युद्ध के कगार पर बैठा देश अपने प्रधानमंत्रीजी के दो बोल को तरस गया

कमाल की बात तो यह है कि, जो व्यक्ति ने युद्ध के खतरे के बावजूद राष्ट्र को संबोधित नहीं किया, वो राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाने जा रहा है।...

अतिथि लेखक

इस समय देश की हवा में एक अजीब सा डर, शक, निराशा का माहौल है। सोशल मीडिया (Social media) और मुख्यधारा का मीडिया (mainstream media) भी युद्ध भूमि (war land) बना हुआ है। मेरे जैसे मध्यमवय के लोगों ने ऐसा माहौल कभी नहीं देखा; युवाओं के लिए तो यह सबसे बुरा समय है। प्राइमरी स्कूल (primary school) के बच्चे तक युद्ध की बातें कर रहे है। संकट के इस दौर में देश अपने प्रधानमंत्री के मलहम लगाने वाले दो बोल को तरस गया। जब भी बोले विपक्षियों पर आग उगली; जिसने सवाल उठाया, उसे देशद्रोही करार दे दिया। देख लेने और दिखा देने और सात पाताल से ढूंढ कर मारने की जो आमभाषा हम आजतक गलियों की छोटी-मोटी लडाइयों में सुनते थे, वो देश के प्रधानमंत्री से सुनने को मिली। जब यह शब्द गलियों में सुनते थे, तो जानते थे यह सिर्फ गीदड़ भभकी है। लेकिन, जब देश के प्रधानमंत्री ने यह बात कही, तो एक अजीब सी सिरहन पूरे शरीर में दौड़ गई। लगा, जब देश का मुखिया यह भाषा बोलेगा, तो देश में शांति कैसे रहेगी।

पुलवामा हमले (pullawama attack) के बाद से लेकर पाकिस्तान से युद्ध के खतरे (threat of war with Pakistan) तक की स्थिति तक बात पहुँच गई, लेकिन प्रधानमंत्रीजी पार्टी के नेता की खोल से बाहर नहीं आ पाए। देश उनकी आवाज सुनने को तरस गया, लेकिन वो पूरा समय एक पार्टी के नेता की तरह ही बोलते रहे। विपक्ष पर देश की रक्षा के मामले में राजनीति करने का आरोप लगाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस कठिन दौर में भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, जिससे ऐसा लगे कि वो पार्टी के स्टार प्रचारक बाद में हैं, और देश के मुखिया पहले हैं। हमले के तुरंत बाद ना सिर्फ उन्होंने अपनी चुनावी सभा को (भले ही फोन पर) संबोधित किया, बल्कि अपनी सारी राजनीतिक कार्यक्रम जस के तस जारी रखे। इतना ही नहीं, वो सेना के शहीदों पर भी राजनीति (politics on army martyrs) करना ना भूले। वार मेमोरियल का उद्घाटन (inauguration of war memorial) करते समय भी उन्होंने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर, तीखे हमले किए। यानी कांग्रेस के समय की सेना और अब उनके समय की सेना की तुलना हो गई। यह समय था, जब देश के मुखिया होने के नाते उन्हें सारे राजनीतिक मतभेद भुलाकर सभी राजनीतिक पार्टियों को देश की एकता के लिए एक मंच पर लाना था। लेकिन, इसके उल्ट उन्होंने तो राष्ट्रवाद को ही चुनाव में प्रमुख मुद्दा बना लिया है।

कमाल की बात तो यह है कि, जो व्यक्ति ने युद्ध के खतरे के बावजूद राष्ट्र को संबोधित नहीं किया, वो राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाने जा रहा है। और स्वभाविक है, जब कोई एक दल राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाएगा, तो उसकी व्याख्या भी वो ही पेश करेगा। आज जनता संशय में है; वो आपस में एक दूसरे को और अपने नेताओं को भी शक की नजर से देख रही है। ऐसे में यह संशय और बढ़ेगा। 

जब जनता तिरंगे झंडे के सामने खड़े देश के मुखिया को जनता सुनना चाहती थी, तब वो अपने बूथ स्तर के वर्कर को संबोधित करने में व्यस्त थे। और देश की बजाए बूथ को मजबूत करने में लगे थे। ऐसा लगा, जैसे देश एक पार्टी में सिमट गया है। इतना ही नहीं, पार्टी का झंडा तिरंगे से ऊपर हो गया; राष्ट्रवाद के इस हल्ले में उन्होंने अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने-अपने घरों, गाड़ियों पर तिरंगा लहराने का सन्देश नहीं दिया, बल्कि पार्टी का बड़ा सा झंडा लगाने को कहा।

