इस वक़्त सबसे जरूरी काम है भाजपा को सत्ता से बाहर करना

जुगनुओं का साथ लेकर रात रोशन कीजिये रास्ता सूरज का देखा तो सुबह हो जाएगी।...

अतिथि लेखक
इस वक़्त सबसे जरूरी काम है भाजपा को सत्ता से बाहर रना

The most important thing at this time is to get the BJP out of power.

#भाजपा_विरोधी_वोटों_को_एकजाई_करने_का_समय

15 साल से सत्ता में रही भाजपा चौथी बार जीतने के लिए बदहवास है। ऐसा कोई धतकरम नहीं छोड़ना चाहती जिसे आजमाया न जाए। दलबदल, खरीद-फरोख्त, विराट धनबल बाहुबल, जातियों के विभाजन का ध्रुवीकरण और हर तरह के विभाजन के व्याप्तिकरण उसकी जाहिर उजागर चुनावी कार्यनीति है। असली रणनीति - साम्प्रदायिक टकराव करके उन्माद फैलाने - को भी वोटिंग मशीनों के एक्टिवेट होने से पहले आजमाये जाने की जो तैयारियों हैं उनकी भी अनदेखी नही की जा सकती।

जनता के आक्रोश की खुली और उग्र अभिव्यक्ति ने भाजपा और आरएसएस की घबराहट बढ़ा दी है। लोग बड़े से बड़े नेताओं से खुलकर सवाल कर रहे हैं, ताने मार रहे हैं, उनके मुंह पर नारे उछाल रहे हैं, उन्हें खदेड़ रहे हैं। जनता जब अपने पर आती है तो अपने आकाओं की सेवा टहल करने वाली पालतू मशीनरी और नौकरशाही भी फालतू हो जाती है। संजीदा राजनीतिक पार्टियां इस स्थिति से निबटने के लिए आत्ममन्थन करती हैं, पुनरावलोकन करती हैं। जरूरी सुधार करती हैं। नए समाधान ढूंढती है। मगर यह भाजपा है। आत्ममुग्ध मनोरोगी नेतृत्व और उसके इर्दगिर्द मंडराते छोटे से गिरोह - एकदम माफिया स्टाइल के गिरोह - की जकड़न में जकड़ी भाजपा, देसी विदेशी कॉरपोरेट कम्पनियों के डर्टी वर्क को भक्तिभाव से अंजाम देने वाली और पूंजी का हुकुम बजाने को पूरे समर्पण के साथ आतुर शाखा।

भाजपा कोई आम राजनीतिक पार्टी नही है - यह फासीवादी विचारों के हिन्दूत्वी संस्करण आरएसएस की राजनीतिक भुजा है। विहिप, बजरंगदल जैसी गुंडा वाहिनियों की तरह संसदीय मंच की, संसदीय प्रणाली-लोकतंत्र और संविधान तक को ध्वस्त करने को तत्पर सर्वविनाशक वाहिनी। यूं तो ठीक यही एक वजह काफी है इसे सत्ता से हटाने के लिये। मगर वजहें और भी हैं। अनगिनत हैं। जिनमें से कुछ को किंचित विस्तार और समुचित तथ्यों के साथ इस अंक के विभिन्न लेखों, भाषणों में सूत्रबद्द किया गया है। उन्हें दोहराने की जरूरत नही है।

सारतः यह कि भाजपा की सत्ता में पुनर्वापसी प्रदेश की 95 फीसद जनता के लिए कितनी भयावह होगी इसे , इन लेखों को पढ़े बिना भी निजी अनुभवों के आधार पर ही समझा जा सकता है।

इसलिये इस वक़्त सबसे जरूरी काम है भाजपा को सत्ता से बाहर रना। उसे निर्णायक रूप से पराजित करना। यह काम तब ही ज्यादा कारगर तरीके से किया जा सकता है जब भाजपा विरोधी वोटों को एकजाई किया जाए। उन्हें बढ़ाया जाए। राजनीतिक मंचों पर ऐसा करने का तरीका है विपक्ष की, भाजपा विरोधी दलों की अधिकतम संभव एकता।

इसे हासिल करने के दो तरीके होते हैं : मोर्चे का गठन या फिर संबंधित दलों के बीच सीटों पर तालमेल। भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकना। स्वाभाविक है कि ऐसा करने, इसकी धुरी बनने की जिम्मेदारी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की होती है, जो छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में मुख्य गैर भाजपा पार्टी है। भले कॉरपोरेट्स और सामन्तवाद के साथ वह भी गर्भनाल से जुड़ी है।

मगर कांग्रेस एक रोचक पार्टी है

एकल नेतृत्व के गुरूवाकर्षण में लगे बंधे, अपने अपने क्षीण गुरुत्व की पूंछ से लटकाए धूमकेतुओं वाले, अनगिनत क्षत्रपों की पार्टी !! एक नेता बीएसपी तो दूसरा गोंडवाना पार्टी से बात करता है तो तीसरा और चौथा और पांचवा पूरे प्राणपण से उसे तोड़ने ने जुट जाता है। सारे नेता मिलकर दोपहर में एक क्षेत्रीय दल के साथ तालमेल का अटूट वादा करते हैं और शाम को जारी सूची में उन्ही सारी सीटों पर कांग्रेस के ही उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए जाते हैं। इधर पैराशूट उम्मीदवारों को टिकिट न देने का संकल्प लिया जाता है उधर आजीवन संघी रहे नेता रातोंरात कांग्रेसी हो जाते हैं। मामा के बच्चों के मामा अचानक कांग्रेस की टिकिट लिए पंजे वाले मामा बने घूमते दिखते हैं।

जब तक वाम धुरी वाली वैकल्पिक राजनीति समर्थ और शक्तिशाली नही होती तब तक इस तरह की विडंबनाएं संसदीय राजनीति में बनी रहने वाली हैं।

जुगनुओं का साथ लेकर रात रोशन कीजिये

रास्ता सूरज का देखा तो सुबह हो जाएगी।

इसीलिए, और ठीक इसीलिए कि वाम और वैकल्पिक राजनीति को मजबूत होने की गुंजाइश मिले, जनता और देश के मुद्दे विमर्श में आये, यह जरूरी हो जाता है कि भाजपा को सत्ता से हटाया जाए। अलोकतांत्रिक और विभाजनकारी ताकतों को पराजित किया जाए। इसी के साथ नई विधानसभा में वामपंथ तथा वैकल्पिक नीतियों की हामी विधायकों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

उम्मीद है, 28 नवम्बर के मतदान में मध्यप्रदेश और इसी महीने हुए मतदान में छत्तीसगढ़ की जनता इसी तरह का जनादेश देगी।

{लोकजतन 16 से 30 नवम्बर का सम्पादकीय साभार}

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