धर्म का असली निशाना औरतें हैं

समानता, न्याय और व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने की दुहाई देने वाले हमारे इस विशाल लोकतंत्र में औरत के बारे में इस तरह के हिंसक और उत्पीड़क विचार खुले आम फैलाये जा रहे हैं।...

धर्म का असली निशाना औरतें हैं

The real target of religion is women

शम्सुल इस्लाम

इस बारे में दो राय नहीं हो सकतीं कि हमारा देश एक ऐसे दर्दनाक दौर से गुज़र रहा है, जिस में विश्व की सब से विशाल माने जाने वाली प्रजातांत्रिक-धर्म निरपेक्ष व्यवस्था पूरी तरह संस्थागत धर्मों के शिकंजे में है। ऐसा नहीं है कि यह सब सिर्फ़ भारत में हो रहा हो। भारतीय-उपमहाद्वीप के अन्य दो बड़े देश, पाकिस्तान और बांग्लादेश भी धर्म की गिरफ़्त में हैं। पर भारत में इस तरह की स्थिति पैदा होना बहुत चौंकाने वाली और शर्मनाक है क्यों कि हमारे देश के लोगों ने राष्ट्रवाद को धर्म से जोड़ने के ख़िलाफ़ लगभग 50 साल लम्बा संघर्ष लड़ा। आज़ादी के बाद हम ने जो संविधान बनाया उसमें भी न्याय, समानता, मानव अधिकारों और लिंग समानता को ध्येय घोषित किया गया। धर्म के नाम पर देश के बंटवारे के बावजूद किसी एक धर्म का अधिप्तय न करके देश को एक आधुनिक, समावेशी और जनवादी संवैधानिक ढांचा दिया गया।

हमारे देश की राजनीति किस बुरी तरह से धर्मों के शिकंजे में है उस का अंदाज़ा आरएसएस/भाजपा के मौजूदा हुक्मरानों की घरेलू राजनीतिक नीतियों को देख कर भली-भांति लगाया जा सकता है। इन्हों ने खुला एलान किया है कि वे धर्म-निरपेक्षता में विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि हिंदुत्ववादी राजनीति के पक्षधर हैं। हिंदुत्ववादी राजनीति की उनकी अपनी व्याख्या के अनुसार, भारत केवल हिन्दुओं की पूज्य/पितृ-भूमि है जहाँ सिर्फ हिन्दुओं को बसने का अधिकार है। मुसलमान और ईसाई विदेशी धर्मों के अनुयायी हैं जिन्हें दोयम दर्जे का नागरिक होकर रहना होगा या देश छोड़कर जाना होगा। आरएसएस के कुछ नेताओं ने तो यह तक घोषणा कर डाली है कि साल 2021 तक भारत मुसलमानों और ईसाईयों से ख़ाली करा लिया जाएगा। इन के अनुसार सिखों, बौद्ध और जैनियों को भारत में रहने का अधिकार होगा कियोंकि वे स्वतंत्र धर्म ना होकर हिन्दू धर्म के ही भिन्न मत हैं।

घृणा और हिंसा से भरे इस मौजूदा माहौल को देखकर कई बार ऐसा लगता है मानो हिंदुत्ववादी राज के निशाने पर केवल मुसलमान और ईसाई समुदाय हैं। यह एक छोटा सच है। इस राज के पिछले चार साल इस शर्मनाक सच के भी गवाह हैं की इस काल में हिन्दू महिलाओं और दलितों (जिन का बहुत बड़ा हिस्सा हिन्दू है) पर ज़ुल्म भी कई गुना बढ़े हैं। देश के दो अल्पसंख्यक समुदाय हिंदुत्ववादी राज के सार्वजनिक निशाने पर हैं, लेकिन इस राज का हिन्दू महिलाओं और दलितों के बारे में जो एजेंडा है वे भी कोई कम दिल दहलाने वाला नहीं है। यहाँ पर क्योंकि हम महिलाओं के बारे में धर्म के अमानवीय दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं, इस लिए अपनी बात को इसी पर केंद्रित करेंगे।  

