सपने में देखा - राम-राज्य की जगह गाय-राज्य आ चुका है

प्रधानमंत्री अच्छा वक्ता तो था लेकिन था बड़ा बड़बोला। ये बात गायें भी समझती थीं। अगर इंसानों का राष्ट्रवाद हो सकता है तो क्या गायों का भी? क्या गाय भी अपनी सेना बना सकती हैं? ...

हाइलाइट्स

प्रधानमंत्री अच्छा वक्ता तो था लेकिन था बड़ा बड़बोला। ये बात गायें भी समझती थीं।

अगर इंसानों का राष्ट्रवाद हो सकता है तो क्या गायों का भी?

क्या गाय भी अपनी सेना बना सकती हैं?

गायों की धर्म-जाति क्या है?

विवेक मेहता

समय बदल चुका है। गौ-युग की स्थापना हो चुकी है। हर क्षेत्र में गायों का बोलबाला है। इंसान अब मात्र नाम को ही रह गया है। यहां तक कि गौ-रक्षकों के पास भी अब कोई काम नहीं। गायें अपनी व अपने वंश की रक्षा स्वयं कर रही हैं। हां, गौ-रक्षकों के लिये गौ-रक्षक पेंशन योजना चलाई जा रही है, जिसके तहत उन्हें बाकी लोगों की अपेक्षा दो किलो गोबर व पाँच लीटर गौमूत्र ज्यादा मिलता है।

यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भारत-माता और कोई नहीं एक गाय है। लोग अब राम-राम की बजाए गाय-गाय से एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं और अगर कोई गलती से या जानबूझकर ऎसा ना करे तो हमेशा चौकस बैलों का झुंड अपने नुकीले सींगों की मदद से ऎसे लोगों को इस नियम की याद दिला देता है।

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी एक गाय विराजमान है और सुना है कि अब संवैधानिक मुहर के तौर पर राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे इंसान को हटाकर उसकी जगह एक बैल को लाने की तैयारी की जा रही है।

राम-राज्य की जगह गाय-राज्य आ चुका है। लेकिन ऐसा भी नहीं कि ये व्यवस्था बिना किसी राग-द्वेष, लड़ाई-झगड़े व कठिनाईयों के चल रही हो। पर उस पर बात बाद में पहले ये तो देख लें कि आखिर ये सब हुआ कैसे। इंसान माईनोरिटी में‌ कैसे आ गये।

विवेक मेहतासमय में‌ बहुत पीछे ना भी जाएं तो करीब सौ-दो सौ साल पहले, सारी दुनिया पर बाज़ारवाद-पूंजीवाद हावी था। ऐसा लगता था कि इस व्यवस्था का कोई विकल्प ही नहीं। लेकिन बाज़ारवाद-पूंजीवाद भी खतरे में‌ था। संकट गहरा था, लेकिन लोगों को इसका एहसास ना हो, इसलिये दुनियां‌ भर के देशों‌ की सरकारें अपने-अपने तरीके से लोगों‌ का ध्यान भटका रही थीं। हमारे देश में‌ एक प्रवाह था, सांस्कृतिक, बड़ा तेज। उसी की कई धाराएं गाय की "रक्षा" के नाम पर आए-दिन उत्पात, मार-पीट, दंगा-फसाद और यहां‌ तक कि लोगों की जानें भी ले रही थीं। उधर इसी प्रवाह से निकली सरकार व प्रभावित अदालतें भी नये नियमों व कानूनों से गाय-पालकों, जिनमें ज्यादातर किसान-मजदूर ही थे, के लिये गाय पालना व रखना मुश्किल बना रही थीं। जान-माल के डर से लोगों ने गाय पालना लगभग बंद ही कर दिया।

देश में‌ सड़कों पर गायों का संकट तो पहले से ही मौजूद था, लेकिन अब परिस्थिति विकट हो गई। सड़क दुर्घटनाओं में दसियो गुना बढ़ोतरी हो गई। परिवहन और पशु मंत्रालयों में तना-तनी की स्थिति बन गई। गौ-रक्षक भी परेशान थे कि आखिर किस मंत्री जी का साथ दें।

खैर PMO की दखल के बाद समस्या का उच्च स्तरीय हल निकाला गया। पॉलिसी बनाई गई कि PPP  मॉडल के तहत गायें पाली जायेंगी। पालिसी को बढ़ावा देने के लिये मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों ने अपने-अपने आवासों को तबेलों में‌ बदलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे आस-पास के इलाके भी तबेले-तबेले हो गये। सरकारी जमीनों खासतौर पर रेलवे और PSU की खाली पड़ी जमीनों को भी तबेलों में बदलने के लिये टेंडर निकाले गये।

