मंडल पर जाति और पूँजी के गठजोड़ का हमला, सामाजिक न्याय के साथ धोखेबाजी रोकने की महत्वपूर्ण दिन है आज

पिछड़ी जातियों पर हमला है पूरा गौमाता की जय-जयकार का अभियान ... छात्रों की पढ़ाई की फीस बहुत बढ़ चुकी है ...जनरल सीटों से भी टॉप कर रहे एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को चालाकी से आरक्षण में डाला जा रहा...

Vidya Bhushan Rawat
मंडल पर जाति और पूँजी के गठजोड़ का हमला, सामाजिक न्याय के साथ धोखेबाजी रोकने की महत्वपूर्ण दिन है आज

विद्या भूषण रावत

7 अगस्त 1990 का ऐतहासिक दिन जब भारतीय संसद के अन्दर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की अनुशंसाओ को स्वीकारते हुए भारत सरकार की नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण की घोषणा की थी. भारत की राजनीति में इससे बड़ा भूचाल कभी नहीं आया जब देश की सारी सवर्ण जातियां और उनका ‘संभ्रांत’ बुद्धिजीवी वर्ग इसके विरुद्ध खड़ा हो गया. देश भर में सवर्ण छात्रों ने इसके विरुद्ध आन्दोलन किया और मनुवादी मीडिया ने कोशिश की कि सरकार इसको वापस ले ले. वी पी सिंह, शरद यादव और राम विलास पासवान की तिकड़ी ने इस सन्दर्भ में सबसे ज्यादा गालियां खाईं. स्थान-स्थान पर उनके पुतले फूंके गए और उनको भद्दी-भद्दी गालियों और उपाधियों से नवाजा गया. सबसे बड़ी बात ये थी कि मंडल के समर्थन में अम्बेडकरवादियों ने जो आन्दोलन खड़ा किया था उसे मीडिया ने पूर्णतः नज़रअंदाज कर दिया. उस दौर में दलित पिछड़े, आदिवासियों, और मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबकों के बीच जो सहमति बनी वो बहुत बड़ी थी और उसके नतीजे अगले चुनावों में दिखाई दिए.

सरकार के एक बहुत बड़े फैसले ने भारत के राजनीतिक पटल को बदल दिया. दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों में एक अभूतपूर्व एकता दिखाई दी और स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा लगा कि कोई सरकार बहुजन समाज के प्रश्नों पर गंभीर है. बाबा साहेब संसद में आ चुके थे, उन्हें भारत रत्न प्रदान किया जा चुका था, उनकी स्वर्ण जयंती के अवसर पर अनेकों कार्यक्रम थे लेकिन प्रमुख था उनके साहित्य को विभिन्न भारतीय भाषाओं में पहुँचाना. सरकार ने डॉ आंबेडकर प्रतिष्ठान को मज़बूत किया और नव बौद्धों को भी आरक्षण के दायरे में लाने का काम किया. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था वो घोषणा कि यूपीएससी में अनुसूचित जातियों, जनजातियों की भर्ती का बैकलॉग उन्हीं जातियों द्वारा भरा जाएगा क्योंकि इससे पहले ये बहुत चालाकी से कर दिया जाता था कि अनुसूचित जाति जनजाति के अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में फ़ेल करके ये कहकर कि ‘योग्य अभ्यर्थियों के अभाव’ में तथाकथित जनरल से बैकलॉग भर दिया जाता था. यही कारण है आरक्षण के बावजूद भी कई वर्षो तक सरकारी सेवाओं में सवर्ण एकाधिकार बना रहा.