आरएसएस की विचारधारा में निपुण देश के हुक्मरानों ने हिन्दू समाज के बारे में जो सोच रखते हैं उसका एलान आरएसएस ने उस समय ही कर दिया था जब भारत की संविधान सभा ने नवम्बर 26, 1949 के दिन एक प्रजातान्त्रिक और धर्म-निरपेक्ष संविधान को हरी झंडी दी थी। आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र, 'ऑर्गनिज़र' ने नवम्बर 30, 1949 के अंक में एक सम्पादकीय के माध्यम से इस हिन्दू विरोधी संविधान को रद्द करते हुए यह मांग रखी कि 'मनुस्मृति' को देश के संविधान के तौर पर लागू किया जाए।

'मनुस्मृति' जिसे हिंदुत्व विचार के जनक, विनायक दामोदर सावरकर, ने वेदों के बाद हिन्दुओं की सब से पवित्र धार्मिक ग्रन्थ बताया था, हिन्दू औरतों के बारे में जो नियम लागू करने की बात करती है, उन में से कुछ को समझना ज़रूरी है।

महिलाओं के संबंध में मनु के क़ानून  ( Manu's law in relation to women )

1.       पुरुषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए। (9-2)

2.       स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए; एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। (9-3)

3.       बिगड़ने के छोटे से अवसर से भी स्त्रियों को प्रयत्नपूर्वक और कठोरता से बचाना चाहिए, क्योंकि न बचाने से बिगड़ी स्त्रियां दोनों (पिता और पति के) कुलों को कलंकित करती हैं। (9-5)

4.       सभी जातियों के लोगों के लिए स्त्री पर नियंत्रण रखना उत्तम धर्म के रूप में जरूरी है। यह देखकर दुर्बल पतियों को भी अपनी स्त्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। (9-16)

5.       ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है। यही कारण है कि पुरुष को पाते ही ये उससे भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं चाहे वे कुरूप हों या सुंदर। (9-14)

6.       स्वभाव से ही परपुरुषों पर रीझने वाली चंचल चित्त वाली और स्नेह रहित होने से स्त्रियां यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी पतियों को धोखा दे सकती हैं। (9-15)

7.       मनु के अनुसार ब्रह्माजी ने निम्नलिखित प्रवृत्तियां सहज स्वभाव के रूप में स्त्रियों में पाई हैं- उत्तम शैय्या और अलंकारों के उपभोग का मोह, काम-क्रोध, टेढ़ापन, ईर्ष्या द्रोह और घूमना-फिरना तथा सज-धजकर दूसरों को दिखाना। (9-17)

8.       स्त्रियों के जातकर्म एवं नामकर्म आदि संस्कारों में वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। यही शास्त्र की मर्यादा है क्योंकि स्त्रियों में ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग की क्षमता का अभाव (अर्थात् सही न देखने, सुनने, बोलने वाली) है। (9-18) यह केवल इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि 1998 से लेकर 2004 के बीच जब आरएसएस के ही एक वरिष्ठ सदस्य, अटल बिहारी वाजपयी की सरकार ने देश पर राज किया था और 2014 से प्रधान मंत्री मोदी जो पुराने आरएसएस मेंबर हैं और खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताते हैं, के नेतृत्व वाली सरकार के सत्तासीन होने के बाद से सारे देश में विशेषकर उत्तरी और पश्चिमी भारत में धार्मिक लोकप्रिय साहित्य की बाढ़ आयी हुई है जो हिन्दू औरत को इंसान का दर्जा देने से भी गुरेज़ करता है।

इस साहित्य की जानकारी महिलाओं की कभी न खत्म होने वाली त्रासदी के स्रोत को पहचानने में काफी मदद करेगी। यहाँ मतलब उस भौंडे और अश्लील साहित्य से नहीं है जो किसी भी शहर में फुटपाथों पर रंगीन-पन्नी में लिपटा खुलेआम मिलता है, बल्कि धार्मिक कहे जानेवाले उस साहित्य से है जो धार्मिक पुस्तक विक्रेताओं द्वारा आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से छापा जाता है और बड़े पैमाने पर बिक रहा है। इस का बड़े पैमाने पर वितरण धार्मिक प्रवचनों और सम्मेलनों के दौरान होता है। हिंदू स्त्री के जीवन उद्धार को लेकर 'गीता प्रेस', गोरखपुर के पास पुस्तकों का भण्डार है, जिन्हें प्राप्त करने के लिए किसी रेलवे स्टेशन पर जाना ही काफी है। गीता प्रेस को पुस्तकों की बिक्री के लिए देश के हर बड़े स्टेशन पर हमारे देश की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने स्टाल उपलब्ध कराये हैं।