एक नया अभियान और जुमला चला "मां का सम्मान, गाय पालो अभियान"। बड़े-बड़े उद्योग-घरानों ने CSR के पैसे तबेलों को देने शुरु कर दिये। अमीर लोगों ने खासतौर पर फिल्मी सितारों और क्रिकेटरों ने अपना फर्ज निभाते हुए तबेलों को गोद लेना शुरु कर दिया। कई इस नये अभियान के ब्रांड-एम्बेसेडर भी बन गये। कई NGO खुल गईं, सरकारी व गैर-सरकारी आर्थिक मदद का सही उपभोग, माफ कीजियेगा, उपयोग करने के लिये।

मीडिया का अब एक ही काम था, गाय पर नए-नए कार्यक्रम बनाना। ज़ाहिर है गायें फलने-फूलने लगीं और साथ ही चंद बड़े-बड़े लोग और बड़े हो गये।

दूसरी तरफ बड़े-बड़े अकादमिक विभागों, प्रयोगशालाओं व संस्थाओं में गाय से जुड़े विषयों पर शोध करने को ऐसा प्रोत्साहन मिला जैसा पहले कभी किसी भी विषय को नही मिला था। Thermodynaics of Cow, Cow Management, Cow Mechanics, गायों का समाजशास्त्र सरीखे गाय से जुड़े नए-नए कोर्सेस चालू किये गये।

गौमूत्र के अमृत होने की बात तो सदियों से सुनते आ रहे थे, लेकिन पहली बार एक अग्रणी संस्थान के नामी food scientist ने गोबर से रोटी बनाने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा। Proposal झट से मान लिया गया और बड़ी ग्रांट भी मिल गई।

अगर गोबर की रोटी बनाई जा सके तो फिर गेहूं उगाने की जरूरत ही क्या? वैसे भी किसानों के साथ सुलह करते-करते सरकार उक्ता गई थी, ऐसे में गोबर की रॊटी खाद्य सुरक्षा का अच्छा विकल्प हो सकता था। बस दिक्कत थी तो चावल खाने वालों से, तो उसका भी हल निकाला गया।

मीडिया-टीवी में विज्ञापनों के जरिये रोटी और चावल की तुलना कर चावल के लो-क्वालिटी होने की बात प्रसारित की जाने लगी।

ऐसे ही एक बड़े तकनीकी संस्थान के विदेश से पढ़कर आए युवा वैज्ञानिक ने अपना proposal सरकार को भेजा जो कुछ ऐसा था:

"हमारी माताएं यानी कि गायें, अपना ज्यादातर समय जुगाली करके बिताती हैं। कितना अच्छा हो अगर गायें अन्य गायों, बैलों व बछड़ों से हमारी तरह संवाद स्थापित कर सकें। कंप्यूटर की तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि हम गायों के लिये ऐसे उपकरण तैयार कर सकें। मेरा और मेरी टीम का मानना है कि ऐसा होने से गायों का जीवन और भी आनंदमय हो जाएगा और हम गायों के लिये एक आदर्श व्यवस्था बनाने की दिशा में अग्रसर होंगे।"

प्रस्ताव शानदार था, तकनीक का एकदम सही उपयोग। 200 करोड़ रुपये की शुरूआती ग्रांट दे दी गई।

सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने गाय से जुड़े ऐसे प्रयोगों व अनुसंधानों को बढ़ावा देने के लिये Noble पुरस्कार की तर्ज पर गौबैल पुरस्कार की स्थापना की। वैज्ञानिकों में अब ऐसे अनुसंधानों के प्रस्ताव व उससे निकल कर आये नतीजों को मंत्रालय में भेजने की होड़ लग गई।

एक प्रयोगशाला से खबर आई कि वहां के वैज्ञानिकों ने गाय के पूंछ के बालों के झुंड को robotic hand (कृत्रिम हाथ) में बदलने में सफलता पा ली है। अब अपना शरीर खुजलाने, मक्खियां भगाने व अन्य ऐसे कामों को गऊ माता आसानी से कर पाएंगी।

शासकों को लग रहा था कि ऐसे प्रस्तावों का समर्थन करके व अभियान चलाकर वो अपनी पकड़ सत्ता पर मजबूत कर रहे हैं। और सच में एक के बाद एक वो चुनाव भी जीत रहे थे। जनता जाने कैसे भ्रम में फंसी हुई थी।

