बहुत खतरनाक हैं ये -‘अर्बन नक्सल’ क्योंकि ये सरकार की नाकामियों और संघ के एजेंडे को जनता के सामने ला रहे

संघ के हिन्दुत्व फासीवादी एजंडे में दलित, आदिवासी फिट नहीं होने की संघ की खीझ

सुनील कुमार
Updated on : 2018-09-08 13:45:04

बहुत खतरनाक हैं ये -अर्बन नक्सल क्योंकि ये सरकार की नाकामियों और संघ के एजेंडे को जनता के सामने ला रहे

संघवाद बनाम अर्बन नक्सल

सुनील कुमार

भारत में शासक वर्ग द्वारा एक नये शब्द का ईजाद किया गया है-‘अर्बन नक्सल’। आखिर शासक वर्ग को इस शब्द को क्यों ईजाद करना पड़ा? मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में संघी और पूंजीपतियों के एजेंडे को लागू करने की रफ्तार तेज हो गई है। मोदी सरकार 2014 के चुनाव में किये गये कोई भी वायदा पूरा नहीं कर पाई है। यहां तक कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने कभी लालकिले के प्राचीर से तो कभी अपने वक्तव्य में कई बातें कहीं-जैसे कि ‘बहुत कट मर लिये, हम इसे दस साल तक के लिए रोक सकते हैं,’ ‘80 प्रतिशत गौरक्षक भ्रष्ट हैं, हमने राज्य सरकार को डोजियर बनाने के निर्देश दिए हुए हैं’, ‘दलितों को गोली मत मरो, मुझे मार दो’ आदि आदि।

मोदी के बोलने के बाद देश में पहले से ज्यादा गाय के नाम पर किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों पर आर्थिक और शारीरिक हिंसा बढ़ी है। एक तरफ ‘सबका साथ-सबका विकास’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे देते रहे, और दूसरी तरफ बैंकों को लूट कर यहां के पूंजीपति विदेशों में मौज उड़ाते रहे।

मोदीजी की ‘मेक इन इंडिया’ की हालत यह है कि उसका नाम लेना भी वे भूल गए हैं। महिलाएं पहले से और ज्यादा असुरक्षित हो गई हैं। एक तरफ सरकार के जो एजेंडे जनता के लिए थे वे फेल हो गये, लेकिन पूंजीपति वर्ग की दिन दुगनी-रात चौगुनी लूट होती रही और उनकी पूंजी में बेहताशा बढ़ोतरी होती गई। पूंजीपति अपने लूट को और रफ्तार देने के लिए जंगलों में रह रहे आदिवासियों के उन जमीनों पर गिद्ध दृष्टि लगाये हुए हैं जहां पर उनके नीचे खनिज सम्पदा दबी हुई है। इसके लिए वे लगातार आदिवासियों की हत्याएं किये जा रहे हैं।

दूसरी तरफ संघ अपने हिन्दुत्व फासीवादी एजंडे को लेकर आगे बढ़ रहा है। वह बेरोजगार युवाओं को अंध-देशभक्ति का पाठ पढ़ा कर सरकार की नाकामियों को छुपाने के साथ-साथ अपने एजेंडें में उनको ढालने का काम कर रहा है। वह अल्पसंख्यकों, मेहनतकशों, प्रगतिशील लोगों पर हमले करा रहा है जिससे कि देश में एक भय का माहौल बना हुआ है। इन अपराधियों को पुलिस पकड़ती नहीं है। अगर कभी जन दबाव में पकड़ना भी पड़ा तो उनको जल्दी जमानतें मिल जाती हैं। सरकार के मंत्री उनको जाकर माला पहनाते हैं जैसे वे अपराधी नहीं, कोई नायक हो। हत्यारों को खुलेआम कहा जाता है कि तुम ही आज के भगत सिंह और चन्द्रशेखर हो। इस तरह की उपमाओं से इन शहीदों के बलिदान की भी खिल्ली उड़ाई जाती है और हत्यारों के मनोबल को बढ़ा कर और हत्याएं करने की खुली छूट दे दी जाती है।

सरकार की नाकामियों और संघ के एजेंडे को जनता के सामने लाने का काम कर रहे हैं अर्बन नक्सल

