफराजुल की उसके ही औजारों से नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी और उसकी देह को जला दिया। इस  खौफनाक जुर्म को रैगर के चैदह साल के भतीजे ने कैमरे में कैद किया और इसका वीडियो, सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। इस वीडियो में रैगर, अपने जुर्म को औचित्यपूर्ण ठहराते हुए कहता है कि वह हिन्दू महिलाओं की लव जिहाद से ‘रक्षा‘ कर रहा है और यदि अन्य मुस्लिम पुरूष भी लव जिहाद करेंगे, तो उनका भी यही हाल होगा। पुलिस की जांच में यह सामने आया कि 48 वर्षीय अफराजुल ने किसी हिन्दू महिला से शादी नहीं की थी। इस नृशंस हत्या ने मुसलमानों को निशाना बनाने, उनके खिलाफ नफरत फैलाने और उनके अधिकारों पर डाका डालने जैसे मुद्दों को एक बार फिर केन्द्र में ला दिया है। इस सिलसिले में लव जिहाद पर चर्चा भी जरूरी है, जो इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श पर छाया हुआ है।

लव जिहाद शब्द हिन्दू श्रेष्ठतावादियों की देन है, जिनका यह आरोप है कि मुसलमान पुरूष, हिन्दू स्त्रियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनसे विवाह करते हैं और फिर उन्हें मुसलमान बना लेते हैं। राजसमंद की घटना, पहली ऐसी घटना नहीं है, जब मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के इतने भयावह नतीजे हुए हों। मुसलमानों को बदनाम करने और उनके दानवीकरण का सुनियोजित अभियान लंबे समय से जारी है।

किसी भी समुदाय को इस प्रकार निशाना बनाया जाना घोर निंदनीय है परंतु इसके साथ-साथ, हमें इस प्रश्न पर भी विचार करना होगा कि इस तरह के अभियानों का महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता पर क्या प्रभाव पड़ता है। हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का जहर बुझा अभियान, मुसलमानों की कामलिप्सा को केन्द्र में रखता है और इसके धुंधलके में कई महत्वपूर्ण मुद्दे नजरों से गायब हो जाते हैं। इनमें शामिल हैं खाप पंचायतों द्वारा प्रायोजित और प्रेरित आनर किलिंग्स, सार्वजनिक स्थानों पर पुरूषों के साथ देखे जाने पर महिलाओं की पिटाई और उन्हें केवल बच्चे पैदा करने की मशीन के रूप में देखा जाना, जिनका एकमात्र कार्य राष्ट्र की खातिर अमुक संख्या में बच्चे पैदा करना है।

महिला आंदोलनों और साम्प्रदायिकता पर केन्द्रित साहित्य में ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण है, जब महिलाओं की देह को समुदाय के सम्मान के साथ जोड़ा गया और दूसरे समुदाय को नीचा दिखाने के लिए उसकी महिलाओं के साथ ज्यादती को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। परंतु हमें यह समझना होगा कि अब महिलाओं के विरूद्ध यौन और शारीरिक हिंसा केवल साम्प्रदायिक दंगों तक सीमित नहीं रह गई है। अब इतने बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते जिनमें सैकड़ों या हजारों लोग मारे जाएं।

साम्प्रदायिक तत्व अब समाज के नजरिए को इस तरह से बदलने पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, जिससे दूसरे समुदाय के साथ दुर्व्यवहार या हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा सके और लैंगिक असमानता को स्वाभाविक और प्राकृतिक सिद्ध किया जा सके। हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने महिलाओं को पुरूषों के अधीन रखने के लिए कई तरीके और रणनीतियां अपनाई हैं। वे केवल अपनी महिलाओं को ही पराधीन नहीं रखना चाहते, वरन् दूसरे समुदाय की महिलाओं का भी दमन करना चाहते हैं। इसका एक हिस्सा है महिलाओं के प्रेम करने और अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को सीमित या समाप्त करना। लव जिहाद इसी की रणनीति है। लव जिहाद, साम्प्रदायिक विमर्श का भाग है जिसका लक्ष्य महिलाओं से उनके जीवन और उनकी देह पर उनके अधिकार को छीनना और उन पर पितृसत्तात्मकता लादना है।

