अच्छे दिन ? शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब हमारे जवान शहीद न होते हों

आश्चर्य यह है कि जेएनयू में कथित तौर पर देशविरोधी नारे लगाने के जुर्म में छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो जाता है और जो विधायक खुलेआम विधानसभा में पाक जिंदाबाद कहता है, उस पर सरकार मौन है।...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

आश्चर्य यह है कि जेएनयू में कथित तौर पर देशविरोधी नारे लगाने के जुर्म में छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो जाता है और जो विधायक खुलेआम विधानसभा में पाक जिंदाबाद कहता है, उस पर सरकार मौन है

जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर और उसके साथी अभी हफ्ता भर पहले ही एक वीडियो में भारत पर हमले का संकल्प दोहराते हैं। 9 फरवरी को अफजल गुरू को फांसी दिए जाने की बरसी के मद्देनजर खुफिया एजेंसियों का एलर्ट भी जारी होता है कि आतंकी हमले की आशंका है। 9 तारीख को तो नहीं लेकिन 10 फरवरी की अलसुबह जम्मू के सुंजवान के आर्मी कैंप पर आतंकी हमला हो जाता है। अब इसे सुरक्षा बलों की चूक मानें या सरकार का ढीला रवैया कि तमाम एहतियात के बावजूद आतंकी हमले होते हैं।

सुंजवान सैन्य शिविर में केवल सैनिक ही नहीं बल्कि उनके परिजन भी थे। इस हमले का संदेह जैश ए मोहम्मद पर ही जा रहा है। इससे पहले उरी और पठानकोट पर भी आतंकियों ने इसी तरह हमला किया था। पाकिस्तान की ओर से सीमा पर गोलीबारी, घुसपैठ का सिलसिला थम नहीं रहा है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब हमारे जवान शहीद न होते हों। इस बार भी पांच जवान शहीद हो चुके हैं। जबकि कई सैनिक और उनके परिजन घायल हैं। एक सैनिक की बेटी की भी मौत की खबर है। हमले में शहीद हुए लेफ्टिनेंट मदन लाल चौधरी की एक रिश्तेदार गर्भवती थीं, वे भी घायल हुईं, उन्हें किसी तरह बचाया गया, और उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

जम्मू-कश्मीर से दूर, गोलियों और बम के धमाकों की आवाज से दूर रहकर इन खबरों को पढ़ना-सुनना एक बात है, लेकिन जिन लोगों को इन भयावह स्थितियों का सामना करना पड़ता है, उनकी पीड़ा का अनुमान लगाना कठिन है। दुख की बात यह है कि हमारी सरकार जुबानी खर्च से ज्यादा कुछ कर ही नहीं पा रही है। उसके पास 56 इंच की छाती का ढोल पीटने के अलावा लगता है कुछ बचा ही नहीं ेहै। बहुत हुआ तो सर्जिकल स्ट्राइक का दंभ दिखाया जाता है, कि हमने कैसे मुंहतोड़ जवाब दिया।

सरकार यह नहीं देखती है कि उसकी नीतियों और नाकामियों का खामियाजा सैनिकों और उनके परिजनों को उठाना पड़ रहा है। अभी भी केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि आश्वस्त रहिए, हमारी सेना और सुरक्षा बल प्रभावी तरीके से अपना काम कर रहे हैं और अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे कभी भी किसी भी भारतीय का सिर शर्म से झुकने नहीं देंगे। माननीय मंत्रीजी को यह कौन समझाए कि सेना तो अपना काम कर ही रही है। लेकिन आप लोग अपना काम कब करेंगे, ताकि सैनिकों को इस तरह अपनी जान व्यर्थ न गंवानी पड़े। सरकार से तो इतना भी नहीं हुआ कि सैन्य शिविरों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए धनराशि बढ़ा देती।     

जनवरी 2016 में पठानकोट हमले के बाद सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल रिटायर्ड फिलिप कम्पोज की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी। इसने घेरेबंदी में टूट की पहचान करने वाला तकनीकी सिस्टम लगाने और खुफिया व्यवस्था मजबूत बनाने पर जोर दिया था। सैन्य ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए  2000 करोड़ रुपये अलग से दिए जाने की मांग की गई थी। लेकिन पिछले साल रक्षा मंत्रालय ने इस मांग को वाजिब नहीं माना था। अब बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए मंत्रालय ने कुछ दिन पहले इस मद में 1487.27 करोड़ रुपये जारी करने का फैसला किया है। शायद साल के अंत तक सैन्य शिविरों का सुरक्षा घेरा बढ़ जाए। लेकिन इससे आतंकी हमले होने रुक जाएंगे, यह कौन सुनिश्चित करेगा। इस बार के हमले के पीछे पंचायत चुनाव का होना भी बताया जा रहा है, क्योंकि कुछ लोग नहीं चाहते कि राज्य में लोकतंत्र मजबूत हो। लेकिन हमारे राजनीतिक दल जिस तरह का व्यवहार दिखा रहे हैं, उससे भी लोकतंत्र मजबूत तो कतई नहीं हो रहा है। भाजपा इसे रोहिंग्या शरणार्थियों और जम्मू के आसपास रहने वाले बांग्लादेशियों से जोड़ रही है। किसी पर भी शक करने के लिए कुछ आधार होना चाहिए।

लेकिन रोहिंग्याओं पर तो शक इसलिए ही किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं और इसलिए वे आतंकियों की मदद कर सकते हैं। और उन पर यह शक तब से किया जा रहा है, जब से वे भारत में शरण लेने आए। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भाजपा विधायकों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता अकबर लोन ने पाक जिंदाबाद के नारे लगाए। लोन कहते हैं, हां ये सच है कि मैंने नारे लगाए। ये मेरा निजी मामला है। मुझे नहीं लगता कि इससे किसी को दिक्कत होगी।

आतंकी त्रासदी के बाद पाक जिंदाबाद के नारे लगाना तो दुखद है ही, उससे भी दुखद यह है कि विधायक लोन इसे अपना निजी मामला बता रहे हैं। जब वे भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति के तहत जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं, और भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में वे विधानसभा में पाक जिंदाबाद के नारे लगाने को अपना निजी मामला कैसे बता सकते हैं? पाकिस्तान के प्रति दोस्ताना रवैया रखना या उससे सहानुभूति रखना गलत नहीं है, लेकिन जब आपकी सेना और जनता पर हमला हो रहा हो, तब तो आपको अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट करनी चाहिए। आश्चर्य यह है कि जेएनयू में कथित तौर पर देशविरोधी नारे लगाने के जुर्म में छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हो जाता है और जो विधायक खुलेआम विधानसभा में पाक जिंदाबाद कहता है, उस पर सरकार मौन है

( देशबन्धु का संपादकीय )

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।