1990 में इस घटनाक्रम के बाद से ही पुरोहितवादी-पूंजीवादी ताकतें इकट्ठा हो गयीं और अनेक प्रकार से षड्यंत्र करने लगीं. भाजपा ने राममंदिर का जो कार्ड खेला वो दलित पिछड़ों को सत्ता से दूर करने का एक सबसे बड़ा षड़यंत्र था, लेकिन इसके लिए उसने न केवल दलितों, आदिवासियों अपितु बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति के नेताओं की भी एक अच्छी फेहरिस्त तैयार की ताकि उनको आगे कर लोगों को भ्रमित किया जा सके. कांग्रेस का रवैय्या भी उनसे ज्यादा खतरनाक रहा क्योंकि राजीव गाँधी के समय से ही कांग्रेस ने खुले तौर पर मंडल का विरोध कर भाजपा से ज्यादा बड़ी भूमिका लेने की कोशिश की. बहुजन समाज पार्टी उस समय तक इतनी ताकतवर नहीं थी कि इस प्रतिरोध में कुछ भूमिका निभाती लेकिन उसका काडर तो शुरू से ही अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़ा रहा इसलिए वे तो शुरूआती दौर से ही आनुपातिक हिस्सेदारी के पक्षधर रहे. समाजवादी पार्टी उस समय तक बनी नहीं थी और चंद्रशेखर की पार्टी तो उसके विरोध में थी. चंद्रशेखर एक ‘समाजवादी’ नेता जरूर होंगे लेकिन उनके अन्दर की ठकुरात कभी गयी नहीं. सामंती सोच के कारण ही उन्होंने कभी भी सूरजदेव सिंह और अन्य बड़े मफ़िआओ के साथ अपने संबंधो को नाकारा नहीं हालाँकि वो इस सन्दर्भ में बेहद साफ़ थे और अपनी बात को रखने से भी नहीं डरते.

मंडल की पहली हार 2004 के चुनावो में पूर्णतः हो गयी और कांग्रेस के ब्राह्मणवादी नेतृत्व ने इतनी दिक्कतों के बाद सत्ता मिलने पर भी अपनी गलतियों को नहीं सुधारा. कांग्रेस में अर्जुन सिंह जैसे लोग थे, जिन्होंने शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात की और उसे लागू करने के प्रयास किये, लेकिन मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक अहलुवालिया के ‘उदारीकरण’ और सोनिया गाँधी के ‘मनरेगा’ ब्रांड समाजवाद ने कांग्रेस को दरअसल कही का नहीं छोड़ा. कांग्रेस ने इस पूरे 10 वर्षीय दौर में पिछड़ी जातियों या किसानों की तरफ देखने तक के प्रयास नहीं किये. उसके पास कृषि क्षेत्र को मज़बूत करने के लिए कोई ठोस योजना नहीं थी और न ही उसके पास पिछड़ी जातियों के किसी भी विश्वसनीय नेता का नाम.

2009 में कांग्रेस जब दोबारा सत्ता में आई तो उसके हौसले असमान पर थे और मंत्री अब कार्यकर्ताओ की ओर देख तक नहीं रहे थे. चिदंबरम जैसों ने कांग्रेस की जीत को अपने उदारीकरण की जात माना और फिर जो देश के विभिन्न हिस्सों में पार्टी की अधिग्रहण जैसी नीतियों के खिलाफ घमासान हुआ उसने उसकी कमर तोड़ दी. 2013 आते-आते कांग्रेस ने कई बेहतरीन कानून बनाये लेकिन तब तक उसके विरुद्ध माहौल बहुत बन चुका था. राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने कांग्रेस के एजेंडे को बदलने के प्रयास किये और उसमें दलित पिछड़ों की भागीदारी की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस की सशक्त ब्राह्मण लॉबी ने सब फ़ेल कर दिया. दलित पिछड़ों के नेतृत्व ने पार्टी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. जब राजनैतिक शक्तियां लोगों के सवाल उठाने में असमर्थ होती हैं तो फिर लोग स्वयं ही अपने हाथ में सत्ता ले लेते हैं.

पिछड़ी जातियों, खासकर किसानों और अन्य तबकों में भयानक असंतोष था, दलित में वही बात थी, मुसलमानों में तो पिछड़ी और दलितों के प्रश्न उनके ही नेता नहीं उठाने देते थे लेकिन सचर आयोग की रिपोर्ट ने सबकी आँखे खोल दीं और कई राज्य सरकारों ने पिछड़े जातियों के आरक्षण में मुसलमानों को भी जगह दे दी, हालाँकि अभी भी मुस्लिम दलित के नाम पर आरक्षण नहीं है जो उन तबको के साथ घोर अन्याय है जो आज भी छुआछूत और अन्य किस्म के जातीय भेदभाव झेल रहे हैं.

