फिर चुनाव के लिए मंदिर जाप, जनता के बीच काम करता नजर नहीं आ रहा भाजपा का पैंतरा

चुनाव प्रचार में मंदिर समर्थक बनाम मंदिर विरोधी अचानक नहीं आया...

फिर चुनाव के लिए मंदिर जाप, जनता के बीच काम करता नजर नहीं आ रहा भाजपा का पैंतरा

0 राजेंद्र शर्मा

आखिरकार वही हो रहा है, जिसका अनुमान था। मध्य प्रदेश और मिजोरम में विधानसभाई चुनाव के लिए प्रचार बंद होने तक अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा बाकायदा, भाजपा के प्रचार के केंद्र में आ चुका था। बेशक, 25 नवंबर को अयोध्या में और नागपुर समेत देश के कई अन्य महत्वपूर्ण केंद्रों में विहिप तथा भाजपा समेत शेष तमाम संघ परिवार द्वारा किए गए कथित रूप से संतों तथा रामभक्तों के आयोजन, खासतौर पर मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के महत्वपूर्ण विधानसभाई चुनावों से ऐन पहले, मंदिर का मुद्दा गरमाने के लिहाज से भाजपा के लिए काफी उपयोगी साबित हुए हैं।

बहरहाल, भाजपा के चुनाव प्रचार में मंदिर के मुद्दे की मौजूदगी, सिर्फ विहिप आदि द्वारा भाजपा के चुनाव प्रचार के समानांतर मंदिर का मुद्दा उठाकर, उसके पक्ष में हिंदुओं को गोलंबद करने की कोशिश किए जाने तक ही सीमित नहीं रही है। यह इसके बावजूद है कि अक्टूबर के महीने में दिल्ली में आयोजित कथित धर्मसंसद ने बाकायदा आने वाले आम चुनाव को ही नहीं, विधानसभाई चुनावों के मौजूदा चक्र को भी ध्यान में रखकर, राममंदिर के निर्माण के लिए अपने मौजूदा अभियान की समय-सूची तय की थी। विधानसभाई चुनावों के मौजूदा चक्र में, भाजपा के चुनाव प्रचार में मंदिर मुद्दे की दुहाई, योगी आदित्यनाथ से लेकर अमितशाह तक के भाषणों तथा वक्तव्यों में तो शुरू से ही मौजूद रही थी। योगी की ‘अली बनाम बजरंग बली’ की दुहाई इस का महत्वपूर्ण उदाहरण है। बहरहाल, मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार बंद होने से पहले, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विहिप समेत संघ परिवार के अन्य बाजुओं और भाजपा के अपने सहयोगियों के सुर में सुर मिलाकर, अयोध्या में मंदिर के निर्माण के मुद्दे को भाजपा के चुनाव प्रचार के केंद्र में पहुंचा चुके थे।

    राजस्थान में, जहां भाजपा को चुनाव में निश्चित हार सामने खड़ी दिखाई पड़ रही है, अलवर में एक चुनाव सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस पर यह कहते हुए हमला किया कि वह अयोध्या मंदिर के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के फैसला करने के रास्ते में बाधाएं डाल रही है। प्रधानमंत्री का यह आरोप, जाहिर है कि मुख्य विरोधी पार्टी को राम मंदिर-विरोधी साबित करने के जरिए, निहितार्थत: खुद उनके तथा उनकी पार्टी के अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनाने के पक्षधर होने की दुहाई देता है। यह इस तथ्य की तोड़-मरोड़ पर आधारित था कि वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने, जो कांग्रेस के सांसद भी हैं, एक वकील की हैसियत से सर्वोच्च न्यायालय में बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के एक पक्षकार की ओर से, इसकी अपील की पैरवी की थी कि इस विवाद से संबंधित अपीलों की रोज-रोज की सुनवाई, 2019 में होने वाले आम चुनाव के बाद ही की जाए। इस अपील के पीछे यह बहुत ही आसानी से समझ में आने वाला तर्क था कि सर्वोच्च न्यायालय में उक्त विवाद की सुनवाई और अगर उसका फैसला आ सकता हो तो तो उसका भी, आम चुनाव में राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होने दिया जाना चाहिए।

वास्तव में प्रधानमंत्री का इस मुद्दे को विधानसभाई चुनावों के लिए प्रचार में इस्तेमाल करना, उक्त अपील के पीछे की आशंकाओं के सच होने को ही साबित करता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री अपने मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी पर मंदिर के मामले में सुनवाई/ निर्णय टलवाने का आरोप लगाने पर ही नहीं रुक गए। इसके आगे बढक़र उन्होंने विपक्ष पर सुनवाई/ निर्णय न होने देने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को, जो इस मामले का फैसला करना चाहते थे, महाभियोग की धमकी के जरिए ब्लैकमेल करने का भी आरोप लगा दिया। इस आरोप का झूठा होना अपनी जगह, इस सबके जरिए प्रधानमंत्री प्रकारांतर से यही संदेश दे रहे थे कि उनकी सरकार की कोशिशों से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तो मंदिर के पक्ष में फैसला करने के लिए तैयार भी थे, लेकिन विपक्ष ने ही टांग अड़ा दी!