बुद्धिजीवी (अर्बन नक्सल) सरकार की इन्हीं नाकामियों और संघ के एजेंडों को जनता के सामने लाने का काम कर रहे हैं। वे आम-आवाम, शोषित-पीड़ित जनता के लिए वर्षों से लिखते-पढ़ते, लड़ते आ रहे हैं, चाहे देश में किसी की भी सरकार हो। 2014 के बाद जिस तरह से संघ का फासीवादी एजेंडा बढ़ता गया ये लोग भी उतनी ही जवाबदेही के साथ पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखकर और सभाओं, धरने-प्रदर्शनों में अपने भाषणों के द्वारा लोगों के सामने संघ के फासीवादी चेहरे को उजागर करते रहे हैं। संघ के फासीवादी एजेंडों के अलावा ये पूंजीपति वर्ग के लूट पर भी लिखते-बोलते रहे हैं। आम लोगों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिले, इसके लिए वे कोर्ट से लेकर सड़क तक लड़ते रहे। देश के संसाधन आम जनता से छीन कर पूंजीपतियों के हवाले करने का विरोध करते रहे। आम जन को स्वास्थ्य, शिक्षा मुफ्त मिले, इसके लिए निजीकरण का विरोध करते रहे। वे चाहते हैं कि देश में अमन-शांति हो, हर हाथ को काम मिले और कोई किसी के खून का प्यासा नहीं हो। सबको अपनी मर्जी से सामाजिक-धार्मिक जीवन चुनने का अवसर मिले। ‘अर्बन नक्सल’ की यही सोच, सरकार और संघ के मन्सूबे पर पानी फेर देता था। इनको किसी तरह फंसाने के लिए सरकार के मंत्री, आला अधिकारी दिन-रात योजना बनाते रहे।

आखिर ये बुद्धिजीवी (अर्बन नक्सल) हैं कौन ?

कौन हैं सुधा भरद्वाज

अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़कर छत्तीसगढ़ में मजदूरों-आदिवासियों के हकों के लिए लड़ती रही। खुद आदिवासी की तरह एक छोटे झोपड़े में रहती थी। उनका घर ही उनका दफ्तर हुआ करता था, जो कि 24 घंटे जनता के लिए खुला रहता है। अभी दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में लॉ पढ़ा रही हैं।

कौन हैं गौतम नवलखा

देश-दुनिया के प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ता, प्रतिष्ठित पत्रिका ईपीडब्ल्यू के सलाहकार मंडल के सदस्य हैं। इन्होंने अपने जीवन के 40 साल से भी अधिक समय को देश के शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में लड़ते हुए लगा दिया।

कौन हैं वरवर राव

रिटार्यड लेक्चरार, जो अपने छात्र जीवन से ही देश में चल रहे शोषित-पीड़ित जनता के संघर्ष के साथ खड़े रहे, उनके पक्ष में तेलगू में कविताएं और लेख लिखते रहे, जिनका कई भाषाओं में अनुवाद होता रहा। क्रान्तिकारी लेखक संघ विरसम के संस्थापक रहे। उन्होंने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण साल जेल में बिताये।

कौन हैं आनन्द तेलतुंबड़े

दलित चिंतक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, जो कई कम्पनियों में सीओ रह चुके हैं। ईपीडब्लयू में लगातार लिखते रहते हैं। अभी गोवा में मैनेजमेंट के सीनियर प्रोफेसर हैं। मूलतः अंग्रेजी में लिखने वाले आनन्द तेलतुंबड़े के लेख अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।

कौन हैं अरूण फरेरा

अरूण फरेरा पांच साल जेल में बिताने के बाद 2014 में बरी होकर बाहर आये। एक केस में तो उन्हें जेल से बाहर होते ही गेट पर पकड़ा गया और फर्जी केस में दुबारा जेल में डाल दिया गया, जिसमें भी वे बरी हो गये। जेल में रहते ही उन्होंने वकालत की पढ़ाई पूरी की और बाहर आकर शोषितों-पीड़ितों, सरकार द्वारा सताये गये लोगों का केस लड़ने लगे। अरूण अपने छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़कर सामाजिक कार्य करते रहे हैं। जेल में बिताये गये पांच सालों का अनुभव उन्होंने अपनी किताब ‘कलर्स ऑफ द केज : ए प्रिजन मेमॉयर’ में लिखा है।

कौन हैं वेरनॉन गोंजाल्विस

मुम्बई विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडलिस्ट, रूपारेल कॉलेज के पूर्व लेक्चरर रहे हैं। उनकी पत्नी बाम्बे हाईकोर्ट की वकील हैं। वेरनॉन अभी मुम्बई में सीपीडीआर (मानवाधिकार संगठन) के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं। सरकार ने उनको भी 6 साल जेल में कैद रखा। वहां से वे बरी होकर आये और वंचित लोगों की आवाज बनकर मुम्बई में काम करने लगे।

कौन हैं फादर स्टेन स्वामी

वे 83 साल के हैं और समाजशास्त्र से एमए किए हुए हैं। उन्होंने विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन की स्थापना की है। रांची के नामकुम में आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल और टेक्निकल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट चलाते हैं।