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आज हिन्दू श्रेष्ठतावादी तरह-तरह के तरीकों से पितृसत्तात्मकता को बढ़ावा दे रहे हैं। दिलचस्प यह है कि वे यह सब  ‘हिन्दू महिलाओं की रक्षा‘ के नाम कर कर रहे हैं और उन्हें राज्य का अपरोक्ष समर्थन प्राप्त है। वे महिलाओं के अधिकार सीमित करना और उन्हें पुरूषों के अधीन रखना चाहते हैं।

इस सिलसिले में दो बिन्दु महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि दक्षिणपंथी हमेशा से असमानता और महिलाओं के साथ भेदभाव के पैरोकार रहे हैं परंतु आज के भारत में जो हो रहा है, वह दो मायनों में अलग है। पहला, इस अभियान को केरल उच्च न्यायालय जैसी अदालतों के निर्णयों से बढ़ावा मिल रहा है। राज्य न सिर्फ इस तरह के अभियानों की निंदा नहीं कर रहा है वरन् धर्म के स्व-नियुक्त ठेकेदारों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्यवाही करने से भी बच रहा है। उल्टे, सरकार ही  ‘मंजनू दस्ते‘ गठित कर रही है और इन दस्तों को नैतिक पुलिस के रूप में कार्य करने की खुली छूट दे रही है। यद्यपि महिलाओं की देह पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशें हमेशा से होती आई हैं परंतु अब इन्हें एक संस्थागत स्वरूप दे दिया गया है और राज्य के समर्थन ने इन्हें एक तरह की वैधता प्रदान कर दी है।

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दूसरे, कुछ वर्षों पहले तक, जहां महिलाओं पर नियंत्रण रखने और उनका दमन करने का ढांचा ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत मजबूत और शक्तिशाली था, वहीं शहरों में, कम से कम मध्यम और उच्च मध्यम वर्गों में, यह कमजोर हो रहा था। महिलाओं ने अपने संघर्ष के बल पर काम करने का अधिकार, घर से बाहर निकलने का अधिकार और कुछ हद तक अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार पा लिया था, यद्यपि तब भी अंतरर्जातीय विवाह करने वालों को अनेक कठिनाईयों और खतरों का सामना करना पड़ता था। महिला आंदोलनों के कारण भी हालात बदले और पितृसत्तात्मकता को कड़ी चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी। परंतु आज, दक्षिणपंथी राजनीति, महिलाओं द्वारा बहुत कठिनाई से अर्जित इस सीमित स्वतंत्रता को भी समाप्त करने पर आमादा है। दक्षिणपंथी राजनैतिक और सामाजिक शक्तियां, महिलाओं को एक बार फिर घर की दहलीज के पीछे धकेल देना चाहती हैं। वे महिलाओं से जुड़े मुद्दों की इस तरह से विवेचना करती हैं जिससे महिलाओं के अधिकारों में कटौती हो। इस प्रवृत्ति से महिलाओं के आंदोलन को धक्का पहुंचा है। आज महिलाओं के साथ केवल साम्प्रदायिक दंगों के दौरान ही हिंसा नहीं होती। उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में, अपने परिवारों में, कार्यस्थल पर और समुदाय में हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

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हादिया प्रकरण इसका एक उदाहरण है। हादिया (पहले अकीला अशोकन) 24 साल की होम्योपैथी की विद्यार्थी है और केरल में रहती है। उसने अपनी इच्छा से इस्लाम अंगीकार किया और अपनी पसंद के मुस्लिम पुरूष से शादी की। परंतु जैसा कि जानकी नायर और अन्य कई लेखकों का मत है, केरल के समाज के विभिन्न तबकों ने उसके इस निर्णय को ‘बचपना‘ साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। केरल उच्च न्यायालय ने उसके विवाह को रद्द कर दिया और उसे उसके माता-पिता की संरक्षा में सौंप दिया। उसके माता-पिता ने उसे घर में कैद कर दिया और उसे अपने पति के साथ रहने और अपनी इच्छानुसार जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने उसे कालेज जाने की इजाजत तो दे दी पंरतु कालेज के प्राचार्य को उसका संरक्षक घोषित कर दिया। क्या उच्चतम न्यायालय उसे देश का एक वयस्क नागरिक मानने की बजाए कोई संपत्ति या वस्तु मानता है, जिसे एक संरक्षक की आवश्यकता है? उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह उसके विवाह के मुद्दे पर बाद में विचार करेगा। जाहिर है कि हादिया को उसकी व्यथा और कष्ट से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। यह एक वयस्क भारतीय नागरिक के अधिकारों पर चोट है। हमारा संविधान सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार देता है। अगर ये मूल अधिकार भी नागरिकों को उपलब्ध नहीं होंगे तो इससे हमारे प्रजातंत्र पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगेगा।