यह समय था, जब प्रधानमंत्री सबके साथ अपने पार्टी कार्यकर्त्ता को भी यह सन्देश देते कि देश संकट में है, सब लोग आपसी राजनीतिक मतभेद, जाति और धर्म के भेद भुलाकर एकसाथ खड़े हों। लेकिन, उन्होंने इसके बजाए पार्टी कार्यकर्ता को अपने राजनीतिक विरोधीयों को मात देकर  अपना बूथ मजबूत करने का सन्देश दिया।

शायद, उन्हें यह लगा होगा कि भाजपा के बूथस्तर के कार्यकर्त्ता को राजनीतिक रूप से मजबूत करने से देश में “राष्ट्रवाद” की भावना बढ़ेगी, देश मजबूत होगा और सेना का मनोबल बढ़ेगा। लेकिन, वो यह भूल गए कि भले ही वो अपने कार्यकर्त्ता को संबोधित करते समय 125 करोड़ लोगो को आव्हान करे, लेकिन बुनियादी तौर पर वो उनकी पार्टी कार्यकर्ताओ और मतदाताओं का ही प्रतिनिधित्व करते हैं; जो पिछले लोकसभा चुनाव में 31% थे। बूथ स्तर के कार्यकर्त्ता को संबोधित करते समय वो ना सिर्फ उन 69% मतदाताओं तक पूरी नहीं पहुँच पाते हैं, जो उनकी विरोधी पार्टी के मतदाता थे। बल्कि, उन 30-40% लोगों तक तो बिलकुल भी नहीं पहुँच पाते है, जो आमतौर पर लोकसभा चुनाव में वोट नहीं देते हैं।

जब उन्होंने पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्त्ता को संबोधित किया तब न्यूज़ चैनल की बदौलत कार्यकर्त्ता के साथ देश की जनता ने भी यह संबोधन सुना। अगर वो देश के प्रधानमंत्री के रूप में बोलते, तो फर्क सिर्फ इतना होता कि उनका बूथ स्तर का कार्यकर्त्ता अपनी पार्टी की खोल से बहार निकलकर जनता का हिस्सा बनकर सुनता। और, कार्यकर्त्ता अपने बूथ में अपने विरोधीयों को पछाड़ने की चिंता करने की बजाए, जनता बनाकर समाज और देश में एकता लाने की चिंता करता।

प्रधानमंत्री, जब राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपने कार्यकर्त्ता को अन्य राजनीतिक विरोधियों से अलग खड़ा करना चाहेंगे तो जमीनी स्तर पर लोगों में एकता स्थापित होने की बजाए एक राजनीतिक रेखा खिंच जाएगी।

इतना ही नहीं, चुनावी माहौल में अपने कार्यकर्त्ता को दूसरी पार्टी के मुकाबले तैयार करने के लिए आपको विरोधी पार्टियों पर तीखे हमले करने ही होंगे। वर्तमान राजनीतिक माहौल में विरोधी दल किस तरह से देश को कमजोर कर रहे हैं, यह भी जोरशोर से कहना होगा। इसलिए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के नेतृत्व ने सेना को मजबूती दी है; मतलब, देश की सेना नहीं, पार्टी ही सब कुछ कर रही है। देश की बजाए पार्टी के मुखिया की तरह बोलने के कारण वो देश का इतिहास भी भूल गए कि, हमने पाकिस्तान को 1947 और 1965 में सबक सिखाने के साथ 1971 के युद्ध में उसे झुकाकर उसके दो टुकड़े कर दिए ऐसे में स्वभाविक है, जो विपक्षी दल अभी छोटे-मोटे बयान भर दे रहे हैं, वो कल और खुलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे। और, चुनाव में ना सिर्फ असली मुद्दे पीछे छूट जाएंगे, बल्कि वो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर दुनिया के सामने देश बंटा दिखेगा।

इस कठिन दौर में देश से ऊपर चुनाव और पार्टी को रखने का काम एक “राष्ट्रवादी पार्टी” और देश का मुखिया करे यह लोकतंत्र के लिए खतरा है। अगर, इस संकट के दौर में वो अपनी राजनीति नहीं भूले, तो वो चुनाव में भले ही बाज़ी मार लें, लेकिन इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।

अनुराग मोदी

राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य, समाजवादी जन परिषद,

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