संघ के हिन्दुत्व फासीवादी एजंडे में दलित, आदिवासी फिट नहीं होने की संघ की खीझ

विभिन्न कारणों से संघ के हिन्दुत्व फासीवादी एजंडे में यहां के दलित, आदिवासी फिट नहीं हो पा रहे हैं। इसकी खीझ संघ को इन बुद्धिजीवियों पर है, जो वंचित लोगों कि लड़ाई लड़ रहे हैं। माओवादी के नेतृत्व में जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए आदिवासी लड़ रहे हैं, जो कि संघ और पूंजीपतियों की नीतियों को नकारते हैं। ‘नई पेशवाई राज‘ के खिलाफ एल्गार परिषद ने भीमा कोरेगांव में 31 दिसम्बर, 2017 को एक आयोजन किया था, जिसमें कहा जाता है कि देश भर से करीब 5 लाख दलित, शोषित-पीड़ित, प्रगतिशील जनता जुटी थी। इस परिषद के आयोजकों में से एक सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पी.वी. सावंत थे। उन्होंने बीबीसी को बताया है कि इसके आयोजन का मुख्य मकसद राज्य तथा केन्द्र सरकार के द्वारा संविधान के उल्लंघन का मामला उठाना था। इस सभा के समापन पर सभा में आये सभी लोगों ने शपथ ली कि ‘‘जब तक भाजपा सत्ता से हट नहीं जाती तब तक चैन की सांस नहीं लेंगे’’।

यही आरएसएस को नागवार गुजारा और अपने छद्म संगठन के अगुआ संभाजी भिंडे (जिसका मोदी के साथ फोटो भी आ चुका है) और मिलिंद एकबोटे के नेतृत्व में सभा पर हमला करा दिया। इस हमले में सभा में शामिल एक व्यक्ति की मौत हो गई। इसमें पुणे पुलिस ने जांच कर 3 जनवरी, 2018 को ‘हिन्दू एकता मंच’ के मिलिंद एकबोटे और ‘शिव प्रतिष्ठान’ के संभाजी को इस हिंसा के लिए आरोपित बनाया। मिलिंद एकबोटे को गिरफ्तार किया गया, जिसके कुछ दिन बाद ही वे जमानत पर रिहा हो गये।

उसके बाद पुणे पुलिस ने यू टर्न लेते हुए ‘एल्गार परिषद’ के आयोजकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारे। इस छापे के बाद 6 जून को कुछ और नये नाम के साथ पुलिस ने घरों पर छापा मारा और अंग्रेजी की प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता सोमा सेन, जाने-माने वकील और गरीबों-वंचितों की लड़ाई लड़ने वाले सुरेन्द्र गाडलिंग, सामाजिक कार्यकर्ता और विद्रोही पत्रिका के सम्पादक सुधीर धावले, राजनीतिक बंदियों की लड़ाई लड़ने वाले रोना विल्सन और विस्थापन के सवाल पर काम करने वाले महेश राउत को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। एक झूठी खबर फैलाई गई कि रोना विल्सन के घर से एक पत्र मिला है जिसमें नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश की बात लिखी हुई है। यह पत्र मीडिया और भाजपा के आईटी सेल के पास तो आ गया, लेकिन इसे कोर्ट में सबूत के तौर पर नहीं रखा गया। 90 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने इनके ऊपर चार्जशीट दाखिल नहीं किया और कोर्ट से 90 दिन का और वक्त मांगा।

यह अफवाह ठंडी पड़ी ही थी कि तभी पुणे के बहादुर पुलिस वालों ने एक साथ कई शहरों (दिल्ली, हैदराबाद, बम्बई, रांची, गोवा, फरीदाबाद) में 28 अगस्त को सुबह-सुबह छापेमारी कर सनसनी फैला दी। जिन लोगों के घरों में छापेमारी की गई वे अपने छात्र जीवन से ही समाज के शोषित-पीड़ित, वंचित तबकों के लिए बोलते, लिखते रहे हैं। इनमें से कई लोगों की पहचान, देश में ही नहीं, विदेशों में भी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में विख्यात हैं।

यह महाराष्ट्र की वही बहादुर पुलिस है जो कि 5 साल बीत जाने के बाद भी नरेन्द्र दाभोलकर और पानसारे के हत्यारों के गैंग तक नहीं पहुंच पाई है और ना ही इतनी तत्परता के साथ उनके अड्डों पर छापेमारी की है। क्या महाराष्ट्र के आला अधिकारी, बुद्धिजीवियों के घरों पर छापेमारी कर संघ के घिनौने कृत्य को समाज से छिपाना चाहती है? 10 अगस्त को नालासोपरा में मुंबई पुलिस ने एक घर पर छापेमारी की थी, जिसमें भारी मात्रा में देशी बम, पिस्तौल और उनके बनाने की सामग्री मिली थी। इसमें चार लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनका सम्बंध ‘गौ रक्षक दल’ और ‘शिव प्रतिष्ठान’ संगठन से था। इस मामले का मुख्य अभियुक्त वैभव राउत ‘सनातन’ और हिन्दू जन जागृति समिति’ जैसे संगठनों के साथ भी मंच पर देखा जाता रहा है। वैभव राउत को श्रीराम सेना का भी प्रतिनिधित्व करते हुए देखा गया है।