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इतिहास और साहित्य हमें बताता है कि किस तरह महिलाएं, दक्षिणपंथी राजनीति के कुचक्र में फंस जाती हैं और हिंसा की जनक और पीड़ित दोनों बनती हैं। वे पुरूषवादी राष्ट्रवाद की प्रवक्ता बन जाती हैं और पितृसत्तात्मक ढांचों को और मजबूत करती हैं। महिलाओं का शरीर, इस साम्प्रदायिक विमर्श का फोकस होता है। आज हिन्दू महिलाओं को मुसलमानों के खिलाफ गोलबंद किया जा रहा है और हर स्तर पर पितृसत्तात्मकता को मजबूत किया जा रहा है। चाहे वह पुलिस हो या न्यायपालिका, परिवार हो या समुदाय, सभी पितृसत्तात्मकता के गढ़ बन गए हैं। इससे महिलाओं की उनके हकों की लड़ाई और कठिन हो गई है। महिलाओं के अधिकारों पर डाका डालने के इस अभियान का हिन्दुत्ववादी शक्तियां न केवल संचालन कर रही हैं वरन् उसे और मजबूत और पैना बना रही हैं।

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दुनिया के सभी हिस्सों और सभी धर्मों में व्यवहार के लैंगिक मानदंड और महिलाओं की स्वायत्ता और स्वतंत्रता को सीमित करना आम है। हिटलर की जर्मनी में ‘आर्य‘ महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और यहूदी महिलाओं की जबरदस्ती नसबंदी कर दी जाती थी। जयपुर में नवंबर 2017 में ‘हिन्दू स्पीरिच्युल एंड सर्विस फाउंडेशन‘ ने एक पांच-दिवसीय आयोजन किया। घोषित रूप से इस आयोजन का उद्धेश्य, पारिवारिक और मानवीय मूल्यों, महिलाओं के सम्मान, देशभक्ति, पर्यावरण, परिस्थितिकी और प्रदूषण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना था। राजस्थान सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए इस आयोजन में भागीदारी अनिवार्य कर दी। इस आयोजन में बजरंग दल ने लव जिहाद पर मैन्युअल बांटे, जिनमें उन तरीकों का वर्णन किया गया था जिनके जरिए मुसलमान लड़के, हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं। इनमें शामिल था ‘स्कूलों में लड़कियों के साथ दोस्ती करना, उन्हें मोटरसाईकिल पर घुमाना, उनके साथ मोबाईल पर बातें करना, उन्हें रेस्टोरेंट ले जाना, उनके अश्लील चित्र खींचकर उन्हें ब्लेकमेल करना‘‘ इत्यादि। मैन्युअल में लव जिहाद से ‘प्रभावित‘ हिन्दू परिवारों के लिए सलाहों की एक सूची भी शामिल थी। अन्य चीजों के अतिरिक्त, हिन्दू परिवारों से यह कहा गया था कि वे ‘महिलाओं के सामान की समय-समय पर जांच करें, उनके काल और एसएमएस डिटेल देखें और अगर कोई मुसलमान लड़का, किसी हिन्दू लड़की के साथ देखा जाए तो उसे कड़ी चेतावनी दें‘‘। हिन्दू परिवारों को यह सलाह भी दी गई कि वे ‘घर की महिलाओं के सामने मुसलमानों को घृणित, आतंकवादी, देशद्रोही, तस्कर, पाकिस्तान समर्थक इत्यादि कहें‘। स्पष्टतः, यह मैन्युअल न केवल मुसलमानों के खिलाफ विषवमन करता है वरन् महिलाओं के एक स्वतंत्र नागरिक बतौर अधिकारों पर भी चोट करता है। वह यह तय करना चाहता है कि महिलाएं किससे मिलेंजुलें, किससे दोस्ती करें और विपरीत लिंग अथवा अपने ही लिंग के किसी व्यक्ति के साथ किस तरह के रिश्ते रखें। हिन्दू श्रेष्ठतावादी, पितृसत्तात्मक परिवार के उस ढांचे को मजबूती देना चाहते हैं, जो पदक्रम पर आधारित होता है और जिसमें महिलाओं को परिवार की संपत्ति और उसकी ‘इज्ज्त‘ माना जाता है। यह दृष्टिकोण, महिलाओं के अधिकारों पर किसी भी हद तक रोक लगाने का हामी है, जैसा कि केरल उच्च न्यायालय के निर्णय से जाहिर है।