गीता प्रेस की ‘नारी शिक्षा’ (28 संस्करण), ‘गृहस्थ में कैसे रहें’ (11 संस्करण), ‘स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा’ (32 संस्करण), ‘दांपत्य जीवन का आदर्श’ (7 संस्करण), और आठ सौ पृष्ठों में ‘कल्याण नारी अंक’ क़ाबिले-ग़ौर है, यह पुराना प्रकाशन है लेकिन आज-कल इस की खूब मांग है। ये पुस्तकें एक स्तर पर महिलाओं को निर्बल और पराधीन मानती हैं, जिस के कुछ नमूने हम नीचे देखेंगे।

"कोई जोश में आकर भले ही यह न स्वीकार करे परंतु होश में आकर तो यह मानना ही पड़ेगा कि नारी देह के क्षेत्र में कभी पूर्णतः स्वाधीन नहीं हो सकती। प्रकृति ने उसके मन, प्राण और अवयवों की रचना ही ऐसी की है। जगत के अन्य क्षेत्रों में जो नारी का स्थान संकुचित या सीमित दीख पड़ता है, उसका कारण यही है कि, नारी बहु क्षेत्र व्यापी कुशल पुरूष का उत्पादन और निर्माण करने के लिए अपने एक विशिष्ट क्षेत्र में रह कर ही प्रकारांतर से सारे जगत की सेवा करती रहती है। यदि नारी अपनी इस विशिष्टता को भूल जाए तो जगत का विनाश बहुत शीघ्र होने लगे। आज यही हो रहा है।"

हनुमान पोदार ‘नारी शिक्षा’ में इसी पहलू को आगे इस तरह रेखांकित करते हैं,

"स्त्री को बाल, युवा और वृद्धावस्था में जो स्वतंत्र न रहने के लिए कहा गया है, वह इसी दृष्टि से कि उसके शरीर का नैसर्गिक संघटन ही ऐसा है कि उसे सदा एक सावधान पहरेदार की जरूरत है। यह उसका पद-गौरव है न कि पारतन्त्रय।"

क्या स्त्री को नौकरी करनी चाहिए? बिल्कुल नहीं!

Should a woman get a job? off course not!

‘स्त्री का हृदय कोमल होता है, अतः वह नौकरी का कष्ट, प्रताड़ना, तिरस्कार आदि नहीं सह सकती। थोड़ी ही विपरीत बात आते ही उसके आंसू आ जाते हैं। अतः नौकरी, खेती, व्यापार आदि का काम पुरूषों के जिम्मे है और घर का काम स्त्रियों के जिम्मे।’

क्या बेटी को पिता की सम्पति में हिस्सा मिलना चाहिए?

Should the daughter get a share in father's wealth?

सवाल-जवाब के रूप में छापी गयी पुस्तिका ‘गृहस्थ में कैसे रहें’ के लेखक स्वामी रामसुख दास का जवाब इस बारें में दो टूक है,

‘हिस्सा मांगने से भाई-बहनों में लड़ाई हो सकती है, मनमुटाव होना तो मामूली बात है। वह जब अपना हिस्सा मांगेगी तो भाई-बहन में खटपट हो जाए इसमें कहना ही क्या है। अतः इसमें बहनों को हमारी पुराने रिवाज पिता की सम्पत्ति में हिस्सा न लेना ही पकड़नी चाहिए, जो कि, धार्मिक और शुद्ध है। धन आदि पदार्थ कोई महत्व की वस्तुए नहीं हैं। ये तो केवल व्यवहार के लिए ही हैं। व्यवहार भी प्रेम को महत्व देने से ही अच्छा होगा, धन को महत्व देने से नहीं। धन आदि पदार्थों का महत्त्व वर्तमान में कलह करानेवाला है और परिणाम में नर्कों में ले जानेवाला है। इसमें मनुष्यता नहीं है।’

क्या लड़के-लड़कियों को एक साथ पढ़ने की इजाजत दी जा सकती है?

Can boys and girls be allowed to read together?

