जब पेट्रोल 100 के पार जाने वाला है तब कोहली मोदी को चैलेंज देते हैं मोदी इस चेलेंज को एक्सेप्ट भी कर लेते हैं ?

दरअसल ये सारे हथकंडे पी आर एजेंसियों के रचे हुए हैं। नए-नए गिमिक रचने में इस एजेंसियों को महारत हासिल है। यह अमेरिकी ट्रेंड है और हर अमेरिकी ट्रेंड को कुछ समय बाद भारत मे इस्तेमाल किया जाता है।...

गिरीश मालवीय

क्या आपको आश्चर्य नही होता कि केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को अचानक फिटनेस को लेकर क्यों रूचि जाग जाती है और उनके चेलेंज पर विराट कोहली भी तुंरन्त पुशअप मारने लगते हैं ओर वह मोदी को चैलेंज देते हैं मोदी इस चेलेंज को एक्सेप्ट भी कर लेते हैं ?

दरअसल ये सारे हथकंडे पी आर एजेंसियों के रचे हुए हैं। नए-नए गिमिक रचने में इस एजेंसियों को महारत हासिल है। यह अमेरिकी ट्रेंड है और हर अमेरिकी ट्रेंड को कुछ समय बाद भारत मे इस्तेमाल किया जाता है।

पी आर एजेंसियो का काम ही होता है ‘ब्रांडिंग और इमेज बिल्डिंग’ जिससे नेताओं या पार्टी की समाज में सकारात्मक छवि बनायी जा सके, खास तौर पर इस वक़्त सरकार के खिलाफ बन रही नकारात्मक छवि को सकारात्मक बनाया जाना बेहद जरूरी है।

आप को यह इतना महत्वपूर्ण नहीं लग रहा होगा, लेकिन इन बीस सालों में दुनिया बहुत बदल गयी हैं। आज सोशल मीडिया पर लाखों करोड़ों लोग अपना वोटिंग व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हैं, इसलिए पी आर एजेंसियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस वर्चुअल स्पेस की दुनिया में जो लोगों को आभास कराया जाता है, वे वही मानना शुरू कर देते हैं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत 241 मिलियन (24.1 करोड़) फेसबुक यूजर्स के साथ दुनिया में पहले पायदान पर है और भारत में फेसबुक के 50 फीसदी से ज्यादा यूजर्स की उम्र 25 साल से कम है और इतनी बड़ी आबादी आपकी और हमारी तरह कोई संवाद करने इस फेसबुक पर नहीं आती, वह अपनी सेल्फी दिखाने के लिए फेसबुक पर आती है तो जब उसे लगता कि यूथ आइकॉन रहा विराट कोहली मोदी जी को फिटनेस चेलेंज दे रहा है तो वह एक बारगी भूल जाता है कि बेरोजगारी वाकई कोई समस्या भी है, उसे याद नही आता कि डीजल पेट्रोल के दाम रिकार्ड तोड़ चुके हैं, न उसे याद आता है कि शिक्षा संस्थानों को किस तरह से कम सरकारी फंडिंग कर उसे प्राइवेट किये जाने की ओर धकेला जा रहा है।

उसे आईपीएल से मतलब है और विराट कोहली की फिटनेस से, .........यह सब पी आर एजेंसियां अच्छी तरह से समझती हैं। एक विचारक हुए हैं राबर्ट पुकवम, उन्होंने अपनी सोशल कैपीटल थ्‍योरी के हवाले से कहा कि पहले हम 30 मिनट सामाजिक रूप से जुड़े रहते थे, पर आज यह घटकर मात्र 12 मिनट ही रह गया है' इन 12 मिनट में भी कैसे अपना संदेश देश के युवा तक पुहचाया जाए, यह पी आर एजेंसियों के लिए चेलेंज है।

सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की बौद्धिक प्रक्रिया को बाधित करना ताकि सिर्फ ये सिर्फ वही मानें जो इन्हें दिखाया जा रहा है। यह पूरा खेल सिर्फ इसी सिद्धांत के आसपास रचा जाता है।

गिरीश मालवीय की एफबी टाइमलाइन से साभार

 

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