सुनो केवल नेहरू को कोसने से कोई महान नहीं बनता

नेहरु का साहित्य के प्रति अनुराग ही था जो उन्होंने 1954 में साहित्य अकादमी और 1957 में नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी संस्थाओं की स्थापना कर दी थी, केवल छिद्रान्वेषण, अतीत विलाप और कोसने से कोई महान नहीं बनता।...

अतिथि लेखक

महाकवि निराला (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ - Suryakant Tripathi 'Nirala') के इतने किस्से हैं कि वे जीते-जी मिथक बन चुके थे। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू (First Prime Minister Pt. Jawaharlal Nehru) उनके मित्र थे और अक्सर उनका हाल-चाल लेते रहते थे। यही नहीं, महादेवीजी के जरिये उन्होंने उनकी आर्थिक मदद की भी व्यवस्था कराई थी।

एक बार की बात है। नेहरूजी चीन की यात्रा से लौटे थे। गृहनगर इलाहाबाद में उनकी जनसभा थी। स्वागत में गले में पड़ रही मालाओं के बीच उनकी नजर सामने की पंक्ति में बैठे कविवर निराला पर पड़ी। निराला उस समय अखाड़े से पहलवानी कर के आए थे। उनका शरीर मिट्टी और तेल से सना हुआ था। शरीर पर मात्र एक गमछा था।

नेहरू ने बोलना शुरू किया कि मैं चीन गया था। वहां मैंने एक महान राजा की कहानी सुनी। राजा के दो बेटे थे। एक कुछ कम-अक्ल और दूसरा बेहद बुद्धिमान। बच्चे जब बड़े हुए तो राजा ने दोनों को बुलाकर कमअक्ल लड़के से कहा कि तुम राजपाट संभालो क्योंकि तुम केवल यही कर सकते हो। बुद्धिमान और अक्लमंद लड़के से राजा ने कहा कि यह एक बड़े और महान कार्य के लिए पैदा हुआ है। यह कवि बनेगा।

यह कहकर नेहरू ने अपने गले की मालाएं उतारीं और मंच से नीचे आकर निराला के पैरों में सम्मान स्वरूप रख दीं। यह देखकर पूरी सभा स्तब्ध रह गई।

नेहरु का साहित्य के प्रति अनुराग ही था जो उन्होंने 1954 में साहित्य अकादमी और 1957 में नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी संस्थाओं की स्थापना कर दी थी, केवल छिद्रान्वेषण, अतीत विलाप और कोसने से कोई महान नहीं बनता।

(पंकज चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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