इस मोदीवादी फासीवाद को 1975-77 के समय की इमरजेंसी की तरह नहीं हरा सकते

Gp Capt KK Singh
Updated on : 2018-08-30 20:10:20

इस मोदीवादी फासीवाद को 1975-77 के समय की इमरजेंसी की तरह नहीं हरा सकते

पुलिस द्वारा जन आंदोलनों से जुड़े मानवाधि‍कार और जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं को बिना शर्त फ़ौरन रिहा करो

Gp Capt KK Singh

28 अगस्त की सुबह मुंबई, दिल्ली, रांची गोवा, हैदराबाद जैसे विभिन्न शहरों करीब-करीब एक साथ में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के घर पुणे पुलिस ने छापे मारे और पांच कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। पुणे पुलिस ने दिल्ली में मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार गौतम नवलखा और सुधा भारद्वाज, हैदराबाद में लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता पी वरावरा राव, मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ता वेरनॉन गोंजाल्विस, सुज़ेन अब्राहम, पत्रकार क्रांति टेकुला और अरुण फरेरा, रांची में सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी के घरों की तलाशी ली गयी, गोवा में सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक आनंद तेलतुम्बड़े के घर पर भी तलाशी की लिये पहुंची थी।

मीडिया में छपी रिपोर्ट के अनुसार अलग अलग शहरों में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के घर पुणे पुलिस ने छापे मारे हैं, और उन्हें हिरासत में लेने की भी ख़बर है। पुलिस के अनुसार यह गिरफ़्तारी जनवरी 2018 में भीमा-कोरेगांव में हुए प्रदर्शन और उसके बाद हुई हिंसा के सन्दर्भ में की गई है।

जिन लोगों के घर छापे मारे गये हैं और गिरफ्तार/हिरासत में लिया गया है, वे सभी जन आन्दोलनों और जनवादी अधिकारों और देश में हो रहे दलित, आदिवासियों के हक में और कॉर्पोरेट द्वारा ज़मीन हथियाने, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के खिलाड़ सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। आज की घटना 6 जून को की गयी अधिवक्ता सुरेन्द्र गड्लिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, सामाजिक कार्यकर्त्ता सुधीर धावले, रोना विल्सन तथा महेश राउत की गिरफ़्तारी का ही अगला क्रम है।

यहाँ बताना भी ज़रूरी है कि भीमा कोरेगांव की हिंसा की शुरूआती जांच में हिंदुत्ववादी नेता मनोहर उर्फ़ संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे को इस हिंसा का मुख्य आरोपी बताया जा रहा था, लेकिन जून में पुलिस ने दावा किया कि जनवरी में हुई इस हिंसा के पीछे ‘नक्सल और उनसे हमदर्दी’ रखने वाले शामिल हैं। इन घटनाओं से सरकार का फासीवादी चेहरा पूरी तरह से उजागर हो चुका है। भीमा कोरेगांव तो केवल बहाना है, असली मकसद उन सभी आवाज़ को दबाना है जो देश की गरीब शोषित और उत्पीडित जनता के पक्ष में उठ रही है।

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है एक सुनिश्चित योजना के तहत उसने सभी जनवादी और सरकार की नीतिओं के विरोध करने वाले स्वर को दबाने का सिलसिला जारी रखा है। कभी देशभक्ति, भीमा कोरेगांव, शहरी माओवाद के अलग अलग शिगुफे का और फिर मीडिया ट्रायल, झूठी ख़बरों द्वारा चरित्रहनन और सोशल मीडिया पर फर्जी सूचना को फैलाकर सभी तरह के प्रतिरोध के स्वर को ख़त्म करने की साजिश बड़े पैमाने पर चल रही है। लोगों के दिमाग में हर उस संघर्ष जो कॉर्पोरेट के हित के विरोध में जनता की पैरवी करने वाली जनपक्षधर समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ ज़हर घोला जा रहा है।

हम यह भी पाते हैं कि जब भी सरकार संकट में होती है तो इस तरह की घटनायें बढ़ जाती हैं। जनपक्षधर कार्यकर्ताओं पर हमले की साजिश में सरकार पूरी तरह से लिप्त है। पिछले सालों में दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा हमले में आई तेज़ी और हमलावरों पर कोई कार्यवाही भी इस बात का सबूत है कि इन संगठनों को किस का प्रश्रय मिला हुआ है। जिन लोगों को जेल में होना चाहिये था उन सबों पर सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की और जिन्हें गिरफ्तार भी किया गया, उन्हें तुरंत ही बेल दे दी गई, वहीं दूसरी ओर गरीबों, दलितों और आदिवासीयों तथा उनकी आवाज़ उठाने वाले बुद्धिजीविओं, कार्यकर्ताओं, और तो और अदालत में उनका केस लड़ने वाले वकीलों को भी यह सरकार जेल के सलाखों के पीछे डाल रही है।

