`बहुत हुआ नारी पर वार अब की बार मोदी सरकार’ : क्या हुआ तेरा वादा?

बहुत हुआ नारी पर वार, चाहे हो कोई भी सरकार, न्याय की है यही पुकार, नहीं सहेंगे और अत्याचार।...

अतिथि लेखक

महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा : क्या हुआ तेरा वादा?

महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए कदम उठायें

शालू निगम

मोदी जी जब आपकी सरकार 2014 में बनी थी तब अपने वादा किया था महिलाओं की सुरक्षा वे सशक्तिकरण का। आपकी पार्टी के मेनिफेस्टो में कहा गया था कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए, हिंसा के प्रति आपकी सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति बनाएगी। आपने अपनी सभाओं में महिला सुरक्षा को लेकर कई वादे भी किये और `बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रम की भी बात कही थी। जब आपने संविधान की शपथ ली तब ये माना है आपने कि नये भारत के निर्माण में महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। इसी के चलते बीजेपी ने चुनाव से पहले शायद ये नारा भी दिया था `बहुत हुआ नारी पर वार अब की बार मोदी सरकार’।

परन्तु आपकी सरकार को चार साल हो गये और जमीनी हालत ये है कि महिलाओं और बच्चियों पर होने वाले रेप और हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। कठुआ, उन्नाव, सूरत और अब छत्तीसगढ़ में बच्चियों पर अमानवीय बर्बर हिंसा के मामले सामने आ रहे हैं जहाँ अब तक जो लोग आरोपी पाए गए गए हैं वो कहीं न कहीं आपके दल से जुड़े हैं। ये मामले महिलाओं के प्रति हिंसा का पृथक या आंशिक उदाहरण नहीं है। ये राष्ट्रवादी ताकतों द्वारा आयोजित एक संगठित और व्यवस्थित अभियान का हिस्सा हैं जो महिलाओं, मुस्लिम, दलित और अन्य वंचित नागरिकों को आतंकित करना चाहते हैं। रेप पहले भी हुए हैं लेकिन किसी भी सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, या किसी भी सांप्रदायिक समूह ने कभी ऐसी ढाल बनकर जोर जबरदस्ती के साथ आरोपियों की रक्षा या बचाव नहीं किया।

आपके दल ने 100 स्मार्ट सिटी देने का वादा किया, लेकिन देश को 10 सुरक्षित शहर भी मिल पाने मुश्किल हो रहे हैं। आज इंसानियत शर्मसार हो रही है। यही नहीं संवेदनहीनता के नए प्रतिमान स्थापित किये जा रही हैं। क्रूरता के नए आयाम को छुआ जा रहा है। आपके शासन में ताकतवरों को समर्थन दिया जा रहा है और पीड़ितों को और उत्पीड़ित किया जा रहा है। महिलाओं और बच्चियों के शरीरों को घृणा हिंसा और सांप्रदायिक अपराधों का निशाना बनाया जा रहा है। कपटपूर्ण आक्रामकता की कुसंस्कृति के साथ विकृत सांप्रदायिकता और घृणा का जहरीला घोल, वहशी तत्वों को अपने सबसे घटिया पितृसत्तात्मक सामंती कुत्सित एजेंडा को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। महिलाओं और बच्चियों का सम्मान और अस्तित्व, चाहे वे किसी भी धर्म जाति समुदाय या संप्रदाय से हो, दोनो ही आज खतरे में है। रानी लक्ष्मी बाई, चाँद बीबी, कित्तूर चिन्नम्मा और ऐसी ना जाने बहुत वीरांगनाएं जिन्होंने देश के लिए क़ुरबानी दी उसी देश में मानो आज महिला होना भी कोई गुनाह हो ऐसा लगने लगा है।

