संघी घोड़े की ढाई चाल : तीन तलाक का मुद्दा

संघ का एजेंडा मुसलमानों की भलाई नहीं उनकी जग हंसाई अधिक है ... सिद्धान्तः संघ मुस्लिम विरोधी है, अपने विचार और व्यवहार में यह खुला सच है......

शमशाद इलाही शम्स

मेरी शरिया जैसे आउट डेटेड कायदे कानून में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं. निकाह हो-मेहर हो, तलाक हो, इद्दत हो, हलाला हो या 2.5% टैक्स. इन तमाम मसलों पर 700 साल पुरानी जूरिसप्रूडेंस के मुताबिक़ अपने या समाजी मसाईल को हल करने की ख्वाईश रखने की पहली शर्त ये है कि आप कुंए के मेढक पहले हो, 21वीं सदी के बाशिंदे बाद में.

माफ़ करना, मैं 21वीँ सदी का बाशिंदा पहले हूँ और इतिहास को जीने के लिए नहीं पढ़ता उसे सिर्फ इंसानी समाज की तारीख जानने के लिए पढ़ता हूँ. इसलिए पढ़ता हूँ कि अपने वर्तमान को अतीत से बेहतर बना सकूं. न अतीत के कानूनों पर मुझे अपना कोई फैसला सुनाना है. जो उस दौर में हुआ, उस दौर की सामाजिक, राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ. हम अपने वर्तमान पर अतीत का बोझ इस कदर नहीं डाल सकते कि आज का (वर्तमान का) कदम उठाना ही मुश्किल हो जाये. नियम वही अच्छे होते हैं जो समाज को गति दे सकें, उसकी रफ़्तार बढ़ा सकें. जिसमे सभी इंसानों, अमीर- गरीब, मर्द, औरत, रंग, जाति, धर्म का भेद किये बगैर इंसाफ हो सके क्योंकि किसी भी समाज की समीक्षा इन्ही मानकों के आधार पर तय की जाती है कि वह कितनी न्याय संगत है.

ऊपर दिए गए विवरण के मद्दे नज़र यदि तीन तलाक के मुद्दे पर विचार करें तब यह निश्चित रूप से अमानवीय कृत्य है, इसमें मर्द पक्ष के पास महिला पक्ष को एक तरफ़ा ख़ारिज करने का अधिकार है वह भी किसी माकूल मुआवज़े के बिना. यह कानून महिला भंजक है, इसमें शुद्ध रूप से पुरुष सत्ता और उसकी शक्तियों को सर्वोच्च बनाये रखने की मंशा साफ़ झलकती है।

कोई भी न्याय प्रिय व्यक्ति ऐसी किसी व्यवस्था का हामी नहीं हो सकता जिसमे एक पक्ष के पास दूसरे पक्ष को पूर्णतः ख़ारिज करने के अधिकार दे दिए गए हों. इक्कीसवी सदी में ऐसे कानूनों का किसी समाज में होना ही उसके पिछड़ेपन का सबूत है, इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता.

शरिया कानून का आधार स्तम्भ है औरत-मर्द में गैर बराबरी

औरत-मर्द में गैर बराबरी शरिया कानून का आधार स्तम्भ है, यदि ऐसा न होता तो निकाह के वक्त दूल्हे द्वारा निकाह नामे पर मेहर की रकम सिर्फ लफ़्ज़ों पर महदूद नहीं रही होती. वह बस एक घोषणा भर है. औरत के लिए शरिया कानून में यदि जरा भी हमदर्दी रही होती तो मेहर की रकम को को वक्फ बोर्ड में निकाह के वक्त ही जमा कराने की व्यवस्था की जा सकती थी, लेकिन ऐसा 1400 सालों में नहीं हुआ. मेहर बस एक रस्म की तरह कागज़ में एक लफ्ज़ भर दिए जाने तक सिमट कर रह गयी. तलाक के वक्त ऐसे मामलों में मेहर की रकम क्या वास्तव में दूल्हे पक्ष द्वारा लौटा दी गयी हो जिसका उसने निकाहनामे में जिक्र किया है, यह प्रश्न अपने आप में शोध का विषय है.

महिला विरोधी है निकाह, मेहर, तलाक के बाद इद्दत की व्यवस्था भी

निकाह, मेहर, तलाक के बाद इद्दत की व्यवस्था भी महिला विरोधी है जिसे आज के युग में कामकाजी महिला पर लागू ही नहीं किया जा सकता.

पति की मृत्यु के बाद पत्नी को कम से कम तीन महीने के लिए घर से बाहर नहीं जाने दिया जाता, वह किसी गैर मर्द को देख भी नहीं सकती. यदि वह हामला है तो बच्चे के जन्म तक उसे इद्दत करनी होती है.