चुनाव प्रचार में मंदिर समर्थक बनाम मंदिर विरोधी अचानक नहीं आया

In the election campaign, temple supporters vs. Temple opponent did not come suddenly

    जाहिर है कि प्रधानमंत्री के स्तर से चुनाव प्रचार में मंदिर समर्थक बनाम मंदिर विरोधी का यह आख्यान कोई अचानक ही पेश नहीं कर दिया गया है। वास्तव में पिछले कुछ महीने से तो खासतौर पर इस आख्यान को बाकायदा संघ परिवार द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। इस मुहिम को निर्णायक रूप से और संघ परिवार के शीर्ष से आगे बढ़ाते हुए, आरएसएस के सरसंघचालक ने इस साल के अपने दशहरा संबोधन में, 2013 के बाद पहली बार अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा उठाया भर नहीं था बल्कि मोदी सरकार से कानून बनाकर, विवादित भूमि पर मंदिर बनाने का रास्ता तैयार करने की भी मांग की थी, क्योंकि अदालत के निर्णय का और इंतजार नहीं किया जा सकता है। दूसरी ओर, संघ प्रमुख ने यह सुनिश्चित करने का भी पूरा ध्यान रखा था कि इस मांग की धार किसी भी तरह से मोदी सरकार की ओर नहीं मुडऩे पाए। इसके साथ ही संघ परिवार के विभिन्न बाजुओं ने अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए कानून या अध्यादेश का शोर मचाना शुरू कर दिया। इसके कुछ ही बाद में जब सर्वोच्च न्यायालय ने, महत्वपूर्ण रूप से सबरीमला के मामले में अपने फैसले के खिलाफ भाजपा समेत संघ परिवार द्वारा चलाए जा रहे हिंसक आंदोलन की पृष्ठभूमि में, अयोध्या विवाद से संबंधित अपीलों की सुनवाई शुरू करने पर निर्णय जनवरी तक के लिए टाल दिया, भाजपा समेत संघ परिवार के विभिन्न बाजुओं ने इसे ‘हिंदुओं के साथ अन्याय’ बताकर, जोर-जोर से हिंदुओं के हितों की दुहाई देना शुरू कर दिया।

    इसके जरिए इस तरह का वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही थी जैसे विवाद सिर्फ तारीख पर हो और सर्वोच्च न्यायालय को विवादित भूमि के मालिकाना अधिकार का फैसला ही नहीं करना हो। यह भाजपा समेत हिंदुत्व ब्रिगेड के बार-बार दोहराए जाते रहे इस दावे के अनुरूप ही है कि विवादित स्थल पर सिर्फ मंदिर ही बनेगा।

प्रकरण के बहाने से, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सार्वजनिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय को आगाह भी कर चुके थे कि ऐसे फैसले न सुनाए जो बहुसंख्यकों की भावनाओं या विश्वासों के खिलाफ जाते हों। अब प्रधानमंत्री ने किया यह है कि उन्होंने ‘हिंदुओं के साथ अन्याय’ की दुहाई को, जिसके निशाने पर अब तक एक हद तक सर्वोच्च न्यायालय भी था, चुनावी हथियार बनाकर पूरी तरह से विपक्ष के और खासतौर पर अपनी मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के खिलाफ, मोड़ दिया है।

    इस सब का विधानसभाई चुनाव के वर्तमान चक्र पर क्या असर पड़ेगा, यह तो 11 दिसंबर की मतगणना में ही पता चलेगा। पर सीधे प्रधानमंत्री के इस चक्र के चुनाव प्रचार के बीच में मंदिर की दुहाई पर उतर आने से इतना तो साफ हो ही गया है कि मोदी सरकार से आम जनता के और खासतौर पर किसानों, मजदूरों, युवाओं तथा महिलाओं के बढ़ते असंतोष के सामने, संघ-भाजपा 2019 के आम चुनाव में इस दुहाई का खुलकर सहारा लेने जा रहे हैं। विहिप द्वारा तैयार किए गयाआंदोलन का कार्यक्रम, इसी का वातावरण बनाने के लिए। इस कार्यक्रम के ताजातरीन चरण में खुद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिस्सा ही नहीं लिया है बल्कि आरएसएस के आशीर्वाद से ‘हिंदू विक्षोभ’ की 1992 की भाषा की वापसी भी शुरू हो गयी है। इस 6 दिसंबर के गिर्द इस भाषा में और उग्रता आना तय है। भाजपा के सांसदों की मंदिर के निर्माण के लिए संसद में निजी विधेयक पेश करने की घोषणाओं से लेकर, आदित्यनाथ की अयोध्या से संबंधित घोषणाएं तक, इसी के इशारे हैं।

    लेकिन, संघ-भाजपा का इस रास्ते पर चलना तो तय है, मगर उसका यह पैंतरा जनता के बीच काम करता नजर नहीं आ रहा है। इसका कम से कम एक महत्वपूर्ण संकेत तो विहिप के 25 नवंबर के अयोध्या के आयोजन ने ही दे दिया है। लाखों लोगों के शामिल होने के संघ परिवार के सारे प्रचार और लोगों को जुटाने के लिए योगी सरकार के सारी सरकारी मशीनरी को लगाने के बावजूद, अयोध्या में पहुंचने वालों की संख्या विभिन्न तटस्थ अनुमानों के अनुसार, 30 से 60 हजार के बीच ही थी। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि अयोध्या के संतों-महंतों के विशाल बहुमत ने विहिप के उक्त आयोजन का यह कहते हुए बहिष्कार ही किया था कि इसके पीछे तो मंदिर की नहीं, चुनाव की ही चिंता थी। संघ-भाजपा के दुर्भाग्य से इन संतों-महंतों से भी बढक़र, आम जनता उसके बढ़ते मंदिर जाप की असलियत को पहचान रही और इसलिए अपने बढ़ते मंदिर जाप से वे अपने सांप्रदायिक समर्थक-आधार को खिसकने से भले ही रोक लें, इस फूटी तली वाली नाव के सहारे चुनाव की वैतरणी पार नहीं कर सकते हैं।                                     

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