जब मोदी के सामने बेबस अटलजी ने कहा था कलंक का टीका पोंछ तो दूँ पर उसके बाद सिर रहेगा कि नहीं !

अटल जी का असली रूप जिसे भारतीय मीडिया छिपा रहा है... जो ताकत भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पास है, क्या वह ताकत अटल जी के पास थी?...

अतिथि लेखक
जब मोदी के सामने बेबस अटलजी ने कहा था कलंक का टीका पोंछ तो दूँ पर उसके बाद सिर रहेगा कि नहीं !

अटल जी का असली रूप जिसे भारतीय मीडिया छिपा रहा है

कौशल कुमार

अटल जी की मृत्यु के बाद मीडिया अटल जी को भारत की आत्मा और भी न जाने क्या-क्या बता रहा है। कहा जा रहा है कि उनके साथ ही एक सदी का अंत हो गया। इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बयान आया है। उन्होंने कहा कि, "भारतीय राजनीति का एक चमकता सितारा अब हमारे बीच नहीं रहा। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके जाने से देश की राजनीति को बड़ा झटका लगा है। हमने अपने अजातशत्रु को खो दिया है। अटल जी के जाने से राजनीति के साथ साहित्य और पत्रकारिता की भी क्षति हुई। अटल जी के जाने से राजनीति ही नहीं साहित्य की भी क्षति हुई है। साहित्य ने भी अपना एक कवि को खोया है। वहीं, पत्रकारिता ने एक स्वभावगत पत्रकार को खोया है। और देश की संसद ने गरीबों की आवाज को खोया है।“

शाह ने कहा ये क्षति कभी भर नहीं पाएगी। अटल जी संघ के प्रचारक भी रहे थे देश उन्हें युगों-युगों तक याद करेगा।

शाह ने आगे कहा कि बीजेपी ने अपना पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष खोया है और करोड़ों युवाओं ने अपनी प्रेरणा को। उन्होंने कहा कि उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने हम सभी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शक किया है। युवाओं ने अपना प्रेरणा श्रोत खो दिया है। और देश ने अजातशत्रु और साहित्य ने एक ऐसा कवि जिसके पास जन को बात करने के लिये शब्द थे। और भारतीय जनता पार्टी ने अपने पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष को खो दिया है। जिसकी स्थापना जन संघ के रूप में 1990 में हुई थी।

जब शाह ऐसा कह रहे थे तब उनके बनावटी चेहरे में और अटल जी के जीवन के फैसलों के बीच एक गहरी खाई दिख रही थी। जिसमें शक्ति का ऐसा रिश्ता दिख रहा है जिसको देखकर अटल जी के कमजोर पड़ने को बहुत आसानी से समझा जा सकता है।

जो ताकत भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के पास है, क्या वह ताकत अटल जी के पास थी?

अगर ऐसा कहा जाये तो उनके चुनावी भाषणों को देखा जाये। ये हमें जन विरोधी नजर आते हैं। जब उनको उत्तर भारत में वोट बैंक मजबूत करना था, तो उन्होंने हर एक वर्ग के तुष्टिकरण के माध्यम से प्रत्येक वर्ग को आरक्षण का राग अलापना शुरू किया। और उन्होंने "सो कॉज" आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (गरीब सवर्ण ) के माध्यम से आरक्षण का कार्ड खेला।

दरअसल ये गरीब सवर्ण कमजोर वर्ग नहीं था बल्कि यह वर्ग विहिप के द्वारा पैदा किया गया वह वर्ग था जो अपने सामाजिक रूप से मजबूत और दबंग होने के बाद भी अपने लिये आरक्षण की माँग करने लगा था। अटल जी ने हर वर्ग के तुष्टिकरण पर जोर देते हुए सदन में कहा था कि,

''ऐसे कई वर्ग हैं जो सामाजिक तौर से पिछड़े नहीं हैं पर आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए, इसके लिये हमें बहुमत की जरूरत है।''

यहाँ अटल जी यही बताने की कोशिश कर रहे थे कि संसाधनों पर पहुंचे किस वर्ग की अधिक है और हाशिये पर कौन सा ?.

अटल जी की मृत्यु के बाद भारतीय मीडिया ने उनको सिर्फ इस रूप में कैद करने की कोशिश की है कि वह भारतीय जनता पार्टी के प्रति जीवन भर समर्पित रहे। मीडिया ने अपने कई रिपोर्ट को एक नये सिरे से लिखना शुरू किया है। वह लिखते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ नेताओं के ही नहीं, बल्कि पूरे देशवासियों के दिलों में बसते हैं। उन्होंने राजनीति को कभी मानवता पर हावी नहीं होने दिया। सही को सही और गलत को हमेशा गलत बताया। यही वजह है विरोधी भी उनके शब्दों को तवज्जो देते थे। उन्हें आदर्श मानते थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भी गुजरात दंगों का जिक्र होता है तो अटल बिहारी वाजपेयी के 'राजधर्म' की चर्चा जरूर होती है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पाठ पढ़ाया था।

यह वाकया तब का है, जब गुजरात में हिंसा के बाद हर तरफ मोदी के इस्तीफे की मांग होने लगी थी। इसी वक्त अटल जी ने गुजरात का दौरा किया था। जब वह मीडिया के सामने आए तो एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि आप मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कोई संदेश लेकर आए हैं?

