संगठित धर्म इक्कीसवीं सदी का नासूर है भले ही बौद्ध क्यों न हो ?

बुर्जुआ लोकतंत्र में धार्मिक गोलबंदी कैसे न हो यह संभव ही नहीं? संगठित धर्म और बुर्जुआ लोकतंत्र इक्कीसवीं सदी के मानव समाज के सम्मुख सबसे विकट चुनौती है। ...

शमशाद इलाही शम्स

पिछले चार पांच दिनों से गौर कर रहा था कि जय बीन कबीले से कोई आवाज़ उठे, एक भी न मिला, न बीनवादी - न भंते वादी।

हुआ यूं कि 17 नवंबर को कोलम्बो के दक्षिण में 110 किलोमीटर दूर गिनटोटा शहर है जहाँ एक सड़क दुर्घटना हो गयी जो देखते देखते मुसलमान - बौद्ध सिंघली संघर्ष में तब्दील हो गयी। सिंघली बौद्धों ने 100 से ज्यादा मुसलमानों के घरो- दुकानों में आग लगा दी, लूटपाट की. श्रीलंकन हकुमत को कर्फ्यू लगाना पड़ा जो दो दिन पहले ही उठा।

सनद रहे श्रीलंका की 21 मिलियन आबादी का 70% सिंघली/ बौद्ध, दूसरी अकलियत तमिल/हिन्दू है और तीसरी अकलियत 10% मुसलमान है। तमिलों को ठिकाने लगाने के बाद अब बौद्ध आतंकवादियों के निशाने पर मुसलमान आबादी है।

बुर्जुआ लोकतंत्र में धार्मिक गोलबंदी कैसे न हो यह संभव ही नहीं? संगठित धर्म और बुर्जुआ लोकतंत्र इक्कीसवीं सदी के मानव समाज के सम्मुख सबसे विकट चुनौती है। इन दोनों का घातक मिश्रण ऐसा ज्वलनशील जनविरोधी सैलाब तैयार करता है जिसके सामने वर्ग संघर्ष के सीमेंट से कितनी भी मज़बूत इमारत बनी हो -पलक झपकते ही रेत की तरह ढह जाती है।

ये तो रही उसूल की बात जो ऊपर कही। अब मसला भारत के पेट अफारू उस दलित तबके से है जो रात दिन मेहनतकश आवाम को हिन्दू धर्म के खूटे से खोल कर बुद्ध के खूंटे पर बाँध देने की मशक्कत में जुटा है। ये दीन दरिद्र तबका बर्मा पर चुप है, यही ज़हनी खुटकल वर्ग श्रीलंका पर खामोश है। बिलकुल वैसे ही एक ढीठ मुसलमान की तरह जो भारत में मोती -संघ के खिलाफ है लेकिन तुर्की के मुल्लाह एर्दोगान का पक्का मुरीद है।

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