आधार से नागरिकों की जान माल को भारी खतरा। तेरह करोड़ नागरिकों की जानकारी लीक

कारपोरेट दुनिया में नागरिकों के कोई अधिकार नहीं होते। कारपोरेट दुनिया में मानवाधिकार भी नहीं होते।...

हाइलाइट्स

सबकुछ राष्ट्र के नियंत्रण में होने के बजाय सबकुछ राष्ट्र के नियंत्रण से बाहर निजी, कारपोरेट पूंजी, प्रोमोटरों , बिल्डरों, माफिया और आपराधिक तत्वों के नियंत्रण में होता जा रहा है , जिससे नागरिक और राष्ट्र दोनों संकट में हैं, हालांकि निरंकुश सत्ता और सत्ता वर्ग को कोई खतरा नहीं है, कोई चुनौती भी नहीं है।

पलाश विश्वास

तेरह करोड़ आधार कार्ड की जानकारी लीक हो गयी है और सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार ने यह मान लिया है।

भारत सरकार के मुताबिक आधार प्राधिकरण के पोर्टल से यह लीक नहीं हुई है।

गौरतलब है कि भारत में आधार परियोजना बिना संसदीय अनुमति के मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल में शुरू हुआ जिसके लिए कोई कानून भी तब बनाया नहीं गया जो संघी कार्यकाल में बना लिया गया है।

तबसे लेकर आधार कार्ड बनाने का काम निजी और कारपोरेट कंपनियों ने किया है।

अनिवार्य सेवाओं से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना करके आधार नंबर लागू कर दिये जाने से राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों ने भी अफरातफरी में व्यापक पैमाने पर जो आधार कार्ड बनवाये, वे भी सरकारी एजंसियों के बजाये ठेके की एजंसियों से बनवाये गये हैं, जिसमें सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं हुआ है।

सरकार जब तेरह करोड़ लीक होने की बात सुप्रीम कोर्ट में मान रही है तो निजी कंपनियों और एजंसियों की तरफ से बनाये आधार कार्ड और निजी कंपनियों की ओर से तैयार किये गये स्मार्ट आधार कार्ड से किस हद तक लीक हो गयी है, आधार के जरिये डिजिटल लेनदेन चालू हो जाने पर भुक्तभोगी ही इस महसूस कर सकेंगे और फिलहाल राजनीतिक दलों, राजनेताओं, मीडिया, बुद्धिजीवियों और भारत की धर्मोन्मादी बहुसंख्य आम जनता को नागरिकों की जान माल को इस अभूतपूर्व खतरे से कोई फर्क नहीं पड़ा है क्योंकि उपभोक्ता बाजार और उपभोक्ता संस्कृति के अभूतपूर्व विकास के दौर में स्वतंत्रता और संप्रभुता कोई मुद्दा बन नहीं सकता।

अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक कोई भी व्यक्ति नागरिकता से वंचित नहीं किया जा सकता है और न नागरिक मानवाधिकार से।

आधार नंबर अनिवार्य बना दिये जाने पर नागरिकता, नागरिक और मानवाधिकार से भी आधार नंबर न होने की स्थिति में मनुष्य वंचित है। यानि नागरिक सिर्फ आधार नंबर है।

आधार नंबर न हुआ किसी नागरिक का कोई वजूद ही नहीं है। उसके कोई नागरिक, संवैधानिक, मौलिक या मानवाधिकार नहीं हैं। वह किसी बुनियादी सुविधाओं का हकदार नहीं है और न उसे रोटी रोजी का कोई हक है।

फिर यह नंबर हुआ तो नागरिकों की कोई गोपनीयता नहीं है। संप्रभुता नहीं है। स्वतंत्रता नहीं है। उसकी तमाम गतिविधियों की पल पल निगरानी है।

भारत में अब नागरिकों के सपनों, आकांक्षाओं, विचारों, मतामत, विवेक और जीवन यापन सबकुछ नियंत्रित है। यह नियंत्रण राष्ट्र का जितना है, उससे कही ज्यादा आपराधिक तत्वों और निजी कारपोरेट देशी विदेशी कंपनियों का है जबकि आधार योजना का असल मकसद राष्ट्र और जनता के संसाधनों की खुली लूट है, जल जंगल जमीन, आजीविका और रोजगार से अनंत बेदखली है।

इसके विपरीत भारत सरकार का मानना है कि नागरिकों की निजी बायोमेट्रिक तथ्यों पर उनका कोई अधिकार नहीं है और न ही उनका अपने शरीर, अपनी निजता और गोपनीयता का कोई अधिकार है। विभिन्न कानूनों का हवाला देते हुए भारत सरकार नें सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी है।

इस बयान के बाद भी भारत की संसदीय राजनीति में कोई हलचल प्रतिक्रिया नहीं है तो समझ लीजिये कि राजनीति किस तरह आम जनता के खिलाफ है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में आधार का बचाव करते हुए भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने मंगलवार को कहा कि किसी भी व्यक्ति का अपने शरीर पर मुकम्मल अधिकार नहीं है।