इस पर वाजपेयी जी ने अपने उसी चिर-परिचित अंदाज में जवाब दिया, 'मैं इतना ही कहूंगा, वह राजधर्म का पालन करें। ये शब्द काफी सार्थक हैं। मैं उसी का पालन कर रहा हूं और पालन करने का प्रयास कर रहा हूं। एक राजा या शासक के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता है, न जन्म के आधार पर, न जाति और संप्रदाय के आधार पर...।'

लेकिन एक बात जो भारतीय मीडिया ने बहुत आसानी से छुपाया वो अटल जी का असली रूप था। अटल जी शब्दों के चयन के मामले में बाकी के कवियों से कहीं अधिक सचेत थे। वे जानते थे कि बिना साहित्य की भाषा के अलावा अन्य भाषाओं में बात करना साम्प्रदायिक चेहरे कितना पसंद करते हैं।

आज गरीब और वंचित तबकों के अधिकारों के हनन को जायज ठहराने के उद्देश्य से एस.सी. एस.टी. एक्ट को कमजोर किया जा रहा है। यह शिक्षार्थियों को लगातार कमजोर कर रहा है।

अटल जी ने उस समय "सो कॉज" आर्थिक आधार पर कमजोर सवर्णों को आरक्षण की वकालत की जो कि पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के द्वारा चलाये गये एजेंडे में था। यह आज लोगों के बीच में जहर फैलाने का काम कर रहा है।

हिंदी साहित्य के आलोचक नामवर सिंह के नाम से एक विशेषांक मासिक पत्रिका (यथावत ) ने 2015 के जुलाई के अंक में ''सचमुच के नामवर'' के नाम से प्रकाशित किया था, जिसमें अपने एक इंटरव्यू में नामवर सिंह अपने और अटल जी के बीच हुई बातचीत को बता रहे थे। उसके साथ ही गुजरात दंगे के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी जी किस भूमिका में थे और निर्णय लेने का हक क्या वाकई में अटल जी के हाथों में था? जैसा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में अटल जी के हाथ को अपने पीठ पे अपने अभिवावक के हाथ के जैसे होने की संज्ञा दे रहे हैं।

क्या वे उस समय हिंदुत्व के एजेंडे के लिये काम करने वाले संगठन या दबाब समूहों के हाथों संचालित नहीं थे।

संजीव कुमार और ज्ञानेंद्र कुमार संतोष ने नामवर सिंह से बातचीत की थी -

नामवर सिंह से जब ये कहा गया गया कि आप अटल जी के बारे में कोई संस्मरण हैं तो सुनाएं तो वे बताते हैं कि, ''ग्वालियर में अटल जी खूब कविता सुनाया करते थे। वहां शिवमंगल सिंह सुमन मेरे बड़े भाई जैसे ही थे। वे भी बहुत अच्छी कविता करते थे। जब वे गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल हुए तो ग्वालियर कई बार उन्होंने मुझे बुलाया था। ग्वालियर में एक बार कवि सम्मेलन में गया तो वहाँ अटलजी को कविता सुनाते सुना - "हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता हूँ, मिटाता हूँ।" वाजपेयी जी को पहले से जानता था और उन्हें कई बार कवि सम्मेलनों में कविता पढ़ते सुना था। जब अटल जी देश के प्रधानमंत्री थे तो गुजरात दंगों के बाद जावेद अख्तर के साथ उनसे मिलकर मेमोरेंडम देने गया। इस प्रतिनिधि मंडल में मुझे हिन्दू प्रतिनिधि बना कर लाया गया था। वाजपेयी जी ने शाम पांच बजे का टाइम मिलने के लिये दिया था। हम लोग पांच मिनट देर से पहुंचे। जैसे ही पहुंचे तो उन्होंने कहा कि कॉमरेड लोग भी टाइम के पंक्चुअल नहीं होते ! आप लोग प्रधानमंत्री से भी इंतजार करवाते हैं। हम लोग तो मेमोरेंडम लिखकर ले गए थे लेकिन वाजपेयी जी ने पूछा कि कहिए क्या कहना है ? जब जावेद अख़्तर ने लिखा हुआ मेमोरेंडम आगे बढाया तो उन्होंने कहा कि यह तो हम देख लेंगे, आप लोगों को क्या कहना है? तो जावेद अख्तर ने मेरी ओर इशारा किया। तब मैंने कहा कि आपने गुजरात वाली घटना पर कहा था कि यह घटना हमारे माथे पर चंदन का टीका ही शोभा देता है, कलंक का नहीं। आप इसे पोंछ क्यों नहीं देते ?'' वाजपेयी जी ने छूटते हुए ही कहा कि "पोंछ तो दूँ पर उसके बाद सिर रहेगा कि नहीं!" मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि अगर देश का प्रधानमंत्री अगर ऐसा कहता है तो मुझे कुछ नहीं कहना है। यह घटना मैं कभी भूल नहीं सकता हूँ।

अटल जी नरेंद्र मोदी के फैसलों से कभी खुश नहीं थे। यही कारण था कि उनके साथ बौद्धिक चर्चा के केंद्र में होने वाली नरेंद्र मोदी की आलोचना को वे हमेशा स्थान देते थे।

अटल जी उन्हीं क्षेत्रों में स्वतंत्र थे जिनमें या जिनसे राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को फायदा हो रहा हो। अटल जी की तमाम कोशिशों के बावजूद भी उनका संघ के प्रति समर्पण दिखता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अमित शाह अटल जी के लिये दिये प्रेस वार्ता में उनकी सभी उपलब्धियों में संघ के एक कार्यकर्ता के रूप में उनकी मौजूदगी पर इतना अधिकार न जताते।

गुजरात दंगों के बाद अटल जी ने माना था कि नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमन्त्री पद से न हटाना बड़ी गलती थी।

2004 में एक चैनल को दिये अपने इंटरव्यू में उन्होने कहा था कि, ’’ जरात दंगों का असर पूरे देश भर में देखा गया, यह अप्रत्याशित था और इसने हमें बुरी तरह से प्रभावित किया था। इस घटना के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटा देना चाहिए था॰’’

कौशल कुमार

एम. ए.

स्त्री अध्ययन

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा।

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