नफरत की हिंसा को जिलाए रखने के लिए एक मॉब लिंचिंग का ही आसरा

जिस प्रकार की भीड़ हिंसा का सिलसिला मई 2014 के बाद से शुरू हुआ है, वह सामान्य नहीं...

अतिथि लेखक

नफरत की हिंसा को जिलाए रखने के लिए एक मॉब लिंचिंग का ही आसरा

-रामशरण जोशी

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीड़ हिंसा पर बोलते हुए दिल्ली में 1984 के दंगों को याद किया जिसमें हजारों सिखों की जानें गईं। इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या से राजधानी दिल्ली में दंगे भड़के और निर्दोष सिख नागरिकों की जान-माल को अपार क्षति पहुँची। बेशक इसे स्वतः स्फूर्त हिंसा नहीं कहा जा सकता। यह एक सीमा तक प्रायोजित थी जिसमें कथित रूप से कांग्रेस के बड़े नेता किसी स्तर पर लिप्त रहे।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी राजनाथ सिंह के सुर में सुर मिलाते हुए 1984 की हिंसा को याद किया है। इस हिंसा की हर स्तर पर भर्त्सना की जानी चाहिए।

जिस प्रकार की भीड़ हिंसा का सिलसिला मई 2014 के बाद से शुरू हुआ है, वह सामान्य नहीं

इसमें शक के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन, इसी सन्दर्भ में एक सवाल जरूर पैदा होता है। जब गृहमंत्री और मुख्यमंत्री 34 साल पुरानी घटना याद रख सकते हैं तब 12 साल पुरानी अहमदाबाद की भीड़ हिंसा को याद क्यों नहीं रख सके? क्या 2002 में मुसलमानों की मॉब लिंचिंग नहीं हुई? क्या भीड़ ने बिल्डिंग को नहीं जलाया? क्या भीड़ ने एक पूर्व सांसद को जिंदा नहीं जला दिया था।

इस हिंसा में भी लोगों की जाने गई थीं। हिंसा का रौद्र रूप देखकर तत्कालीन भाजपा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी ही पार्टी की प्रदेश सरकार और तब के मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को “राजधर्म पालन“ की नसीहत देनी पड़ी थी। राजनाथ सिंह जी इसे क्यों नहीं याद रख पाए? इसका सीधा अर्थ यह है कि वे ‘मॉब लिंचिंग या हिंसा‘ के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टि अपनाना चाहते हैं, समदृष्टि नहीं। इसकी अपेक्षा देश के गृहमंत्री से नहीं की जाती है।

भीड़ हिंसा में समाज का कोई भी समुदाय संलिप्त रहता है, तो वह गुनहगार है।

माना सांप्रदायिक दंगे देश के लिए कोई नई परिघटना नहीं हैं। आजादी के बाद से लगातार होते रहे हैं। लेकिन, मई 2014 के बाद से जिस प्रकार की भीड़ हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ है, वह एक सीमा तक किसी नई परिघटना या फेनोमेनन से कम नहीं है। या लव जिहाद, गोरक्षा व तस्करी, बालक चोरी, चुटिया काटना, चुड़ैल घोषित करना जैसी घटनाओं ने मॉब लिंचिंग में नया आयाम जोड़ा है।

देश के विभिन्न भागों में घटने वाली इस प्रकार की भीड़ हिंसा में एक खास किस्म का ‘पैटर्न ‘ नजर आता है। देखिए, पशु तस्करी पहले भी होती रही है, अंतर जातीय व धार्मिक विवाह पहले से होते आ रहे हैं, पार्कों में प्रेमी जोड़ें पहले भी मिलते रहे हैं, लेकिन इस पैमाने की मॉब लिंचिंग पहले नहीं रही। मार-पीट जरूर रही, लेकिन, ऐसी घटनाएँ ‘राष्ट्रीय स्तर‘ का खतरा नहीं बनी थीं। इस खतरे की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा और केंद्र से कहना पड़ा कि मॉब लिंचिंग की रोकथाम के लिए कड़े कानून बनाए।