यह है इस देश में फासीवाद का नया दौर, जिसमें हर सम्पदा, संसाधन मुट्ठी भर पूंजीपतियों के मुनाफ़े के लिये है. सरकार और सरकारी तंत्र तथा “प्रजातंत्र” के हर स्तम्भ भी उन्ही के लिए काम कर रहे हैं. भाड़े के गुंडे और कुछ बेरोजगार, पथभ्रष्ट युवक इस फासीवाद के साथ हैं, पैसे और ताकत के लोभ में. कुछ हिस्सा अवश्य इस प्रतिक्रियावादी विचारधारा से प्रभावित हैं, खास कर आरएसएस और इसके विभिन्न संगठन, जो दशकों से समाज में जहर फैला रहे हैं.

वैसे यह समझना जरूरी है कि भारत की यह हालात विश्व में अलग थलग नहीं है. फासीवाद का पुनर्जन्म पूरे विश्व में दिख रहा है. 2008 के आर्थिक मंदी के बाद मजदूर वर्ग का रोष और प्रदर्शन विश्व के हर कोने में नजर आ रहा था. अमेरिका, यूरोप, दक्षिण और लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, अरब देशों से लेकर चीन, भारत, बंगला देश तक यह आग फैली थी. काफी बड़े बड़े आन्दोलन हुए, सरकारें भी हिल गयीं, कुछ बदले भी, पर एक सर्वहारा वर्ग के क्रान्तिकारी पार्टी की कमी से ये आन्दोलन क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने में असफल रहे. यहाँ से शुरू हुआ साम्राजवादी पूंजीवाद का प्रतिक्रियावादी आक्रमण. नए उदारवादी आर्थिक नीति, आर्थिक सुधार, आदि के नाम से मजदूर वर्ग पर आक्रमण बढ़ गए, श्रम कानून ध्वस्त कर दिए गए, ऍफ़डीआई बढ़ाये गए, सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफत के नाम पर राष्ट्रिय सुरक्षा कानून बनाये गए, धर्म और जाती के आधार पर मजदूर वर्ग और उसके प्रतिनिधियों को मारा गया, जेल में डाला गया और हत्याएं भी की गयीं.

इन सबके पीछे मंशा क्या है? मुनाफा, मजदूर वर्ग की एकता तोड़ना और विद्रोह और संघर्ष की आग को बुझाना! हमें क्या मिला? बेरोजगारी, गरीबी, अन्धविश्वाश, प्रताड़ना और गुलामी. इन्सान होने के बावजूद एक जानवर की जिंदगी. जाहिल बना दिए हमें. अपमान तो अपना चरित्र ही बन गया है.

साथियों, सवाल यह है कि हम क्या करें? साथ में यह भी ध्यान में रखना होगा कि फासीवाद एक सामान्य बुर्जुआ तानाशाही से मूल रूप से भिन्न है. जैसा कि ऊपर कहा गया, समाज का एक हिस्सा इसके साथ है, यानि यह एक आन्दोलन है. सरकार और सरकारी तंत्र भी इसके भी साथ है. तो यह स्पष्ट है कि हम इससे पहले की तरह, 1975-77 के समय के इमरजेंसी की तरह नहीं हरा सकते. फासीवाद का अंत एक जन आन्दोलन से ही संभव है, जिसका नेतृत्व मजदूर वर्ग के क्रन्तिकारी पार्टी के हाथ में होगा!

साथियों, जहाँ हमारी मांग है इस सरकार से कि मजदूर वर्ग, दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक, आदिवासी पर हमले बंद करो और गिरफ्तार साथियों को शीघ्र रिहा करो. वहीँ हमें एक होना होगा, फासीवाद को हराने के लिए धर्म, जाति से अलग सभी शोषित और प्रताड़ित वर्ग को एक आरती, एक नारा और एक झंडा के नीचे संघर्ष के लिए आगे आना होगा!

हम आज 90% हैं. जिस दिन हमने अपनी क्रान्तिकारी क्षमता पहचानी, उस दिन आज जो हमारे मालिक मन बैठे हैं, वह हमारे कदमों में होंगे!

मजदूर एकता जिंदाबाद! इन्कलाब जिंदाबाद!

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