गोबर रोटी मेकर तैयार कर लिया गया, जिसमें एक ओर से गोबर डालने पर दूसरे छोर से गर्मा-गर्म रोटियां निकलतीं। विदेशी व देशी कंपनियों को भारी मात्रा में ये मशीनें बनाने का ठेका दे दिया गया। गांवों, शहरों व कस्बों में कई मशीने लगवा दी गईं। जहां गौमूत्र तमाम बीमारियों का गाय-बाण ईलाज बतलाया जा रहा था तो गोबर की रोटी संपूर्ण पौष्टिक आहार।

अब सरकारों‌ को किसानों के लिये MSP तय करने की कोई दरकार ना थी। जरूरत थी तो गोबर की और गायों का ख्याल रखने की।

अच्छे से ख्याल रखने के उद्देश्य से गायों की गिनती करने के अत्याधुनिक तरीके भी बना लिये गये। पैदा होते ही बछड़ों के खुरों, आंखों व अन्य शारीरिक पहचानों की छाप लेकर उन्हें एक नंबर दे दिया जाता।

रोटी का हल निकल गया और बीमारियों का भी। सरकार को अब इन मदों पर पैसा खर्च करने की कोई जरूरत नहीं थी।

उधर गायें भी खुश थीं, अब वो कम्प्यूटर के जरिये एक दूसरे से संवाद कर पा रही थीं, और उनके पास इंसानों जैसा एक हाथ भी था। वैसे उनके खुश होने के कुछ ऐसे कारण भी थे जिनका अंदाजा इंसानों को नहीं था।

गायें अपने हाथों से कुछ ऐसे अनुभव भी कर रहीं थी जिनका असर सीधे उनके दिमाग पर हो रहा था। तिस पर वो सारे अनुभव साझा भी कर रही थीं। हाथों से मिले अनुभव व उन अनुभवों को अन्य गायों से साझा करने के चलते उनके मस्तिष्क का विकास कुछ ज्यादा ही तेजी से हुआ और कुछ पीढ़ियों में ही उनका दिमाग इंसानों जितना विकसित हो गया। गायों की नई पीढ़ियों ने इंसानी भाषा भी सीख ली।

गायों की इसी आगे बढ़ी हुई पीढ़ी ने ही असल में‌ गौ-राज की नींव रखी। जहां‌ इंसानी पीढ़ियां सवाल पूछने से डर रही थीं, वहीं गायों की ये उत्सुक पीढ़ी चुपचाप अपने दिमागों में उठने वाले सवालों के जवाब खोजने में लगी हुई थी। किसी ने सोचा कि जब हम आपस में एक-दूसरे से बात कंप्यूटर के जरिये करते हैं तो सीधे कंप्यूटर से बात क्यूं नहीं कर सकते। थोड़ी सी ही कोशिश में उसने हल निकाल लिया और बाकी सभी से साझा भी कर दिया।

अब अधिकतर नई पीढ़ी की गायें दिनभर कंप्यूटर से बात करती रहती और अपने सवालों के हल खोजती। किसी ने पाया कि इंसानी भाषा में कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका इस्तेमाल इंसान इन दिनों कुछ ज्यादा ही कर रहा है -- राष्ट्रवाद, सेना, धर्म-जाति। उसके दिमाग में सवाल उठे कि अगर इंसानों का राष्ट्रवाद हो सकता है तो क्या गायों का भी? क्या गाय भी अपनी सेना बना सकती हैं? गायों की धर्म-जाति क्या है?

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सवाल कठिन थे तो उसने बाकी गायों से साझा कर दिये। जिस दौरान इंसान अपने-अपने घरों‌ में टीवी के सामने बैठकर सास-बहू के कारनामे देख रहे थे, वहीं हर एक तबेले में इन सवालों पर चर्चा, विचार-विमर्श होने लगे।

भले ही इन सवालों का कोई एक जवाब गायों को नहीं मिला लेकिन उनमें एक सामूहिकता का एहसास तो जगा ही। हम सब गौ-वंश के हैं -ऐसी भावना जागी।

ऐसे ही एक अन्य गाय ने कंप्यूटर के जरिये यह जानना चाहा कि भारत में गायों की संख्या कितनी है? उस समय तक गोबर की रोटी और गौमूत्र की कृपा से गायों की जनसंख्या इंसानों से ज्यादा हो चुकी थी।

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ये खबर तमाम तबेलों में आग की तरह फैली। एक नए बछड़े ने सवाल किया कि जब इस देश में‌ हमारी संख्या इंसानों से ज्यादा है तो फिर majority तो हमारी हुई। इस देश पर हमारा शासन होना चाहिये। हम इंसानों से किसी मामले में कम नहीं, उल्टा इंसान हम पर पूरी तरह निर्भर है। उस पर इंसान हमें अपने से ऊंचा दर्जा देता है वरना एक इंसान दूसरे इंसान को हमारे लिये मारता ही क्यूं?

