माओवादियों से निपटने के नाम पर आदिवासियों का आमसंहार नहीं चलेगा

भारत में लोकतंत्र सबके लिये है. ख़ासकर बुद्धिजीवी इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं. उनका यह रुख़ भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रणाली की रक्षा के लिये है. और इसकी वजह से उन्हें अर्बन नक्सल कहा जा रहा है....

माओवादियों से निपटने के नाम पर आदिवासियों का आमसंहार नहीं चलेगा

उज्ज्वल भट्टाचार्या

भारत के माओवादी दरअसल पोलपोटवादी हैं, जो कभी-कभी वर्गशत्रु के ख़ून से नहाने की बात करते हैं.

ऐसी हैवानी धारणा को सिरे से ठुकराना है. यह एक मानवीय समाज गढ़ने की कोशिश का हिस्सा नहीं हो सकता.

बांगला की एक प्रसिद्ध लेखिका व ऐक्टिविस्ट संथाल इलाके में आदिवासियों के बीच उल्लेखनीय काम कर रही थीं. इस बीच अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त एक उत्तर औपनिवेशिक चिंतक महिला ने अपनी कोशिश से वहां बच्चों के लिये एक स्कूल खोला. लेखिका दीदी नाराज़ हो गईं. उन्होंने कहा - हमारे इलाके में तुम क्यों आये हो ?

चिचेक ने भी मुक्तिकामी ताकतों के दकियानूसी भरे ऐसे रुख़ की ओर ध्यान दिलाया है.

भारत में लोकतंत्र सबके लिये है. ख़ासकर बुद्धिजीवी इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं. उनका यह रुख़ भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रणाली की रक्षा के लिये है. और इसकी वजह से उन्हें अर्बन नक्सल कहा जा रहा है.

जहां तक माओवादियों का सवाल है, तो अपने असर के इलाके में वे अपनी पार्टी के अलावा और किसी को अपनी बात कहने की इजाज़त नहीं देते. अगर कोई ऐसी हिम्मत करता है तो जान देकर उसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है.

ऐसी राजनीति को पूरी तरह से ठुकराना लाज़मी है, ठुकराया जाता है, पूरी ताक़त के साथ इस राजनीति का मुक़ाबला किया जाना है - फिर भी इस बात पर ज़ोर दिया जाता रहेगा कि भारत में लोकतंत्र सबके लिये है. और माओवादियों से निपटने के नाम पर आदिवासियों का आमसंहार नहीं चलेगा.

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