लेकिन जैसे ही दलित पिछड़ों आदिवासियों और मुसलमानों के पसमांदा तबको ने अपने अधिकारों के लिए बातें उठाना शुरू कीं, पुरोहितवादी पूंजीवादी गठजोड़ ने भी उनको पूर्णतः अशक्त करने के तरीके ढूंढ लिए. जल जंगल जमीन पर अब सामुदायिक हकों से ज्यादा निजी मल्कियातों का कब्ज़ा होने लगा. लेकिन जनता के दवाब में जैसे ही भूमि अधिग्रहण बिल 2013 पास हुआ, वो पूंजीवादी शक्तियों ने सीधे अपने पर हमला समझा.

संघ परिवार जानता है कि सीधे वह लड़ाई में कभी भी जीत नहीं पायेगा इसलिए भ्रष्टाचार का प्रश्न बनाकर अन्ना का आन्दोलन खड़ा करा गया जिसे इसे देश के पूंजीवादी पुरोहितवादी समूह का पूरा समर्थन था. और यहाँ भी वैसे ही हुआ जैसे मंडल के दौर में हुआ था. देश का ‘प्रगतिशील’ वामपंथी भी अन्ना की हवा में बह गया जैसे वह मंडल विरोध में 1990 में उतर गया था. आखिर क्या कारण था देश के गाँधीवादी, मार्क्सवादी, संघी सभी अन्ना जैसे निहायत ही पुरातनपंथी और ढकोसलेबाज व्यक्ति में क्रांति देखने लग गए. रामदेव से लेकर स्वामी अग्निवेश तक और सामाजिक आन्दोलनों के बड़े-बड़े नाम इस पूरी ‘आंधी’ में नेस्तनाबूद हो गए. गलती उनकी नहीं थी, अपितु सत्ता से जुड़ने का जो प्रभाव या प्रभामंडल है, वो ही इसके पीछे था. नेता चाहे कुछ बोले लेकिन जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर इकठ्ठा हुई वो भीड़ दलित और आरक्षण विरोधी थी. मेरी नज़र में वो संविधान के विरुद्ध भी एक संकट था जो केवल ये कह रहा था कि रामलीला मैदान में उपस्थित ये कुछ हज़ार लोग ही देशहैं और आमहैं और उनके हाथ खड़ा कर देने मात्र से संविधान में बदलाव आ जाना चाहिए. हमें ऐसे खतरनाक मंसूबों को समझना होगा.

कांग्रेस के खिलाफ लोगों के गुस्से को बहुत धूर्तता और चालाकी से पुरोहितवादी पूंजीपरस्त ताकतों ने अपने नियंत्रण में ले लिया और आज देश में जो इन ताकतों ने राजनैतिक तौर पर प्राप्त किया उसे वे अब खोने के लिए तैयार नहीं हैं. सवर्ण जातियों को अब समझ आ चुका है कि दलित, पिछड़ों, आदिवासियों में अपने साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को अब आगे सहन करने की सहनशक्ति नहीं है और इसलिए वे इस ‘स्वर्णिम’ अवसर के जरिये इन समुदायों के लिए प्रदान किये सभी अवसरों को साम दाम दंड भेद सभी के जरिये समाप्त कर देना चाहते हैं. संघ परिवार और भाजपा इस मसले को मुख में राम बगल में छुरी वाले तरीके से ख़त्म कर देना चाहते हैं.

संघ परिवार, भाजपा का आई टी सेल हिन्दू-मुसलमान, भारत पाकिस्तान, राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद की बातें करते रहेंगे और नरेन्द्र मोदी जी बाबा साहेब आंबेडकर, कबीर और हो सके तो रैदास जी का गुणगान करते रहेंगे और इन सभी के नाम कर अरबो फूंक डालेंगे, दलित और पिछड़ों के अंतर्व्द्वन्द्वों का इस्तेमाल करेंगे, दलित की अन्य जातियों को चमारों और जाटवों के खिलाफ खड़ा करेंगे, पिछड़ों की अन्य जातियों को यादवों के विरूद्ध करेंगे और मोटे तौर पर सभी को हिन्दू बोलकर मुसलमानों के खिलाफ लड़ाएँगे. देश का मीडिया ऐसे सभी मसलों पर बातें करता रहेगा जिसमें सवर्णों के बढ़-चढ़कर न केवल भागीदारी होती है, अपितु उनका नेतृत्व भी होता है.