पुलिस वे प्रशासन महिला हिंसा के इन मामलों में जानभूझ कर ढिलाई से कार्य कर रहे हैं और उस षड़यंत्र में पुलिस अफसर भी शामिल रहे। कठुआ के काण्ड में पाया गया कि चार्जशीट के मुताबिक, पुलिस टीम ने केस से बचाने के लिए बलात्कार के नाबालिग बताए गए आरोपी की मां से 1.5 लाख रुपये घूस भी ली। मंशा थी कि जांच भी आगे न बड़े और सब सबूत भी आसानी से मिटा दिये जाएँ। जब अपराध शाखा को अदालत में आरोप पत्र दाख़िल करना था, तब वकीलों के एक बड़े समूह ने अपराध शाखा का विरोध शुरू कर दिया। महिला वकील जो पीड़ित की मदद करने आयी उन्हें हर प्रकार से रोका गया, रेप की और जान की धमकी दी गयी। लगता है आरोपियों को बचाने के लिए पूरा तंत्र लगा हुआ है। यही नहीं बल्कि वहां का ताकतवर प्रभावशाली समाज भी अभियुक्तों के पक्ष में खड़ा हो गया और उस मासूम बच्ची के खिलाफ बर्बरता पूर्ण अपराध का ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे की शक्ल दे दी गयी और इसे रिफ्यूजी समस्या के साथ जोड़ दिया गया।

इससे संबंधित कुछ वीडियो वायरल हुए थे, जिसमें कथित तौर पर भाजपा नेता आंदोलन की धमकी देते भी सुनाई दिए। कठुआ में पाया गया कि प्रदर्शन में भी कथित तौर पर भाजपा के लोग शामिल थे। आज देश का ये बदहाल है कि आरोपियों के समर्थन में रैलियों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसा पहले नहीं हुआ था।

न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने का कृत्य जघन्य अपराध के समर्थन के बराबर है। यह दुर्भाग्यपूर्ण वे चिंताजनक है। ऐसा आज़ादी के बाद पहली बार हुआ जब प्रदर्शनकारी हाथों में तिरंगा लेकर आरोपी की रिहाई की मांग कर रहे थे। बलात्कारियों के समर्थन में तिरंगे का प्रयोग क्या तिरंगे का अपमान नहीं है? राष्ट्रीय ध्वज हमारे संविधान द्वारा स्थापित भारत की कल्पना, उस के सम्मान और उस विचारधारा का प्रतीक है जिसके लिए सैकड़ों आजादी के मतवालों ने अपनी जान गवाई। भारत के राष्ट्रीय ध्वज का सांप्रदायिक कारणों के लिए या जघन्य अपराध को बढ़ावा देने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।

और उन्नाव में तो बीजेपी विधायक ही युवती से गैंगरेप के आरोप के दोषी पाए गए। पीड़ित लड़की महीनों न्याय के लिए गुहार करती रही। पीड़िता ने मुख्यमंत्री के घर के बाहर अपने को आग लगाई थी। बच गई। मुक़दमा फिर भी दर्ज नहीं हुआ। उलटे लड़की के पिता को पकड़ लिया और पुलिस कस्टडी में ही मौत के घाट उतार दिया। हंगामे के बाद भी प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगी और अभियुक्त विधायक शान से घूमता रहा। अभियुक्त को बचाने की सरकार की तरफ से पूरी कोशिश की गयी। कपटपूर्ण तरीके से प्रेरित घृणा और भय का माहौल बनाया गया और क्रूरता पूर्ण राजनितिक षड़यंत्र रचा गया। क्या ऐसी स्थिति में भारत की बेटियों को इंसाफ मिलेगा?

2012 में हुए निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा समिति का गठन हुआ था और बलात्कार विरोधी कानून में संशोधन भी हुए थे। पर आज भी महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या में कमी नहीं आई और आंकड़े बताते हैं कि पिछले चार सालों में बच्चों और महिलाओं पर होने वाले अपराधों में वृद्धि हुई है। क्या नए भारत में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है? क्या नए भारत में महिलाओं पर वार कम नहीं होंगे? क्या किसी भी देश या समाज का निर्माण उसकी आधी आबादी के अधिकारों को अनदेखा कर किया जा सकता है? आपकी पार्टी ने जो चुनाव के समय देश की महिलाओं से वादे किये वो कब पूरे होंगे?

