एमएसपी : किसान के साथ फिर छलावा, स्वामीनाथन कमीशन में बताई गई सी-2 की परिभाषा ही बदल दी सरकार ने

चुनाव बाद सरकार भूल गई किसानों से अपना वायदा... किसान खबर तब बनता है जब कोई भूख से तड़प-तड़प कर मर जाता है

शेष नारायण सिंह
Updated on : 2018-07-06 18:24:30

एमएसपी : किसान के साथ फिर छलावा, स्वामीनाथन कमीशन में बताई गई सी-2 की परिभाषा ही बदल दी सरकार ने

सच्चाई की बुनियाद पर तय किया जाना चाहिए एमएसपी

शेष नारायण सिंह

खरीफ फसल के लिए सरकारी खरीद का दाम तय कर दिया गया है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस में बाकायदा मंत्रिमंडल के फैसलों का ऐलान किया। देश भर में किसानों के आन्दोलन चल रहे हैं लेकिन मीडिया में वह मुकाम नहीं पा रहे हैं जो उनको मिलना चाहिए और इसीलिए बाकी जनता को अंदाजा नहीं है कि किसानों में भारी हाहाकार है। लेकिन सरकार को मालूम है कि देश का किसान बहुत नाराज है।

खरीफ की फसलों की सरकारी खरीद के मूल्यों में जिस तरह से वृद्धि की गई है उसको देखकर लगता है कि सरकार में सर्वोच्च स्तर पर भी इस बात की चिंता है और चुनावी साल में किसान की नाराजगी का पाथेय लेकर भाजपा चुनावी मैदान में नहीं जाना चाहेगी। इसलिए घोषित सरकारी मूल्यों का राजनीतिक कारण सबसे अहम है।

भाजपा ने अपने 2014 के चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो वह स्वामीनाथन आयोग की उस सिफारिश को लागू करेगी, जिसमें कहा गया है कि किसानों को सी-2 लागत के ऊपर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए। फसल पर हुए खर्च के मद की लागत को जोड़कर जो कीमत आती है उसको सी-2 कहा जाता है।

घबरा रही है सरकार कि चुनावी साल में नाराज किसान बहुत कुछ नुकसान कर सकता है

सरकार ने चार साल तक इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि इस बीच किसानों की कर्ज़ माफी आदि के मुद्दों पर हास्यास्पद तरह के तर्क दिए जाते रहे। लेकिन अब सरकार की समझ में आ गया है कि चुनावी साल में नाराज किसान बहुत कुछ नुकसान कर सकता है।

अब तक सरकारें जो घोषणा करती रही हैं उसको देखा जाय तो लगता है कि सी-2 लागत के ऊपर 10-12 प्रतिशत जोड़कर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाता रहा है। स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण संगमील मानी जाती थी। 2014 में भाजपा का घोषणा पत्र बनाने वालों ने इस अवसर को भांपा और उसको अपने चुनावी वायदों में शामिल कर दिया।

चुनाव बाद सरकार भूल गई किसानों से अपना वायदा

सबको मालूम है कि मोदी सरकार बनवाने में देश भर के किसानों का बड़ा योगदान है लेकिन सरकार में आने के बाद स्वाभाविक दबावों के चलते सरकार ने अपने इस वायदे को पूरी तरह से भुला दिया। इस साल की शुरुआत से ही साफ नजर आ रहा है कि विरोध सरकार के खिलाफ मैदान ले चुका है तो यह घोषणा की गई है।

स्वामीनाथन कमीशन में बताये गई सी-2 की परिभाषा ही बदल दी सरकार ने

हमको मालूम है कि अब चुनाव तक सरकार और भाजपा के प्रवक्ता सरकारी खरीद के दाम को मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिनको वे ढांक-तोप कर बात करना चाहेंगे। मसलन, वे इस बात को पब्लिक डोमेन में नहीं आने देंगे कि इस सरकार ने स्वामीनाथन कमीशन में बताये गई सी-2 की परिभाषा ही बदल दी है। एक बात और सच है कि इस बार का घोषित मूल्य नई परिभाषा के हिसाब से भी खरा नहीं उतरता है।