रिवर्स लव जिहाद

हिन्दू जागरण मंच द्वारा शुरू किया गया ‘बेटी बचाओ, बहू लाओ‘ अभियान एक तरह का ‘रिवर्स लव जिहाद‘ है। इसके अंतर्गत हिन्दू पुरूषों को मुस्लिम महिलाओं से, उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देने के वायदे पर, विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। आंदोलन का लक्ष्य है कि अगले छःह माह में कम से कम 2,100 मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बनाया जाए। मंच ने उत्तरप्रदेश में 2016 में ‘हिन्दू लड़कियां बचाओ‘ अभियान शुरू किया था। इसके अंतर्गत हिन्दू लड़कियों और उनके परिवारों को ‘शिक्षित‘ करने के लिए पर्चे बांटे गए थे। इस तरह के अभियान, कुटिल और कुत्सित हैं और महिलाओं को वस्तु के रूप में देखते हैं। राज्य और हिन्दू श्रेष्ठतावादी, महिलाओं के दमन और उन पर नियंत्रण को ‘भारतीय संस्कृति‘ का भाग और भारत के ‘गौरवपूर्ण अतीत‘ को फिर से वापिस लाने के लिए आवश्यक बताते हैं। जाहिर है कि इस अभियान के कर्ताधर्ताओं के लिए महिलाओं की पसंद-नापसंद का कोई महत्व ही नहीं है। गृह मंत्रालय द्वारा शाम छःह से रात्रि दस बजे तक टीवी पर कंडोम के विज्ञापन प्रसारित करने पर प्रतिबंध को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जहां महिला संगठन महिलाओं के प्रजनन संबंधी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं वहीं राज्य, इस संघर्ष को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। कंडोम, परिवार नियोजन का एक साधन हैं और उन्हें भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बताना महिलाओं के अधिकारों पर हमला है।

राजसमन्द : भयावह अपराध, डरावनी नफरत

जैसा कि ऊपर बताया गया है, हिन्दू श्रेष्ठतावादी और राज्य, दोनों भारत के महिला आंदोलन और देश की महिलाओं के समक्ष एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। वे एक ऐसे प्रतिगामी विमर्श को प्रोत्साहन दे रहे हैं जिसका उद्धेश्य साम्प्रदायिकता की आग को भड़काना और महिलाओं का वस्तुकरण करना है। यह महिलाओं के दमन और पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे को मजबूती देने के प्रयासों का हिस्सा है। हम सबको इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि महिलाओं की ‘रक्षा‘ के नाम पर उनकी स्वायत्ता और स्वतंत्रता का दमन किस तरह रोका जाए। राज्य को महिलाओं से जुड़े असली मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, जिनमें शामिल हैं उनके लिए रोजगार की व्यवस्था, उनके स्वास्थ्य की अच्छी देखभाल और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध करवाना। आज महिलाओं से जुड़े विकास सूचकांकों के मामले में भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे है। समाज के उन तबकों, जो इस तरह के अभियानों से प्रभावित होकर महिलाओं के अधिकारों में कटौती कर रहे हैं, को यह अहसास दिलाया जाना जरूरी है कि इन अभियानों का असली एजेंडा क्या है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय महिलाएं अपने वे अधिकार खो बैठेंगी जो उन्होंने लंबे और कठिन संघर्ष से हासिल किए हैं। (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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