इद्दत की व्यवस्था के पीछे सिर्फ यह मंशा थी कि कही पत्नी के पेट में मरहूम पति की कोई औलाद तो नहीं है. आज इस युग में गर्भ बताने वाले टेस्ट एक घंटे में किये जा सकते हैं, लेकिन शरिया कानून, जिसे मुल्लाहों ने बड़े शातिराना ढंग से खुदाई कानून बता दिया उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

मुल्लाह ने शरिया को कुरआन के समकक्ष बना दिया जो सफ़ेद झूठ है.

कुरआन मोहम्मद को 23 बरस में मुख्तलिफ हालातों और जगहों पर नाजिल हुआ, जबकि शरिया दौरे खलीफा (मोहम्मद की मृत्यु के तीस बरस बाद तक चार खलीफाओ का युग) के बाद दौरे अब्बासिद में लिखी गयी, (ध्यान रहे खलीफा युग और अब्बासिद के बीच में दौरे उमय्यद भी है जिसकी अवधि करीब 100 बरस की है ) जिसमें कई इमामों के मुख्तलिफ ब्यान और नजीरें हैं.

कुरआन से कोई लेना देना नहीं शरिया का

शरिया का कुरआन से कोई लेना देना नहीं. वह जिस दौर में लिखी गयी वह तत्कालीन शासकों की जरूरतों को पूरा करने का एक सरकारी अमल भर है जिसे कभी भी रद्दी की टोकरी में डाला जा सकता है.

हलाला का जिक्र करना यहाँ मुनासिब होगा। इस्लाम में सारी जिल्लतें उठाने का बोझ औरत पर ही डाला गया है, आज के दौर में इसे घोर अमानवीय और स्त्री विरोधी व्यवस्था निश्चित रूप से कहा जा सकता है.

एक पत्नी अपने पति से तलाक लेने के बाद यदि उसी शख्स से दोबारा निकाह करे उस स्थिति में पहले उसे किसी दूसरे शख्स से निकाह करना होगा, उसके साथ हम बिस्तर होना होना फिर उससे तलाक लेकर अपने पहले पति से निकाह कर सकती है.

इस व्यवस्था के पीछे मंशा यह थी कि तलाक नहीं लेना-देना चाहिए। ठीक है, लेकिन अगर हो गयी और दोबारा कुछ समय बाद दोनों को अपनी अपनी गलती का अहसास हो जाये और दोबारा पति पत्नी बनना चाहें उसके लिए औरत ही बलि का बकरा क्यों बने ? मर्द को इसकी सजा का प्रावधान क्यों नहीं दिया गया ? हाथ काटने वाले निजाम को चलाने वाले इस अपराध की सजा में कुछ और नहीं तो एक हाथ की एक आध उंगली कटवाने का प्रावधान रख सकते थे ? लेकिन मर्दवादी धर्म में मर्द का अंग भंग क्यों होगा ? यदि वह राजा हुआ तो ? सो औरत को ही एक रात किसी दूसरे मर्द का आसन गर्म करने की व्यवस्था शरिया लिखने वालों को मंजूर हुई.

आज के इस दौर में कोई पढी लिखी औरत ऐसी वाहिय्यात, गैर मानवीय, स्त्री विरोधी व्यवस्था को भला कैसे मान सकती है? बशर्ते की वह ईमान वाली मुसलमान हो. यह मेरी समझ से बाहर है.

मज़हब के कायदे कानून नहीं बदलते और दुनिया रोज़ बदलती है

मज़हब की सबसे बड़ी बुनियादी कमजोरी यह है कि उसके कायदे कानून नहीं बदलते और दुनिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह हर रोज़ बदलती है, अब दुनिया के बदलाव में यकीन रखने वालों और उसे बेहतर बनाने वालों का संघर्ष धर्म के स्थाई-खुदाई नियमों के साथ होना लाजिम है.

इस्लाम जिन दिनों धरती पर अपना परचम फैला रहा था तब उत्पादन के कोई कल कारखाने वुजूद में नहीं आये थे, खेती और व्यापार ही विकसित हो पाया था सो श्रम के मूल्य अपने न्यूनतम स्तर पर ही थे. खासकर इस्लाम जहाँ पैदा हुआ, वहां तो व्यापार ही प्रमुख आर्थिक गतिविधि थी सो ऐसे में प्रतिवर्ष ढाई फीसदी का टैक्स लगाना बेहद क्रांतिकारी नियम था लेकिन आज इस दौर में, सऊदी अरब की तत्कालीन अर्थव्यवस्था के बराबर यूरोप में सिगरेट बेचने वाली कोई कम्पनी का व्यापार उससे अधिक हो और वह ढाई फीसदी टैक्स देकर निकल ले तब कैसा होगा ?

पश्चिमी देशो में आयकर 13 फीसदी से 35 फीसदी तक है, तब भी सरकारें कंगली होती हैं, उन पर शरिया लागू कर दे तो ताज्जुब न होगा यदि सभी सरकारें दिवालिया न हो जाएँ।

उपरोक्त आकलन के अनुसार मेरी स्पष्ट राय है कि शरिया के वह कायदे कानून जिनका ऊपर हवाला दिया गया है वे इक्कीसवी सदी की जरूरतों को पूरा नहीं करते, वे अपने स्वरूप में प्रतिगामी हैं और दुनिया की रफ़्तार रोकने में ही उनका उपयोग किया जा सकता है.