पिछले चार वर्षो में इस सरकार ने बड़ी धूर्तता से ब्राह्मणवादी पूंजीवादी ताकतों की मजबूती का काम किया है और दलित, पिछड़े, आदिवासियों और मुसलमानों को पूर्णतः शक्तिहीन करने के प्रयास किये. एक तरफ दलितों और मुसलमानों पर स्थान-स्थान पर गाय, गौमांस, पाकिस्तान, और राष्ट्रभक्ति के नाम पर हमले होते रहे जिसमें सरकार ने दोषियों पर कार्यवाही करने के बजाय उत्पीड़ित लोगों को ही और तंग किया. शुरुआत में ही विश्वविद्यालयों में छात्रो पर हमला किया गया. रोहित वेमुला की मौत के लिए जिम्मेवार लोग अभी भी पुरुस्कृत हो रहे हैं. जेएनयू जैसे संसथान में प्रशासन जिस घटिया भूमिका में है वो आश्चर्य करती है. देश भर में विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जातियों के लिए जो आरक्षण निर्धारित था, उसको ख़त्म करने के लिए बेहद बेशर्मी से आरक्षण को डिपार्टमेंट वाइज कर दिया गया. मतलब ये कि पहले एक विश्वविद्यालय में यदि 100 सीटें होती थी तो 17% दलितों, 7% आदिवासियों और 27% पिछड़ों को आरक्षण मिलने की सम्भावना होती थी, लेकिन भाजपा ने सत्ता में आने के बाद से ही इसको ‘क़ानूनी’ तरीके से ख़त्म करने के इंतज़ाम किये ताकि ये भी न लगे कि संविधान का उल्लंघन है और सवर्णों को खुश भी किया जा सके. अब विभागों की सीटो के हिसाब से आरक्षण मिलेगा. यदि किसी विभाग में एक ही सीट है तो आरक्षण की कोई गुंजाइश नहीं है. इस प्रकार की व्यवस्था से सभी विश्वविद्यालयों से चुपचाप आरक्षण ख़त्म कर दिया गया है.

इस वर्ष यदि आप छात्रों से पूछें तो एससी, एसटी, ओबीसी छात्रो को छात्रवृत्ति तक नहीं मिली है. प्राथमिक, माध्यमिक, सेकेंडरी की कक्षाओं के हाल और भी ख़राब हैं. बच्चो को मिल रहा मिड डे माल अधिकांश राज्यों में ख़त्म है या उसमें कोई गंभीरता नहीं है.

अभी उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश रोडवेज की बसों में भर्ती का विज्ञापन आया और शर्मनाक बात ये कि उसमें पिछड़ी जातियों के आरक्षण की कोई बात नहीं कही गयी है. पिछड़ों पर तो कई तरीको से हमला है. उनकी खेती पर इतना जानलेवा हमला कभी नहीं था जब चालाकी से ये प्रयास किये जा रहे हैं कि किसान स्वयं ही खेती छोड़ दे ताकि उनकी जमीनों पर कॉर्पोरेट को काबिज कर उनसे खेती करवाए. जब बाज़ार में आटे से लेकर सब्जियां तक पूंजीपतियों की दुकानों पर मिलेगा तो किसान और छोटे दुकानदार तो मरेंगे ही.

पिछड़ी जातियों पर हमला है पूरा गौमाता की जय-जयकार का अभियान

पूरा गौमाता की जय जयकार का अभियान पिछड़ी जातियों पर हमला है जो अब गायो की खरीद फरोक्त नहीं कर सकते. धीरे-धीरे करके भारत के विशालकाय बाज़ार पर पूंजीपति कब्ज़ा करके दूध से लेकर आटा चावल तक बेचेंगे और ये सब होगा किसान की मौत पर. किसानों को ऐसे उलजलूल सवालो में फंसाओ जो उसी तरक्की और अधिकारों से दूर हो और ऐसे आर्थिक सामजिक स्थितियां पैदा कर दो कि किसान स्वयं ही खेती छोड़ दे. देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए भी ये खतरनाक है लेकिन गुजराती प्रवासियों की कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए दालों, चीनी, प्याज आदि का भी आयात किया जा रहा है. आखिर इससे प्रभावित होने वाला समाज कौन है ?

