तूतीकोरिन पुलिस फायरिंग पर राष्ट्रीय मीडिया में अजीब सी चुप्पी क्यों है?

स्टरलाइट जैसी तमाम अपराध कथाओं से देश पटा पड़ा है लेकिन पूंजीवाद की गुलाम मीडिया यह कहानी सुनाना नहीं चाहती...

स्टरलाइट जैसी तमाम अपराध कथाओं से देश पटा पड़ा है लेकिन पूंजीवाद की गुलाम मीडिया यह कहानी सुनाना नहीं चाहती

गिरीश मालवीय

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता कंपनी की स्टरलाइट कॉपर यूनिट के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन में कल 11 लोगों की मौत हो गयी, इस घटना को लेकर राष्ट्रीय मीडिया में एक अजीब सी चुप्पी देखी जा रही है

क्योंकि उलझी हुई इस पूरी कहानी के सिरे जब खुलना शुरू होंगे तो बड़े और नामचीन लोगों के चेहरे से नक़ाब सबसे पहले उतरना शुरू होंगे, क्योंकि देश के जिस राज्य में भी अपार खनिज संपदा है वहाँ-वहाँ एक तूतीकोरिन मौजूद है. स्टरलाइट जैसी तमाम अपराध कथाओं से देश पटा पड़ा है लेकिन पूंजीवाद की गुलाम मीडिया यह कहानी सुनाना नहीं चाहती.

आपने अडानी का बहुत नाम सुना होगा अम्बानी का भी बहुत नाम सुना होगा लेकिन जितने बड़े ये ग्रुप हैं लगभग उतनी ही बड़ी एक कम्पनी है वेदांता रिसोर्सेज जिसके मालिक अनिल अग्रवाल है , वेदांता मूल रूप से विदेशी कंपनी ही है. अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता समूह कर्ज के मामले में भारत मे दूसरे नंबर पर आता है. वेदांता पर 1.03 लाख करोड़ रुपए का कर्ज हैं

विभिन्न देशों के कानून और पर्यावरण नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन करने में वेदांत रिसोर्सेज़ की एक अलग पहचान है आर्मेनिया में सोने की खदानों में, जाम्बिया की तांबे की खदानों में उसने जमकर अंतराष्ट्रीय पर्यावरण नीति का उल्लंघन किया है, खनिजों के खनन से लेकर धातु उत्पादन तक, वेदांता रिसोर्सेज का कारोबारी मॉडल धातु व खनन परितंत्र को पूरी तरह एकीकृत कर मुनाफा कमाने वाला उद्योग है जिसने भारत की हर बड़े छोटे राजनीतिक दल को साध रखा है इसलिए तो अटल बिहारी वाजपेयी की NDA की सरकार मुनाफे में चल रहा छत्तीसगढ़ का बाल्को संयंत्र बेहद सस्ते दाम में वेदांता को बेच देती है और UPA काल मे वित्तमंत्री रहे चिदम्बरम वेदांता रिसोर्सेज़ के निदेशक के तौर पर भारी-भरकम तनख्वाह लेते रहते हैं.

जब 2001 में अनिल अग्रवाल ने बाल्को कारखाना खरीदा तो उन्होंने सैकड़ों एकड़ सरकारी भूमि पर कब्जा कर हजारों पेड़ कटवा दिये थे. वेदांता ने बाल्को के कामगारों के साथ जितने भी करार किये थे प्रायः उनमें से किसी का भी पालन नहीं किया.

छत्तीसगढ़ के कोरबा में गिरी जानलेवा चिमनी वाला कांड शायद अब किसी को याद होगा लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 2009 में हुई इस दुर्घटना में आधिकारिक रूप से 41 मजदूरों की जान गयी थी इसे भी बाल्को हादसा कह कर बुलाया जाता रहा पर हकीकत में यह भी स्टरलाइट का ही एक उपक्रम था.

अब यह समझने का प्रयास करते हैं कि तूतीकोरिन में 20 हजार लोगों की भीड़ आखिर किस बात का विरोध कर रही थी

भारत में भी वेदांता ने आज से बीस साल पहले तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पर्यावरण सुरक्षा कानूनों को धता बताते हुए भारत के पहले ताँबे के एक विशाल स्मेल्टर का निर्माण किया था धातु गलाने वाले इस संयंत्र से 2013 में 23 मार्च के दिन सल्फर डाई ऑक्साइड का कथित रूप से रिसाव हुआ था और इसके कारण बड़ी संख्या में तूतीकोरिन के निवासी प्रभावित हुए थे. इस गैस रिसाव के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने इसे बंद करने का आदेश दिया था. इसके बाद कंपनी एनजीटी में चली गई.

उच्चतम न्यायालय ने स्टरलाइट इंडसट्रीज़ को तमिलनाडु के तूतीकोरिन स्थित तांबा गलाने के संयंत्र में पर्यावरण कानूनों की अनदेखी करने के लिए 100 करोड़ का जुर्माना भी लगाया था लेकिन न्यायालय ने कंपनी के तूतीकोरिन संयंत्र को बंद करने के मद्रास उच्च न्यायालय के साल 2010 में दिए गए आदेश को रद्द कर दिया मामला एनजीटी के पास चल रहा था

मोदीजी के राज में एनजीटी ने कारखाना वापस खोलने के आदेश दिए और इस आधार पर स्टरलाइट तूतीकोरिन में इस कारखाने का ओर अधिक विस्तार करने की योजना बना रही थी इसी का विरोध करने के लिए ज़िला कलेक्ट्रेट और संयंत्र तक क़रीब 20 हज़ार लोगों ने जुलूस निकाला. इनकी मंशा संयंत्र और कलेक्ट्रेट का घेराव करने की थी. ये लोग मांग कर रहे थे कि तांबा संयंत्र को स्थायी रूप से बंद किया जाए. इसी दौरान हिंसा हो गई ओर 11 लोग प्रशासन की कार्यवाही की चपेट में आ कर जान से हाथ धो बैठे

शुरू से ही इस प्लांट पर लगातार पर्यावरण नियमों की अनदेखी करने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन सिर्फ तूतीकोरिन ही क्यो वेदांता के जितने भी प्रोजेक्ट हैं, चाहे वह राजस्थान की खदानें हो चाहे उड़ीसा में बॉक्साइट की खदाने हों, चाहे आप छत्तीसगढ़ की ही बात कर ले,  हर जगह वेदांता रिसोर्सेज का नाम पर्यावरण नियमों के उल्लंघन में सबसे पहले नम्बर में आता है, ओर राजनीतिक दलों को चन्दा देने में भी........ पिछले महीने जो एफसीआरए में परिवर्तन कर भूतलक्षी प्रभाव से पार्टियों को चन्दा देने वालों के नाम छुपाए गए हैं उसमें भी अदालत ने 2014 में पाया कि कांग्रेस और भाजपा ने ब्रिटेन स्थित वेदांता रिसोर्सेज कंपनी से चंदा लेकर इस अधिनियम का उल्लंघन किया था

वेदांता रिसोर्सेज का यह मामला बताता हैं भारत मे क्रोनी केप्टिलिज़्म पर्यावरण ओर लोगों की जान से कितनी आसानी से खेलता है.

Girish Malviya की एफबी टाइमलाइन से साभार

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