पिछले चार वर्षों में सरकार ने हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है। समर्थन मूल्य का उद्देश्य यह माना जाता है कि अगर बाजार में सरकारी कीमत के नीचे किसी अनाज की कीमत जाती है, तो सरकार एमएसपी के आधार पर किसानों से अनाज खरीदेगी। आम तौर पर उम्मीद की जाती है कि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा कीमत मिलती रहेगी लेकिन पिछले चार वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ जब गेहूं और धान को छोड़कर किसी भी उत्पादन का बाज़ार भाव एमएसपी के बराबर भी पंहुचा हो।

क्या है एमएसपी की अवधारणा

एमएसपी की अवधारणा ही यही है कि किसान की फसल की कीमत एक मुकाम के नीचे न जाने पाए, लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अब तक तो ऐसा हुआ नहीं है। जाहिर है नया घोषित हुआ यह समर्थन मूल्य भी किसान का बहुत हित करने वाला नहीं है।

किसान अपनी पैदावार को होल्ड नहीं कर सकता, उसको फसल तैयार होने के बाद बेचना जरूरी हो जाता है। इसका मुख्य कारण तो यही है कि उसके पास इतना धन नहीं होता कि वह बाजार भाव के अच्छे होने का इंतजार करे और अपनी ही फसल को बहुत दिन तक रखा नहीं जा सकता, उस पर कानूनी कार्रवाई का खतरा रहता है। इसलिए जब देरी या धांधली होने लगती है तो वह औने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हो जाता है। किसान की इस कमजोरी का फायदा वे लोग उठाते हैं जो खाद्य सामग्री के वायदा कारोबार में बड़ी रकम बना रहे होते हैं। नतीजा यह होता है कि किसान को जिस चीज़ की कीमत एक रुपये मिल रही होती है, वही जब शहरी मध्यवर्ग के पास पहुंचती है तो वह करीब एक सौ रुपये की हो चुकी होती है। इस प्रकार से राजनीतिक पार्टियों के समर्थकों के दो बड़े समूह बिचौलियों के शिकार हो चुके होते हैं। एक तो किसान जिसकी आबादी सबसे ज्यादा है और दूसरा शहरी मध्यवर्ग जिसकी भी आबादी दूसरे नंबर पर है। सरकार को इस हालत को सुधारने के लिए मौलिक और बुनियादी कदम उठाना चाहिए लेकिन कोई भी सरकार ऐसा करती नहीं है।

नई एमएसपी घोषित होने के साथ-साथ यह प्रचार शुरू हो गया है कि सरकार ने अपना एक महत्वपूर्ण वायदा पूरा कर दिया है लेकिन लगता है कि यह सब एक योजना के तहत किया जा रहा है जिससे किसान को सही बात का पता ही न लग पाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य के दर्शनशास्त्र का आधार यह था कि किसान को यह गारंटी दी जा सके कि उसकी फसल की एक कीमत सरकार की तरफ से तय है, जिसके ऊपर के दाम पर वह बाजार में अपना माल बेच सकता है आम तौर पर एमएसपी के ऊपर उसको करीब बीस प्रतिशत ज्यादा कीमत बाजार से मिल सकती था।

मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में जो बीज बोए था उसका सबसे ज्यादा नुकसान किसान को ही हो रहा है

पहले ऐसा होता भी था लेकिन अब नहीं हो रहा है। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में जिस उदारीकरण और भूमंडलीकरण का आगाज किया था उसका सबसे ज्यादा नुकसान किसान को ही हो रहा है। तथाकथित सुधारों के नाम पर उद्योगपति, शेयर बाजार वाले, अंतरराष्ट्रीय ठग आदि तो मौज कर रहे हैं, बैंकों का धन लूटने वाले लोगों को संभालने के लिए सरकार एक लाख करोड़ से ज्यादा के एनपीए यानी बेकार हो चुके बैंकों के कर्ज़ को माफ कर रही है लेकिन किसान सरकार की प्राथमिकता नहीं हैं।