छात्रों की पढ़ाई की फीस बहुत बढ़ चुकी है

दिल्ली विश्वविद्यालय के बहुजन अध्यापक कम से कम पिछले तीन महीनों से आरक्षण बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आज आलम ये है कि विश्वविद्यालयों में छात्रों की पढ़ाई की फीस बहुत बढ़ चुकी है. सरकार और विश्विद्यालय अनुदान आयोग अब कह रहे हैं कि सभी कालेज और विश्वविद्यालय अपने धन की व्यवस्था खुद करेंगे. इसका मतलब क्या है? यदि सरकार शिक्षा से पूर्णतः हाथ खींच लेगी तो क्या होगा ? इसकी मार सब पर पड़ेगी, गरीब सवर्णों पर भी, लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रभावित तबका होगा वो होगा बहुजन समाज.

अब सरकार ने एक और नयी घोषणा की है, वह है कि विश्विद्यालय अनुदान आयोग को ख़त्म कर वह एक उच्च शिक्षा का नया आयोग बनाना चाहती है. जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, और मेम्बर सेक्रेटरी के अलावा 12 अन्य सदस्य होंगे. इनमें एक देश के ‘नामी गिरामी’ उद्योगपति भी होंगे.

शिक्षा में भी बढ़ेगा वर्ग चरित्र

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बनाने के नाम पर लाये जा रहे इस ड्राफ्ट बिल को देखकर तो लगता है कि सरकार इस पर कोई बहस नहीं चाहती और वह सीधे यूजीसी को ख़त्म कर अपना पूर्ण नियंत्रण वाला आयोग बना देना चाहती है. गुणवत्ता के नाम पर स्किल इंडिया का प्रचार होगा. इसके अलावा सरकार के नए आयोग को निजी विश्वविद्यालयों को खोलने की अनुमति देने का अधिकार होगा. अभी ये प्रक्रिया विधानसभाओं या संसद के हाथ में थी. नए कमीशन को विश्वविद्यालयों की मान्यता रद्द करने का अधिकार भी होगा और विदेशी विश्वविद्यालयों या देश में भी नामी गिरामी कालेजों को भी विश्वविद्यालाओ के समकक्ष डिग्री देने की स्वतंत्रता होगी. यानी शिक्षा में वर्ग चरित्र भी बढेगा क्योंकि दिल्ली के सेंट स्टीफेंस, लेडी श्री राम कालेज, श्रीराम कालेज ऑफ़ कॉमर्स और कई ऐसे कालेज हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे डीम्ड यूनिवर्सिटी होने के सपने देख रहे हैं और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर कार्य करना चाहते हैं. आज भी ऐसे विद्यालयों में आम छात्रों का एडमिशन मुश्किल होता है. क्या जब इनको क्वालिटी के नाम पर कुछ भी करने की आजादी होगी तो ये बहुजन समाज के छात्रों को कोई स्थान देंगे? हम तो ये मानते हैं कि देश में विविधता को अपने कैंपस में समेटने का थोड़ा बहुत काम जेएनयू ने किया है. चाहे जो है, वहां से दलित, ओबीसी, मुस्लिम, आदिवासी छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में आये हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में उनकी संख्या बढ़ी है. देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी बहुजन छात्र भारी संख्या में आ रहे हैं.

जनरल सीटों से भी टॉप कर रहे एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को चालाकी से आरक्षण में डाला जा रहा

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अब एससी, एसटी और ओबीसी छात्र न केवल आरक्षण से आ रहे हैं, अपितु जनरल सीटों से भी टॉप कर रहे हैं, लेकिन चालाकी से उनको भी आरक्षण में डाला जा रहा है. इस प्रकार से धूर्त अधिकारियों ने ‘जनरल’ या ‘सामान्य’ सीटों को सवर्णों की ‘घोषित कर दिया है जो संविधान के साथ मक्कारी है. जनरल या सामान्य का मतलब सवर्ण नहीं अनारक्षित है. जैसे रेलवे के अनारक्षित कोच में टिकेट लेकर कोई भी बैठ सकता है वैसे ही अनारक्षित सीट पर साधारण कम्पटीशन के जरिये आने वाले सफल प्रतियोगियों को आरक्षण की कैटेगरी में डालना दरअसल दलित ओबीसी, आदिवासी समुदायों के अधिकारों पर डाका डालने जैसा है.