उत्तर है नहीं, क्योंकि,

"दोनों की शरीर की रचना ही कुछ ऐसी है कि उनमें एक-दूसरे को आकर्षित करने की विलक्षण शक्ति मौजूद है। नित्य समीप रह कर संयम रखना असम्भव सा है।"

इन्हीं कारणों से स्त्रियों को साधु-संन्यासी बनने से रोका गया है -

"स्त्री का साधु-संन्यासी बनना उचित नहीं है। उसे तो घर में रह कर ही अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। वे घर में ही त्यागपूर्वक संयमपूर्वक रहें। इसी में उसकी उनकी महिमा है।"

दहेज की समस्या का समाधान भी बहुत रोचक तरीके से दिया गया है। क्या दहेज लेना पाप है? उत्तर है, "शास्त्रों में केवल दहेज देने का विधान है, लेने का नहीं है।"

बात अभी पूरी नहीं हुई है। "अगर पति मारपीट करे, दुःख दे, तो पत्नी को क्या करना चाहिए?" जवाब बहुत साफ है,

"पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म को कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप् में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ। पीहरवालों को पता लगने पर वे उसे अपने घर ले जा सकते हैं, क्योंकि उन्होंने मारपीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी।"

अगर पीहरवाले खामोश रहें, तो वह क्या करे?

"फिर तो उसे अपने पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए, इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है। उसे पति की मारपीट धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए। सहने से पाप कट जायेंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लगे।"

लड़की को एक और बात का भी ध्यान रखना खहिए,

"वह अपने दुःख की बाचात किसी से भी न करे नहीं तो उसकी अपनी ही बेइज्जती होगी, उस पर ही आफत आयेगी, जहाँ उसे रात-दिन रहना है वहीं अशांति हा जाएगी।"

अगर इस सबके बाद भी पति त्याग कर दे तो?

"वह स्त्री अपने पिता के घर पर रहे। पिता के घर पर रहना न हो सके तो ससुराल अथवा पीहरवालों के नजदीक किराये का कमरा लेकर रहे और मर्यादा, संयम, ब्रहाचर्यपूर्वक अपने धर्म का पालन करे, भगवान का भजन-स्मरण करे।"

अगर किसी का पति मांस-मदिरा सेवन करने से बाज न आये तो पत्नी क्या करे?

"पति को समझाना चाहिए...अगर पति न माने तो लाचारी है पत्नी को तो अपना खान-पान शुद्ध ही रखना चाहिए।"

अगर हालात बहुत खराब हो जाए तो क्या स्त्री पुनर्विवाह कर सकती है?

"माता-पिता ने कन्यादान कर दिया, तो उसकी अब कन्या संज्ञा ही नहीं रही, अतः उसका पुनः दान कैसे हो सकता है? अब उसका विवाह करना तो पशुधर्म ही है।"

पर पुरूष के दूसरे विवाह करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है,

"अगर पहली स्त्री से संतान न हो तो पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए केवल संतान उत्पत्ति के लिए पुरूष शास्त्र की आज्ञानुसार दूसरा विवाह कर सकता है। और स्त्री को भी चाहिए कि वह पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए पुनर्विवाह की आज्ञा दे दे।"

स्त्री के पुनर्विवाह की इसलिए इजाजत नहीं है क्योंकि,

"स्त्री पर पितृ ऋण आदि कोई ऋण नहीं है। शारीरिक दृष्टि से देखा जाए तो स्त्री में कामशक्ति को रोकने की ताकत है, एक मनोबल है अतः स्त्री जाति को चाहिए कि वह पुनर्विवाह न करे। ब्रहाचर्य का पालन करे, संयमपूर्वक रहे।"

इस साहित्य के अनुसार गर्भपात महापाप से दुगुना पाप है। जैसे ब्रह्म हत्या महापाप है, ऐसे ही गर्भपात भी महापाप है। अगर स्त्री की जान को खतरा है तो भी इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती-

"जो होनेवाला है, वो तो होगा ही। स्त्री मरनेवाली होगी तो गर्भ गिरने पर भी वह मर जाएगी, यदि उसकी आयु शेष होगी तो गर्भ न गिरने पर भी वह नहीं मरेगी।"

फिर भी कोई स्त्री गर्भपात करा ले तो?