ये सवाल भी तमाम तबेलों में पहुंचा। एकमत उभरकर आया कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर तो गाय को ही बैठना चाहिये।

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अब सवाल था कि वो गाय कौन सी होगी। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर गाय को बैठाने की जो योजना बनाई गई उसके अनुसार प्रधानमंत्री के तबेले में रहने वाली एक युवा गाय सबकी पहली पसंद थी।

असल में‌ अपने तबेलों की तमाम गायों को लेकर प्रधानमंत्री रैलियों में जाया करता थे। वोट मांगने के लिये इन गायों को दिखा-दिखाकर योजनाओं व कामों का जिक्र करते। सबसे तगड़ी और सुंदर होने के कारण आगे वही युवा गाय होती थी। गायों का काम होता था कि इन रैलियों में show-piece बनकर जाएं और प्रधानमंत्री की हां‌ में हां मिलाएं।

प्रधानमंत्री अच्छा वक्ता तो था लेकिन था बड़ा बड़बोला। ये बात गायें भी समझती थीं।

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अगली रैली का दिन - गायों ने अपनी योजना बनाकर तैयारी कर ली थी। आज की रैली पूरे देश, हर तबेले में दिखलाई जा रही थी। प्रधानमंत्री तकनीक का सहारा लेकर यत्र-तत्र सर्वत्र होने वाले थे। प्रधानमंत्री की गुप्त पुलिस ने खबर दी थी कि इन दिनों गायें गर्मी से ज्यादा परेशान हैं इसीलिये दिन भर कंप्यूटर रूमों में बैठी रहती हैं। तो प्रधानमंत्री इस रैली में पुरानी योजनाओं के बीच तबेलों में AC लगवाने की अपनी नई योजना का जिक्र करने वाले थे।

जब प्रधानमंत्री गायों के आपसी संवाद की व्यवस्था व उनके हाथों का जिक्र कर अपनी बात आगे बढ़ाने ही वाले थे तब गायों में से एक ने खड़े होकर कहा कि हमारी एक इच्छा और है जो हम जानते हैं कि सिर्फ आपके रहते ही पूरी हो सकती है।

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प्रधानमंत्री मन ही मन मुस्कुराए; उन्हें तो पहले से ही पता था कि गायों को तबेलों में AC चाहिये, तो उन्होंने उस गाय को माईक पर बुलाते हुए अपने माथे का पसीना पोंछते हुए देश की तमाम जनता से कहा

"भाईयों और बहनों! मां भगवान का रूप होती है। आज मेरी गऊ मां‌ ने पहली बार मुझसे कुछ मांगा है। अब तक तो जो हमें सही लगा वो हमने मां के लिये किया, लेकिन आज मां‌ खुद कुछ मांग रही हैं। मां‌ आईये, माईक पर आईये। मैं आपके गोबर, मूत्र व दूध की सौगंध खाकर कहता हूं कि आपकी हर बात पूरी होगी। ये बेटा आपकी इच्छा पूरी करने के लिये अपने सीने पर गोली भी खा लेगा, मां।"

लेकिन गाय जो मांगने वाली थीं, वो तो गुप्त पुलिस के लिये भी गुप्त था। उस गाय ने माईक के सामने आकर कहा,

"हमारा गौ-वंश चाहता है कि आज के बाद से भारत-वर्ष के प्रधानमंत्री के पद पर एक गाय ही आसीन हो। इस देश को अपनी खोई हुई गरिमा तक पहुंचाने के लिये ये अत्यावश्यक है।"

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जैसे ही गाय ने अपनी बात खत्म की, योजना मुताबिक रैली में आई तमाम गायों के साथ-साथ देश भर के तबेलों की गायों, बैलों और बछड़ॊं ने एक स्वर में इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया। और तो और देश भर की जनता भी उनकी हां में हां मिलाने लगी।

दरअसल मंच से उठी हर बात पर हां कहने की उनकी आदत बन गई थी, ना कहना तो उन्हें आता ही ना था और ना ही सिखाया गया था।