पूरा देश आ चुका है मॉब लिंचिंग की चपेट में

सारांश में, मॉब लिंचिंग किसी प्रदेश या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण राज्य तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह घटनाएँ खतरा बन चुकी हैं। यदि सवा अरब का देश ‘भीड़ इन्साफ‘ की गिरफ्त में आता है तो ‘कानून-व्यवस्था के राज‘ की क्या जरूरत है? कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो जाएगा। जाहिर है, यह स्थिति देश को पहले अराजकता में धकेलेगी। इसके बाद तानाशाही या अधिनायकवाद और फासीवाद के दौर शुरू होंगे।

स्वामी अग्निवेश की भाजपा समर्थकों ने की मॉब लिंचिंग

पिछले दिनों झारखंड में बंधुआ मुक्ति आन्दोलन के नेता स्वामी अग्निवेश पर भाजपा समर्थक भीड़ ने हमला किया था। उन्हें अध नंगा बना दिया था।

स्वामी जी ने इसे भाजपा राज्य द्वारा प्रायोजित घटना बताया है। इसका अर्थ यह है कि ऐसी लिंचिंग के गर्भ में राज्य का हाथ रहता है। इसकी पुष्टि अलवर की ताजा मॉब लिंचिंग की घटना से भी उजागर होती है। गाय तस्करी के शक में पहले अकबर खाँ को चंद लोगों ने मारा पीटा और घायल अवस्था में पुलिस उन्हें अपने वाहन में तीन घंटे तक कथित रूप से घुमाती रही। अस्पताल ले जाने के स्थान पर भीड़ हिंसा से पीड़ित अकबर को थाना ले जाया गया। इसके बाद अस्पताल जहाँ उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया।

इससे पहले भी इसी जिले में दो और घटनाएँ हो चुकी हैं। राज्य सरकार ने इस मॉब लिंचिंग के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखलाई।

उत्तर प्रदेश के दादरी काण्ड में भी यही हुआ। गोमांस रखने के शक में भीड़ ने एक मुस्लिम की जान ली। झारखंड में भी ऐसा ही हुआ। हैरत तो यह रही कि जब मॉब लिंचिंग के अपराधी जेल से जमानत पर बाहर आये तो मोदी-सरकार के मंत्री ने उनका स्वागत किया। राजस्थान में भी यही हुआ। वसुंधरा-सरकार के मंत्री ने अलवर हिंसा को हलके में लिया।

मोदी की लोकप्रियता और मॉब लिंचिंग का संबंध

मॉब लिंचिंग के प्रति हास्यास्पद नजरिया तो यह रहा है कि जब एक केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि प्रधानमन्त्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ने से इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि गोरक्षक या मॉब लिंचिंग मोदी की लोकप्रियता से जलते हैं और अपना नजला गाय के बहाने मुसलमानों पर उतारते हैं!

बच्चा चोरी के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग का मोदी की लोकप्रियता के साथ कौन सा रिश्ता हो सकता?

यही सवाल लव जिहाद पर लागू होता है। असलियत में, इस तरह की फूहड़ प्रतिक्रियाएँ और अपराधियों को फूल मालाएँ पहनाना दो ही बातों की गवाही देती हैं। एक भाजपा या संघ परिवार के नेतृत्त्व का दिवालियापन, दो भाजपा नेतृत्त्व को इस बात का अहसास हो चुका है कि गठबंधन की राजनीति के माहौल और सामान्य परिस्थितियों में उसके लिए 2019 के आम चुनावों को जीतना आसान नहीं रहेगा। समाज के चरम ध्रुवीकरण या असाधारण परिस्थितियों से ही वह वैतरणी पार उतर सकता है। इसलिए ऐसी घटनाओं का सिलसिला चलते रहना चाहिए।

2015 का साल याद करें जब देश में ‘नॉन टॉलरेंस‘ का माहौल बन गया था। समाज के ध्रुवीकरण के लिए मॉब लिंचिंग या भीड़ हिंसा के नए-नए रूपों को गढ़ा जाता है। कुल माजरा समाज को गरमाए रखने और अफवाहों के हथियारों को जंग लगने से बचाए रखने का है। नफरत की हिंसा को जिलाए रखने के लिए मॉब लिंचिंग का ही आसरा है!

(रामशरण जोशी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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( लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर 2018 अंक में प्रकाशित)

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