"इसके लिए शास्त्र ने आज्ञा दी है कि उस स्त्री का सदा के लिए त्याग कर देना चाहिए।"

बलात्कार की शिकार महिलाओं को जो धर्म-उपदेश इस साहित्य में दिया गया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला और बलात्कारियों को बचाने जैसा है। इस सवाल के जवाब में कि यदि कोई विवाहित स्त्री से बलात्कार करे और गर्भ रह जाए तो, स्वामी रामसुखदास फरमाते हैं

"जहाँ तक बने, स्त्री के लिए चुप रहना ही बढ़िया है। पति को पता लग जाए, तो उसको भी चुप रहना चाहिए।"

सती प्रथा का भी इस साहित्य में जबरदस्त गुणगान है। सती की महिमा को लेकर अध्याय पर अध्याय हैं। सती क्या है, इस बारे में इन पुस्तकों के लेखकों को जरा-सा भी मुगालता नहीं है,

"जो सत्य का पालन करती है, जिसका पति के साथ दृढ़ संबंध रहता है, जो पति के मरने पर उसके साथ सती हो जाती है, वह सती है।"

 अगर बात पूरी तरह समझ न आयी हो, तो यह लीजिए,

"हिंदू शास्त्र के अनुसार सतीत्व परम पुण्य है इसलिए आज इस गये-गुजरे जमाने में भी स्वेच्छापूर्वक पति के शव को गोद में रख कर सानंद प्राण त्यागनेवाली सतियाँ हिंदू समाज में मिलती हैं।"

"भारतवर्ष की स्त्री जाति का गौरव उसके सतीत्व और मातृत्व में ही है। स्त्री जाति का यह गौरव भारत का गौरव है। अतः प्रत्येक भारतीय नर-नारी को इसकी रक्षा प्राणपण से करनी चाहिए।"

सती के महत्त्व का बयान करते हुए कहा गया है,

"जो नारी अपने मृत पति का अनुसरण करती हुई शमशान की ओर प्रसन्नता से जाती है, वह पद-पद पर अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करती है।" सती स्त्री अपने पति को यमदूत के हाथ से छीकर स्वर्गलोक में जाती है। उस पतिव्रता देवी को देख कर यमदूत स्वयं भाग जाते हैं।

हिन्दू औरत विरोधी यह साहित्य आरएसएस द्वारा संचालित किताबों की दुकानों पर भी उपलब्ध है।

धर्म के बेलगाम दौड़ते रथ के इस दौर में केवल हिन्दू औरत ही निशने पर नहीं है। हिन्दुओं के बाद देश के सब से बडे धार्मिक सम्प्रदाय, मुस्लमान सम्प्रदाय की औरतों को जन्नत का रास्ता दिखाने वाला साहित्य किसी भी मुस्लिम-बहुल इलाके में आसानी से हासिल किया जा सकता है।

मुसलमान औरतों को लेकर जो शर्मनाक साहित्य हमारे देश में उपलब्ध है, वह हिन्दू औरत विरोधी साहित्य से किसी भी मायने में उन्नीस नहीं है। दर्जनों उपलब्ध किताबों में से नमूने के तौर पर ‘मियां-बीवी के हकूक’ (मियां-बीवी के अधिकार) लेखकः मुफती अब्दुल गनी और ‘मुसलमान बीवी’ लेखकः इदरीस अंसारी को बाचने से ही साफ तस्वीर उभर कर सामने आ जाएगी। यह बात बहुत स्पष्ट करके बतायी गयी है कि "औरतें मर्दों की खेतिया हैं, वे इनका चाहे जैसा इस्तेमाल करें।" मुफती साहब फरमाते हैं,

"बस अपने आपको ग़ुलाम माने और शौहर को आक़ा। और अगर मान लो किसी वक्त शौहर हिंसा भी करे तो अपने अन्नदाता की हिंसा को सब्र से सहे।"

वे यह भी बताते हैं कि

"नर्क में बहुमत औरतों का ही होगा। औरत टेढ़ी पसली से पैदा की गयी है। सीधा करने की फिक्र मत करो, वरना टूट जाएगी। और न बिल्कुल आजाद छोड़ दो, नही तो और टेढ़ी हो जाएगी।"

इस्लाम धर्म का हवाला देते हुए बताया जाता है कि

"जिसका शौहर उससे नाखुश हो, उसकी नमाज कबूल नहीं की जाएगी। और जो औरत ऐसी हालत में मरे के उसका शौहर उससे नाराज रहा तो वह जन्नत में दाखिल न होगी।"