उदारीकरण और वैश्वीकरण के तमाम सुधारों के नाम पर किसानों को बाकी दुनिया के किसानों के साथ मुकाबला करने के लिए छोड़ दिया गया है, किसानों के उत्पादन के मुकाबले अमेरिका आदि से अनाज का आयात कर लिया जाता है और किसान बाहार से खुद ही लड़ने के लिए अभिशप्त है। देश के अन्दर भी किसान के ऊपर प्रतिबंध लगे हुए हैं। वे एक राज्य से दूसरे राज्य तक अनाज नहीं ले जा सकते, तय मात्रा से अधिक जमा नहीं कर सकते, यहां तक कि निर्यात भी नहीं कर सकते। इसलिए एमएसपी की घोषणा मात्र कर लेने से सरकार के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती। देश की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए जरूरी है कि सरकार अपने आपको किसानों की सही हित रक्षक रूप में प्रस्तुत करे, केवल मतदाता के रूप में ही नहीं।

किसान खबर तब बनता है जब कोई भूख से तड़प-तड़प कर मर जाता है

इस सन्दर्भ में मीडिया की जिम्मेदारी का उल्लेख करना भी जरूरी है। देखा गया है कि लगभग सभी खबरों में तोता रटन्त स्टाइल में वही लिख दिया जाता है जो सरकारी तौर पर बताया जाता है। सारी खबरें सरकारी पक्ष को उजागर करने के लिए लिखी जाती हैं। यह सच है लेकिन एक सच और है जो आजकल अखबारों के पन्नों तक आना बंद हो चुका है। यह सच है कि किसान किस तरह से अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी को जीता है, किस तरह से वह जमीन छोड़कर शहर भाग जाने के लिए तड़पता है, देश के गांवों में कम खेत वाले या भूमिहीन खेतिहर मजदूर पर क्या गुजरती है, किस तरह से वह भूख और अकाल का शिकार होता है।

भूख के तरह-तरह के रूप देश के सूखा ग्रस्त गांवों में देखे जाते हैं लेकिन वे खबर नहीं बन पाते। खबर तब बनती है जब कोई भूख से तड़प-तड़प कर मर जाता है, या कोई अपने बच्चे बेच देता है या खुद को गिरवी रख देता है। भूख से मरना बहुत बड़ी बात है, दुर्दिन की इंतहा है। लेकिन भूख की वजह से मौत होने के पहले इंसान पर तरह-तरह की मुसीबतें आती हैं, भूख से मौत तो उन मुसीबतों की अंतिम कड़ी है। कहीं भी नहीं लिखा जाता कि किसानी का एक जरूरी हिस्सा यह भी है कि साल दर साल फसल चौपट हो जाती है। फसल बर्बाद हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करता है क्योंकि गांव का गरीब और इज्जतदार आदमी मांग कर नहीं खाता। गांव का गरीब, सरकारी लापरवाही के चलते और मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषि व्यवस्था नए शासकों को मिली थी, वह लगभग आदिम काल की थी। उसको दुरुस्त करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री ने हरित क्रान्ति की पहल की थी लेकिन उसके बाद किसी सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है।

इसलिए मीडिया की जिम्मेदारी है कि सच्चाई को देश और समाज के सामने लाए, मीडिया का फर्ज़ है कि इन आंकड़ेबाज नेताओं को यह बताने की जरूरत को समझे कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करें, इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं।

इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता है, तभी इस देश का नेता और पत्रकार जागता है। गांव का किसान, जिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती है, वह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता। इसलिए किसान की समस्या को लगातार केंद्र में रखना सरकार का भी जिम्मा है और मीडिया का भी। दोनों को ही अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए।

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