इसके संदर्भ में गौरतलब है कि बेंगलुरू के सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी ने 13.5 करोड़ आधार कार्ड का डाटा लीक होने की आशंका जाहिर की है।

इसका उल्लेख करते हुए संघ सरकार के घटक शिवसेना के मुखपत्र सामना में लिखा गया है कि यदि संस्था का दावा सच है तो यह एक गंभीर मामला है। 'मजे की बात है विपक्ष के खेमे में सिरे से सन्नाटा है।

सामना के संपादकीय में आगे लिखा है,

'आजकल सरकारी अनुदान, बैंक खाता, डाक व्यवहार के साथ ही अन्य कई जगहों पर आधार कार्ड के लीक होने का मतलब महत्वपूर्ण गोपनीय जानकारी लीक होना है। ऐसा होता रहा तो इसकी सुरक्षा के दावे पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। '

आधार की सुरक्षा पर बात करते हुए इसमें आगे लिखा है,

'सच तो यह है कि जिस सरकारी वेबसाइट से यह डेटा लीक हुआ है, उन विभागों को केंद्र सरकार ने सूचना दी थी। तीन विभागों ने अपनी गलतियां दूर तो कीं लेकिन जानकारियां लीक होने का खतरा बना हुआ है। इसका खामियाजा लाखों लोगों को उठाना पड़ रहा है। इसका विचार कौन करेगा?'

यह सरासर नागरिक, मानवाधिकारों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय कानून का भी खुल्ला उल्लंघन है।

इस पर तुर्रा यह कि नागरिकों से उनकी आजादी छीनने के इस कारपोरेट उपक्रम क खिलाफ सारे के सारे संसदीय राजनीतिक दल और राजनेता खामोश हैं।

नतीजतन करीब तेरह करोड़ नागरिकों क आधार और बैंक खातों के तथ्य लीक हुए हैं और क्रेडिट डिबिट एटीएम कार्ड की तरह आधार कार्ड भी डुप्लिकेट बन रहे हैं, उसकी व्यापक पैमाने पर क्लोनिंग हो रही है। अर्थात राष्ट्र के निरंकुश नियंत्रण के बजाय वित्तीय गतिविधियों पर आपराधित तत्वों का नियंत्रण हो गया है।

आधार प्राधिकरण से विभिन्न कारपोरेट कंपनियों के नागरिकों के निजी तथ्यों के लेनदेन के समझौते भी हुए हैं। अभी आपको मेल या फोन पर विभिन्न कंपनियों की ओर से उनकी सेवाएं खरीदने के लिए जो संदेश मिलते हैं, उसके लिए उन्हें सारी जानकारी आपके आधार नंबर से मिलती है।

धड़ल्ले से ऐसा संदेश भेजने वालों को न सिर्फ आपकी क्रय क्षमता बल्कि आपके बैंक खातों के बारे में भी जानकारी रहती है और आपको बड़े लोन और दूसरी वित्तीय सुविधाओं का प्रस्ताव भी उसी आधार पर मिलता है।

इससे उपभोक्ता बाजार और ई बिजनेस, डिजिटल लेनदेन बहुत तेजी से बड़ा है लेकिन इन पर न भारत सरकार और न रिजर्व बैंक का कोई नियंत्रण है जो आगे चलकर भारी आर्तिक अराजकता पैदा कर सकती है और इसमें समूची बैंकिंग प्रणाली ही ध्वस्त हो सकती है।

आपराधिक तत्वों के हाथों में निजी कंपनियों की ओर से बनाये गये और ठेके पर गैरसरकारी एजंसियों से बनाये गये आधार कार्ड के जरिये व्यापक पैमाने पर नागरिकों के गोपनीय तथ्य आ गये हैं। यह कानून और व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि आधार नंबर मोबाइल नंबर के लिए मोबाइल कनेक्शन की दुकानों के हवाले भी करना अनिवार्य हो गया है। हर जरूरी सेवाओं के निजीकरण कारपोरेटीकरण की स्थिति में आधार नंबर के जरिये नागरिकों की सारी जरूरी जानकारियां अजनबी और आपराधिक तत्वों के हवाले हो रही हैं, जो किसी भी तौर पर राष्ट्र या सरकार का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

जब बैंकों के एटीएम डेबिट क्रेडिट कार्ड धड़ल्ले से पिन लीक हो जाने से रद्द किये जा रहे थे, तब भी कोलकाता और मुंबई में बड़े बैंक अधिकारियों और आम बैंक कर्मचारियों से हमारी इस बारे में बात होती रही है।

उन सभी का कहना है कि चेकबुक से लेकर कार्ड और खातों को लेकर बैंकों का सुरक्षा इंतजाम बहुत पुख्ता है।