इदरीस अंसारी तो यह तक फरमाते हैं कि

"अगर पति संभोग के लिए बुलाये और बीवी मना कर दे तो फरिश्ते उस औरत को तब तक कोसेंगे जब तक वह समर्पण न कर दे।"

शौहर के साथ जिन्दगी कैसे बितानी चाहिए, इसके भी गुर बताये गये हैं-

"उसकी आँख के इशारे पर चला करो। मसलन शौहर हुक्म दे कि रात भर हाथ बाँधकर खड़ी रहो तो तकलीफ गवारा करके अख़रत [मौत के बाद का जीवन] की भलाई और सुर्खरूई हासिल करो। किसी वक्त कोई ऐसी बात न करो जो उसके मिजाज के खिलाफ हो। मसलन अगर वो दिन को रात बतला दे तो तुम भी दिन को रात कहने लगो।"

और

"जो औरत खुशबू लगाकर मर्दों के पास से गुजरती है, ऐसी औरत बदकार है। औरत परदे में रहने की चीज है। फिर जब वह अपने घर से बेपरदा निकलती है, तो शैतान उसे मर्दों की नजर में अच्छा करके दिखला देता है और बदमाश उस औरत को खूबसूरत समझ कर उसके पीछे लग जाते हैं।"

आगे चल कर यह भी बताया जाता है कि

"मर्द का हर झूठ लिखा जाता है, लेकिन मर्द अपनी बीवी को खुश करने के लिए बोले तो उसका कोई गुनाह उसे नहीं लगता।"

मुफती साहब की किताब में तो "औरत को मारने का हक़ (अधिकार)" शीर्षक से अलग से एक अध्याय ही है।

"शौहर को जबरदस्ती करने का भी हक़ है। वह सजा के तौर पर मार भी सकता है। लेकिन इतना न मारे के निशान पड़ जाए और बहुत तकलीफ पहुँचे। वह डंडे से भी मार सकता है।"

समानता, न्याय और व्यक्ति की गरिमा बनाए रखने की दुहाई देने वाले हमारे इस विशाल लोकतंत्र में औरत के बारे में इस तरह के हिंसक और उत्पीड़क विचार खुले आम फैलाये जा रहे हैं। औरत के खिलाफ प्रसारित किया जा रहा यह दर्शन, मानवीय अधिकारों की अंतराष्ट्रीय घोषणा, भारतीय संविधान, भारतीय पेनल कोड (IPC) और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CPC) की खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ा रहा है। औरतों के बारे में ऐसे विचारों से पुरूष प्रधान समाज के हर अंग की सहमति लगती है। जरा-जरा-सी बात पर पुस्तकों, चित्रों, फ़िल्मों, नाटकों और कविताओं पर प्रतिबंध लगानेवाले प्रजातंत्र की इस मामले में खामोशी का आखिर कुछ मतलब तो होगा ही।

हमारे देश में बाबाओं और धर्म गुरुओं द्वारा बलात्कार की घटनाओं की बाढ़ आयी हुई है, इस की एक बड़ी वजह औरत विरोधी साहित्य का बेलगाम प्रसार भी है।

हिन्दू औरत विरोधी साहित्य के प्रसार का एक शर्मनाक पहलू यह है कि भारतीय राज्य इस कुकर्म में सीधे तौर पर जुड़ा है। गीता प्रेस की महिलाओं पर किताबें गीता प्रेस की गाड़ियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट और सरकारी दफ़्तरों के अहातों में खुली बिकती हैं। इस का सब से ज़्यादा चौंकाने वाला दुखद सच यह है कि गीता प्रेस को देश के 88 बड़े रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर 'फ्री ऑफ़ चार्ज' अर्थात बिना कोई किराया वसूल किए हुए, आवंटित किए गए हैं।  

इस संबंध में एक और पहलू पर ध्यान देना जरूरी है। हिंदू-मुसलमान सांप्रदायिक और कठमुल्लावादी ताकतों ने हमारे देश को युद्ध का अखाड़ा बना रखा है। पर औरत के मामले में दोनों के विचारों में जबरदस्त समानता और एकता है। गीता प्रेस वाली महिलाओं की किताबों को मुस्लिम महिला विरोधी किताबों के खाते में लिख दें या इसका उलटा हो जाए तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता।

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