अधर में “आधार” कार्ड : सुप्रीम कोर्ट ही करेगा इसके भविष्य पर फैसला

हिंदी के इन अख़बारों से पूछा जाना चाहिए कि वे आम लोगों को सही समाचार देने के लिये वचनबद्ध हैं या सुप्रीम कोर्ट तक की राय को तोड़ने-मरोड़ने के लिये स्वतंत्र !...

हाइलाइट्स

हिंदी के इन अख़बारों से पूछा जाना चाहिए कि वे आम लोगों को सही समाचार देने के लिये वचनबद्ध हैं या सुप्रीम कोर्ट तक की राय को तोड़ने-मरोड़ने के लिये स्वतंत्र !

 

अरुण माहेश्वरी

सुप्रीम कोर्ट ने कल केंद्र सरकार को दो टूक निर्देश दिया है कि जब तक उसकी संविधान पीठ आधार कार्ड की अनिवार्यता के मामले में अपनी अंतिम राय नहीं देती है, केंद्र सरकार एक भी नागरिक पर आधार कार्ड को लेकर कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करेगी।

मुख्य न्यायाधीश सहित तीन सदस्यों की पीठ ने कल स्पष्ट किया कि यह मामला नागरिक की निजता के अधिकार से जुड़ा हुआ मामला है। जब केंद्र के अटार्नी जनरल ने मौखिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट को यह आश्वासन दिया कि बैंक खातों, मोबाइल, स्कूल आदि किसी भी मामले में आधार कार्ड के लिये कोई ज़बर्दस्ती नहीं होगी तो कोर्ट ने निर्देश दिया कि आपके मौखिक बोलने से कुछ नहीं होगा, जाकर इस आशय का लिखित आदेश केंद्र सरकार से लाकर उसे जमा कराइये।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया था कि वह 31 मार्च तक इसे लेकर किसी को मजबूर नहीं करेगी तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तब तक आप किसी को मजबूर नहीं कर सकते हैं, जब तक हमारी संविधान पीठ इस पर अपनी अंतिम राय नहीं देती है।

यह हमारा दुर्भाग्य है कि ‘जनसत्ता’ की तरह के हिंदी के अखबार ने इस खबर को इतना तोड़-मरोड़ कर पेश किया है कि सुप्रीम कोर्ट की असल राय का किसी को पता ही नहीं चल सकता। उसने सिर्फ आधार से जोड़ने की समय-सीमा बढ़ाने के बारे में अटर्नी जनरल की बात को ही प्रमुखता से रखते हुए आम लोगों को बरगलाया गया है कि उन्हें अब 31 दिसंबर के बजाय आगामी साल की 31 मार्च तक अपने खातों आदि को आधार से जोड़ने की छूट मिल गई है।

हमारे हिंदी के इन अख़बारों से पूछा जाना चाहिए कि वे आम लोगों को सही समाचार देने के लिये वचनबद्ध हैं या सुप्रीम कोर्ट तक की राय को तोड़ने-मरोड़ने के लिये स्वतंत्र !

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