तब हमने पैनकार्ड और बैंक खातों से आधार नंबर जोड़ने का हवाला देकर पूछा था कि आधार नंबर से तो सारी जानकारियां लीक हो रही हैं और आधार लिंक के जरिये तथ्यों चुराये जाने पर बैंक खातों, कार्डों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर सकता है।

उनके पास इसका कोई जबाव नहीं था।

गौरतलब है कि पिन चुराये जाने के मामले में जांच का नतीजा अभी तक नहीं आया है और इसी बीच आधार के जरिये नये सिरे से बैंको के खातों की जानकारियां लीक हो जाने की खबर आ गयी है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि अब भारत सरकार डिजिटल लेन देन आधार नंबर के जरिये चालू करने जा रही है। बार बार आधार नंबर से लेनदेन की स्थिति में अब तक हुए फर्जीवाड़े के मद्देनजर नागरिकों की जान माल को भारी खतरे का अंदेशा है।

गौरतलब है कि साइबार क्राइम या फर्जीवाड़े से बैंको के खातों से चुराये जाने वाले रकम के लिए बैंक कोई मुआवजा नहीं दे रहा है।

प्लेटिनम कार्ट पर अधिकतम डेढ़ लाख रुपये के मुआवजे का प्रावधान है। जबकि आर्थिक लेन देन बैंकिंग के दायरे से बाहर चली जा रहीं है।

जब आधार योजना की पहले पहले चर्चा चली थी, नागरिकता संशोधन कानून के तुरंत बाद और श्रम कानून कर सुधार कानूनों के आर्थिक सुधार लागू होने से पहले, तभी से हम इस बारे में लगातार लिखते बोलते रहे हैं।

डिजिटल इंडिया में उदारीकरण, निजीकरण और ग्लोबीकरण के तहत आटोमेशन के लिए आधार योजना सबसे कारगर हथियार है।

कारपोरेट दुनिया में नागरिकों के कोई अधिकार नहीं होते।

कारपोरेट दुनिया में मानवाधिकार भी नहीं होते।

मुक्तबाजार में विकास और वृद्धि दोनों का मतलब उपभोक्ता बाजार का विस्तार है। विकास और वृद्धि दोनों सत्ता के जाति वर्ग वर्चस्व के एकाधिकार को बहाल करने का इंतजाम है।

अंध राष्ट्रवाद की अस्मिता राजनीति में खंडित भारतीयता और देशभक्ति के भक्तों के लिए नागरिकों की स्वतंत्रता, संप्रभुता, निजता और गोपनीयता को कोई मतलब नहीं है। वे लोग हर क्षेत्र में राष्ट्र का नियंत्रण के पक्ष में हैं।

वंचित उत्पीड़ित जनसमुदायों अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और स्त्रियों के प्रति जाहिर सी बात है कि इन भक्तों की किसी किस्म की सहानुभूति नहीं है। वे राष्ट्र और सत्ता में कोई फर्क भी नहीं समझते और सत्ता को ही राष्ट्र मानकर चलते हुए निरंकुश सत्ता के साथ निरंकुश सैन्य राष्ट्र के पक्ष में धर्मोन्मादी बहुसंख्यक सुनामी है जिसका फिलहाल कोई राजनैतिक या वैचारिक विकल्प नहीं दीख रही है।

दिक्कत यह है कि सबकुछ राष्ट्र के नियंत्रण में होने के बजाय सबकुछ राष्ट्र के नियंत्रण से बाहर निजी, कारपोरेट पूंजी, प्रोमोटरों , बिल्डरों, माफिया और आपराधिक तत्वों के नियंत्रण में होता जा रहा है , जिससे नागरिक और राष्ट्र दोनों संकट में हैं, हालांकि निरंकुश सत्ता और सत्ता वर्ग को कोई खतरा नहीं है, कोई चुनौती भी नहीं है।

हमारे मित्र मशहूर पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा हैः

'आधार' निराधार नहीं है। इसके पीछे राज्य के लगातार निरंकुश होते जाने और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों(यहां तक कि आपका अपने शरीर पर भी अधिकार नहीं है: भारत के अटार्नी जनरल के मुताबिक) के छिनते जाने की पूरी दास्तान है। पर जनता इसके विरोध में सड़कों पर नहीं उतर रही है क्योंकि 'आधार' के नाम पर राज्य कथित सुविधाओं का झुनझुना जो बजा रहा है! क्या राज्य की तरफ से कोई भी उच्चाधिकारी बता सकता है कि 'आधार' से कौन-कौन सी नयी सुविधाएं नागरिक को मिली, जो इसके न रहने पर नहीं मिल सकती थीं? 'आधार' संवैधानिक लोकतंत्र में निरंकुशता की अवैध संतान है, जिसका प्रसव यूपीए काल में हुआ और अब उसे शैतान बनाने का काम एनडीए सरकार कर रही है!

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