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प्रधानमंत्री के तो मानो गले की हड्डी; ना निगली जाए ना उगली। अपनी ही रैली में फंस गये। कुछ देर तो चुप रहे। फिर आंखों में आंसू भर के सर नीचा किये हिलाते रहे। अंतत: बोले -

"ना जाने कब से मेरे मन में ये दबी इच्छा थी कि आप जो मांग रही हैं, वैसा हो जाए। मैं धन्य हो गया मां, कि आपने मेरे जीते जी ही मेरी मन की अंतिम इच्छा भी पूरी कर दी।"

वो दिन है और आज का दिन; प्रधानमंत्री की कुर्सी से शुरु होकर गायें हर एक कुर्सी पर बैठ गईं - मंत्री, मुख्य-मंत्री, राज्यपाल, सेना-प्रमुख, कुलपति।

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आज गायें हर जगह अग्रणी भूमिका में जरूर हैं लेकिन उनके विरोधी भी कम नहीं। सबसे तगड़ा सशस्त्र विरोध भैसों की तरफ से हुआ। हालांकि तकनीकी तौर पर वो गायों से पीछे हैं लेकिन शारीरिक रूप से कहीं‌ ज्यादा मजबूत। उनका मानना है कि इस धरती के वही असली काले हैं। फिर उनका दूध भी कहीं ज्यादा ताकतवर है फिर गायें कैसे माता बन गईं।

गायों को कुर्सी से उतारने के लिये सदा प्रयासरत भैसों ने देश के कई ईलाकों‌ पर कब्जा कर रखा है। इन बीहड़ जगहों पर गायों‌ का कोई जोर नहीं।

दूसरा विरोध शांतिप्रिय बकरियों की तरफ से है। लेकिन चूंकि ये शांतिप्रिय है इसलिये गायें इसे तव्वज़ो नहीं देती। बकरियों के पास एक ही तर्क है - चूंकि राष्ट्रपिता हमारा दूध पीते थे इसलिये हम ही भारत की असली माता हैं।

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तीसरा विरोध गधियों की तरफ से हुआ। कमला भागवत के शोध को दिखाकर वो ना जाने कब से चिल्ला रही हैं कि एक नवजात इंसान के बच्चे के लिये मां के दूध के बाद गधी का दूध ही सबसे हल्का होता है। इसलिये बच्चों के लिये बनाए जा रहे खानों में उनके दूध का इस्तेमाल हो। लेकिन उनकी भी कोई नहीं‌ सुन रहा। अब सुना है कि गधियां अपना आंदोलन तेज करने जा रही हैं।

उधर गायों ने भी हल सोच कर रहा है - बाबा गायदेव ने सुझाया है कि गधियों से समझौता कर हम दूध की ब्रांडिग "G - milk" नाम से करते हैं। G for गाय और G for गधी। लोग क्या जानेंगे कि वो किसका दूध पी रहे हैं।

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लेकिन इन तमाम विरोधों के बीच गायें खुद अपनी ही बिरादरी से परेशान हैं। गायें इतनी ज्यादा हो गई हैं कि संभालना मुश्किल हो गया है। हद तो तब हो गई जब हिलामय की चोटियां भी दूर से गोबर की वजह से सफेद की जगह काली नज़र आने लगी। गायों ने अपने तबेले वहां भी बना लिये थे। सीमा पार के देश शिकायत कर रहे हैं कि जब देखो भारत की गायें उनकी सीमा में घुस जाती हैं। युद्ध का खतरा मंडरा रहा है; मिनिस्टर गायें परेशान हैं। किसी कैबिनट मीटिंग में एक बैल ने सुझाया कि क्यूं ना ऐसा आटोमैटिक सिस्टम बनाएं कि जैसे ही कोई गाय सीमा पार जाए उसका रिकार्ड database से साफ हो जाए। जब पड़ोसी देश हमसे कहेंगे कि ये आपकी गायें हैं तो हम कह सकते हैं कि हमारी नहीं हैं। इस पर अन्य मंत्रियों ने कहा कि भाई ऐसे तो हमारा भी रिकार्ड भी साफ हो जायेगा क्यूंकि हम भी तो सीमा-पार जाते रहते हैं अपने कामों के चलते।

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हल निकाला गया कि गायों का वर्गीकरण किया जाये -- आम गाय और खास गाय। उनके लिये नियम भी अलग-अलग और कायदे भी। लेकिन अब ये बात धीरे-धीरे आम गायों को भी समझ आने लगी है। विरोध वहां भी सुलग रहा है।

जाने कब तक चलेगी ये व्यवस्था

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