आपकी पार्टी के मंत्री कहते हैं की कानून में बदलाव कर रेप के आरोपियों को फाँसी की सज़ा देने से बदलाव हो जायेगा जो कि गलत तथ्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में और जस्टिस वर्मा समिति भी ये कहा है की फाँसी की सजा केवल rarest of rare case में ही दी जानी चाहिए। केवल कानून में बदलाव करने से महिला हिंसा के मामले काम नहीं होंगे जब तक उसके पीछे की वहशी सोच नहीं बदलेगी यह बात आज सब जानते हैं। मध्य प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में कानून में बदलाव कर फाँसी की सज़ा को जोड़ा गया परन्तु क्या वहां आपराधिक घटनाएं कम हो गयी क्या? इस विषय पर क्या आपके मंत्रियों ने शोध किया है क्या? विश्व भर के देशों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह सब एक छलावा मात्र है जो आपके मंत्रियों द्वारा आम जनता को बहकाने के लिए किया जा रहा है।

इसलिए महिला नागरिकों की यह मांग है आप अपना चुनावी वादा पूरा करें। ये अधिकारों की मांग है कोई भीख नहीं। गणतंत्र राष्ट्र में संवैधानिक मूल्य, सामाजिक न्याय, न्यायिक सिद्धांत, प्रशासनिक और नैतिक व्यवस्था कायम रहे इसलिए आपका आह्वान किया जाता है कि

  1. पीड़ित महिला या बच्ची या उसके परिवार को, चाहें वे किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय के हो, उन्हें अति शीघ्र, हर प्रकार की मदद उपलब्ध हो। निर्भया फण्ड में इसके लिए पहले ही प्रावधान मौजूद हैं।
  2. दोषियों को बिना देरी के सलाख़ों के पीछे भेजा जाये वे उन पर जल्द से जल्द कार्यवाही हो जिसके लिए बनाये गए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स सुनवाई करें। पीड़ित, उसके परिवार और गवाहों को ताकतवर अभियुक्तों से सुरक्षा प्रदान की जाये।
  3. जो मंत्री, अफसर या नेता चाहें वो किसी भी पार्टी के हों यदि इसके लिए किसी भी तरह ज़िम्मेवार हों उन पर सख्त कार्यवाही हो। यदि कोई नेता ही बलात्कार का दोषी पाया जाये तो न केवल उसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही हो पर उसके वापस राजनीती में आने पर भी रोक लगायी जाये।
  4. जो नेता या मंत्री, चाहे वे किसी भी पार्टी या विचारधारा से हों, महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बयान देते हों, या महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध, धर्म या जाति के नाम पर ज़हर उगलते हों, या धर्म, जाती इत्यादि के नाम पर महिलाओं पर हिंसा करने सम्बन्धी भड़काऊ ब्यान देते हों, घृणा अपराधों और घृणापूर्ण भाषणों से जुड़े हों, और राजनैतिक आश्रयों से नफरत घोलते हों, उन पर भी जल्द वे सख्त कार्यवाही हो। जब तक जांच हो उन्हें पार्टी से निष्कासित किया जाये। घृणा अपराधों से सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासकीय तौर पर निपटने के लिए ठोस कदम उठाये जाएँ।
  5. देश के करोड़ों लोग न्याय व्यवस्था पर आस्था रखते हैं इसलिए न्याय की गरिमा को बनाये रखने वे लोकतंत्र को सशक्त करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएं जाएँ। मामलों की निष्पक्ष जांच हो।
  6. जो लोग सरकारी तंत्र का गलत प्रयोग कर रहे हैं और जिन्हे यह लग रहा है कि वो अपनी ताकत का गलत और घटिया प्रयोग कर बच जायेंगे उन पर शीघ्र वे सख्त कार्यवाही हो।
  7. जो लोग महिलाओं को सोशल मीडिया पर ट्रोल कर रहे हों उन पर कार्यवाही हो।
  8. वे वकील या पुलिस अफसर या अन्य कर्मचारी जो अपना काम न कर रहें हो या कानूनी प्रक्रिया में बाधा डाल रहें हो उन पर भी एक्शन लिया जाये। अराजकता का अंत करने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ।
  9. राज्य सरकारों को कानून व्यवस्था बनाये रखने का निर्देश दे।

