पहचान हमें अलग कर सकती है, जोड़ भी सकती है. इन्हीं में राष्ट्र की संभावनायें और सीमायें निहित हैं.

उदारवादी ब्राह्मणवादी या सवर्ण राष्ट्रवाद Assimilation और Accomodation को Appropriation का ज़रिया मानता है, ...

उज्ज्वल भट्टाचार्या

दो-तीन साल पहले प्रो. बद्री नारायण बीएचयू में बोल रहे थे. उनका विषय आधुनिकता व दलित विमर्श से संबंधित था. उनकी आलोचना करते हुए मैंने कहा था कि वह अपने व्याख्यान में राष्ट्र शब्द को बड़ी सावधानी से टाल गए.

मुझे लगता है कि यह एक आम समस्या है. दलित विमर्श के साथ आधुनिकता को जोड़ते हुए बहस तो चलती है, लेकिन राष्ट्र के सवाल को टाल दिया जाता है, या सपाट रूप से उसे ठुकराया जाता है. शायद यह एक वजह है कि सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के प्रभाव का कारगर ढंग से सामना करने में सफलता नहीं मिल रही है.

दलित, आदिवासी, मुसलमान, स्त्री - सवर्ण इन सबको राष्ट्र में शामिल करना चाहता है. इसके लिये उसके पास तीन हथियार होते हैं : Assimilation, Accomodation और Appropriation.

उदारवादी ब्राह्मणवादी या सवर्ण राष्ट्रवाद Assimilation और Accomodation को Appropriation का ज़रिया मानता है, जबकि आक्रामक ब्राह्मणवादी या सवर्ण राष्ट्रवाद के लिये Appropriation ही Assimilation और Accomodation की बुनियादी शर्त है.

राष्ट्र है क्या ? शाही शासन से तुलना के ज़रिये शायद इसे समझा जा सकता है. शाही शासन की वैधता भगवान या ईमान के प्रतिनिधि के रूप में राजा या बादशाह की सत्ता पर टिकी होती थी. आबादी की पहचान की उसमें कोई भूमिका नहीं होती थी.

इसके विपरीत राष्ट्र की वैधता आबादी की पहचान पर आधारित होती है. इस पहचान को भाषा, संस्कृति, इतिहास, धर्म, भूगोल आदि के ज़रिये परिभाषित किया जाता है.

पहचान हमें अलग कर सकती है, जोड़ भी सकती है. इन्हीं में राष्ट्र की संभावनायें और सीमायें निहित हैं.

(उज्ज्वल भट्टाचार्या की एफबी टिप्पणियों का समुच्चय )

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