इस मामले में संघी एजेंडे को भी समझा जाना जरूरी है जिनके नेता मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक जैसे नियमो से मुक्त कराने के लिए दुबले हुए जा रहे हैं.

संघ का एजेंडा मुसलमानों की भलाई नहीं उनकी जग हंसाई अधिक है.

ऐसे मुद्दे मुसलमानों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें जलील करने के लिए और उनकी सामूहिक ताकत को तोड़ने के लिए पैदा किये जा रहे हैं. दलितों के विरुद्ध हिंसा के जिस देश में पचास हजार से अधिक केस दर्ज होते हों उस देश का मुखिया देश के दूसरे समुदाय के महिला उत्थान की बातें करे तब जरूर दाल में कुछ काला होगा.

संघ जिसका अतीत ही काला है, जिसका पूरा इतिहास ही मुस्लिम विरोध पर टिका हो और वर्तमान में गौ रक्षा के नाम पर जिसके कारिंदे खूरेंजी कर रहे हो, घर वापसी जैसे कुत्सित अभियानों को सरेआम चलाया जा रहा हो , लव जिहाद जैसे घिनौने, अमानवीय कार्यक्रम जिनके नेफे में बंधे हो उन्हें मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा कैसे सता रही है? सत्ता के इसी मुखिया के खिलाफ ज़किया जाफरी आज भी न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर लगा रही हो, तीस्ता सीतलवाड़ गुजरात दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के जुर्म में आज भी प्रताड़ित की जा रही हो वह भला मुस्लिम हितैषी कैसे हो सकता है?

जाहिर है संघ की राजनीति को समझना और तीन तलाक के मसले में कोई फैसला सुनाना दो अलग अलग बातें हैं। कौन व्यक्ति क्या कह रहा है उसे जानने के लिए उसका इतिहास टटोलना ज्यादा महत्वपूर्ण है बनिस्पत इसके कि वह कह क्या रहा है।

सिद्धान्तः संघ मुस्लिम विरोधी है, अपने विचार और व्यवहार में यह खुला सच है.

दूसरे किसी कानून को बना कर या उसे निरस्त करके आप किसी समुदाय का उद्धार नहीं कर सकते. उदहारण के लिए भारतीय समाज का सबसे कलंकित चेहरा जातिवाद है, उसका खात्मा करने के लिए कानून सात दशकों से संविधान के पोथे में बैठा है लेकिन भारतीय समाज से जातिवाद आज तक ख़ारिज नहीं हुआ , क्योकि सुविधाप्राप्त जातियों ने कभी अपने समाज के भीतर ही इस अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध कोई आन्दोलन नहीं चलाया. यह रोग आज भी भारतीय समाज को साल रहा है.

मुस्लिम समुदाय में उनकी शरिया से सम्बंधित जो समस्याएं हैं उन्हें मुस्लिम समाज के अन्दर ही चले किसी सुधारवादी आन्दोलन से ध्वस्त किया जा सकता है। ईमानदार सरकार ऐसे आंदोलनों के लिए जमीन तैयार कर सकती है, लेकिन संघी मोदी हकुमत के दौरान जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय, गुजरात का दलित आन्दोलन आदि में जिस तरह छात्रों-नौजवानों की उचित मांगों को राष्ट्रविरोधी रूप दिया गया है उससे मोदी सरकार की मंशा पर कोई गौभक्त ही यकीन कर सकता है.

संघ को मुस्लिम महिलाओ के उद्धार में कोई दिलचस्पी नहीं बल्कि इस समुदाय पर लांछन लगा कर ऐसा माहौल तैयार करना है जिससे मुस्लिम तबके का मुल्लाह वर्ग और उसका राजनीतिक स्वरूप औवेसी जैसा तबका ताकतवर बने. जितना मुसलमानों का यह दक्षिणपंथी तबका मज़बूत और मुखर होगा उतना ही संघ को हिन्दू समाज को दक्षिणपंथी झंडे के नीचे लामबंध करने में मदद होगी.

मेरे नज़दीक संघ की इस चाल को- तीन तलाक जैसे ढपोरशंखी प्रचार को उसकी ऐतिहासिकता में देखा जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है और जिन मुसलमानों को तीन तलाक अथवा शरिया जैसे वाहिय्यात कानूनों में कोई दिलचस्पी न हो वह निकाह करे न करे- विवाह का पंजीकरण उपयुक्त न्यायालय में कराना शुरू करे। भारतीय संविधान में ऐसा बहुत कुछ है जिसका फायदा तभी होगा जब शरिया को छोड़ कर उसकी शरण में जाया जाए.

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