न्यायपालिका और मीडिया में बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व

वैसे न्यायपालिका में कहीं भी बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व नहीं है. मीडिया उनकी पहुँच से बाहर है. एकेडेमिया में थोड़ा जगह थी वो भी हाथ से निकल चुकी है, सिविल सर्विसेज में नरेन्द्र मोदी की सरकार अब बाहर से ‘विशेषज्ञों’ के नाम पर नयी भर्ती करेगी जो सीधे-सीधे आरक्षण पर हमला है. सारे काम चुपचाप या बेशर्मी से हो रहे हैं, लेकिन दलित बहुजन समाज के राजनैतिक नेतृत्व इन प्रश्नों पर अपने साथियो के साथ में जो युवा है और समाज को वैचरिक नेतृत्व देने के लिए आगे आयेंगे, चुपचाप है.

यूजीसी ख़त्म : शिक्षा में सीधे-सीधे निजीकरण को आगे करने और आरक्षण को ख़त्म करने की चाल

आज 7 जुलाई शाम तक यूजीसी को ख़त्म करने वाले ड्राफ्ट बिल पर जनता की राय देने की डेड लाइन है जो शिक्षा में सीधे-सीधे निजीकरण को आगे करने और आरक्षण को ख़त्म करने की चाल है. हमारे नेता चुप हैं. क्यों ? शिक्षा का प्रश्न दलित बहुजन समाज के सम्मान सहित मरने जीने का प्रश्न है. राजनैतिक गणित छोड़कर अब इन प्रश्नों पर सवाल खड़े करने का प्रश्न है. शिक्षा का निजीकरण या व्यवसायीकरण सभी समाजों के गरीब और होनहार बच्चों के साथ धोखा और अन्याय है. क्या इन प्रश्नों पर अब बोलने और आन्दोलन का समय नहीं है?

धोखेबाजी को रोकना जरूरी

7 अगस्त 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद के अन्दर पिछड़ी जातियों को आरक्षण की घोषणा की और देश में सवर्णों ने इसे अपने अधिकारों पर हमला मानते हुए उस सरकार के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया था. हम लोगों उस समय एक-एक पल याद है. अखबारों की भद्दी गालियां याद हैं. उस समय के योद्धा लोग आज मंत्री भी हैं और कुछ विपक्ष में भी. क्या हम जागेंगे या नहीं. सवाल उस राजनैतिक नेतृत्व का है जो अपने युवाओं की भावनाओं से खेल रहा है और उसके प्रश्नों को दमदार तरीके से नहीं उठा रहा. ये चुनाव का प्रश्न है. अभी इस बिल और हो रही धोखेबाजी को रोकना जरूरी है. क्या हमारी साल की महत्वपूर्ण लिस्ट में आज का दिन है या नहीं. यदि नहीं तो भविष्य में ये तारीख जरूर याद दिला देगी कि हम अपने अधिकारों के लिए सतर्क नहीं थे और कारवां कैसे लुटा.

उम्मीद है सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करने वाले सभी लोग इस पर अपना विरोध जताएंगे और इस ड्राफ्ट बिल को वापस लेने के मजबूर करेंगे या इसमें बहुजन समाज के हितो को सुरक्षित करने के लिए व्यापक बहस की बात करेंगे. मात्र संसद में बहस से इस बिल को पास करना अन्याय होगा क्योंकि इस ड्राफ्ट पर सभी विश्वविद्यालयों, और अन्य शोध संस्थानों, छात्रों और छात्र संगठनों के बीच भी चर्चा होना जरूरी है. क्या हमारे नेता थोड़ा समय निकालकर इन प्रश्नों पर कोई निर्णायक लड़ाई लड़ने को तैयार है या नहीं, यदि वे ऐसा नहीं करते तो भविष्य की पीढ़ियां उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगी.

 

 

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