श्रीराम सेना पब में और दिल्ली के भी कई सम्मेलनों में उत्पात मचाते रहे हैं। गौरी लंकेश की हत्या में गिरफ्तार एक अभियुक्त ने सचिन अंदुरे को पिस्तौल दी थी, जो कि नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या में शामिल था। इस तरह से इन अभियुक्तों का हत्यारा गैंग पूरे भारत के हिस्से में फैले हुए हैं जो कि संघ के फासीवादी विचार में रोड़ा बन रहे वैज्ञानिकों, सामाजवादियों और बुद्धिजिवियों की हत्यांए कर रहा है। यह गिरोह देश के चार प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सोच के लोगों की हत्या कर चुका है, लेकिन महाराष्ट्र पुलिस इस गैंग के अंतिम छोर तक पहुंचने के लिए सक्रिय नहीं दिखी। महाराष्ट्र पुलिस प्रधान मंत्री की जान को खतरा बता रही है, जबकि देश का खुफिया विभाग रॉ के पास कोई सूचना ही नहीं है।

महाराष्ट्र पुलिस के एडिशनल डायरेक्टर जनरल (कानून और व्यवस्था) परमबीर सिंह ने प्रेस वार्ता करके इन बुद्धिजीवियों मीडिया ट्रायल करने की कोशिश की है, जिस पर बाम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को फटकार लगाई है। महाराष्ट्र के आला अधिकारी जो सबूत मीडिया के सामने रख रहे हैं वह अभी तक कोर्ट में साक्ष्य के रूप में नहीं रखे हैं। यह उसी तरह की घटना है जिस तरह जेएनयू में मीडिया ट्रायल कर लोगों में नफरत भरा गया और कन्हैया, उमर के चेहरे को इतनी बार दिखाया गया कि कुछ सिरफिरे उनकी जान के दुश्मन बन गये। कन्हैया के ऊपर यात्रा के दौरान जहाज में गला दबाने का प्रयास किया गया तो उमर के ऊपर संसद भवन के पास गोली चला कर जान से मारने का प्रयास किया जाता है। लेकिन दो साल बाद भी पुलिस उस केस में चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई है। अगर इन बुद्धिजीवियों के ऊपर कल संघी गुंडों द्वारा हमला किया जाता है तो उसके जिम्मेवार कौन होगा? श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल को लिखे पत्र में कहा था कि ‘यह अदालत तय करेगी कि गांधी की हत्या में सावरकर शामिल थे या नहीं। मगर मेरे मन में इस बात को लेकर कोई शंका नहीं है कि हिन्दुत्ववादी संगठनों ने जिस तरह का वातावरण बनाया, गांधी की हत्या उसी का परिणाम था’। आज इसी तरह की भीड़ संघ गिरोह ने तैयार कर रखी है जो मॉब लिचिंग के नाम पर लोगों की जान ले रही है। विचारों की असहमति को ‘देशद्रोह’ बता दिया जाता है। संघ के फासीवादी मनसूबे में रोड़े बन रहे बुद्धिजीवियों को आज ‘अर्बन नक्सल’ कहा जा रहा है। यह गिरोह जानता है कि ये बुद्धिजीवी कानून से छूट जायेंगे, लेकिन देश में ऐसा माहौल का निर्माण करो जिससे कि इनकी कभी भी किसी सिरफिरे व्यक्ति द्वारा हत्या हो जाए-जैसे कि नरेन्द्र दाभोलकर, पानसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएं हुइंर्। असहमति की आवाज संघ गिरोह को बर्दाश्त नहीं। संघ गिरोह संविधान में बदलाव कर वंचित वर्ग की हिस्सेदारी को हड़पना चाहता है, इसलिए संविधान को जलाने वाले, अल्पसंख्यक- मेहनतकश समुदाय पर हमले करने वाले इनको देशभक्त लगते हैं। नक्सलवादी एक समतामूलक समाज बनाना चाहते हैं, जिसमें वंचित वर्ग, मेहनतकश समुदाय को भी सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिले। यह संघ हिटलरवाद बनाम नक्सलवाद की टकराहट है और नक्सलवाद को दबाने के लिए सरकारी पुलिस मशीनरी का दुरूपयोग किया जा रहा है।

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Topics - Unionism, Urban Naxal, Hindutva of Sangha, Fascist Agenda, Dalit, Adivasi, Hitlerism vs. Naxalism, Hitlerism, Naxalism,

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