10.. महिला सशक्तिकरण, महिला सम्मान वे गरिमा के लिए उपयुक्त कदम उठाये जाएँ। संस्थागत बदलाव लाने के लिए और पितृसत्तात्मक सामंती सोच बदलने के लिए उचित प्रयास हों।

11. महिला सुरक्षा या इज्जत के नाम पर महिलाओं पर ही प्रतिबंध लगाना या ऐसे तुगलकी फरमान जारी करने वाले लोगों पर तुरंत कार्यवाही हो तथा खाप पंचायतों या अन्य इस प्रकार की असंवैधानिक संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार रोक लगे। हमारी मांग है बेखौफ बेरोक-टोक आजादी की।

12. आपकी पार्टी ने महिलाओं के लिए ३३ % रिजर्वेशन के बिल को लाने का वादा 2014 में किया था। अब भारत के नागरिक आपको याद दिलाना चाहते हैं कि अपने समस्त वादों को पूरा करें।

13. जो महिलाएं सत्ता के पद संभाल रही है वो मौन न रहें और जाति, धर्म, पार्टी की विचारधारा इत्यादि से ऊपर महिला मुद्दों के लिए न केवल पार्टी में, परिवारों में, संस्थाओं में, संसद में और सडकों पर आवाज़ उठायें।

14. महिला मुद्दों को जाति, संप्रदाय, धर्म इत्यादि में न बाँट कर उतनी हो प्राथमिकता दी जानी चाहिए जितनी अन्य किसी भी राजनैतिक विषय को। आपने अपने कार्यकाल में बहुत सी विदेश यात्राएं की कि भारत की छवि सुधरे पर महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा के कारण इसका असर उल्टा हो रहा है और आप तो जानते हैं के कई विदेशी सैलानी, खासतौर पर विदेशी महिलाएं, अब यहाँ आना नहीं चाहती क्यूंकि भारत की छवि अपराध और बलात्कार वाले देश की बन गई है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भी अब यह कह रहे हैं के इस तरह के महिला हिंसा सम्बन्धी अपराधों पर जल्द रोक लगनी चाहिए। इसलिए आपसे यह यह अपेक्षा है कि आप इसके लिए उचित कदम उठाएंगे।

15. आपकी सरकार ने नोटबंदी, जी एस टी जैसे विषयों पर रातों रात काम कर के आर्थिक नीतियों में तुरंत बदलाव किया, स्वच्छ भारत अभियान के तहत टॉयलेट्स बनाने के लिए जनता को प्रेरित किया तो अब यह अपेक्षा की जाती है कि महिला सुरक्षा के विषय को भी प्राथमिकता देते हुए आप इस पर जल्द कार्य करें।

अभी तक जो भी सरकारें सत्ता में रही है उन्होंने जितना भी इस विषय पर किया है वो काफी नहीं है जिसका प्रमाण सामने है। शासन, जनता और खासतौर पर महिलाओं के प्रति, अपने सर्वप्रथम मूलभूत कर्तव्यों को निभाने में नाकामयाब रहा है। शासकीय व्यवस्था द्वारा भड़कायी गयी भयावह आबोहवा के खिलाफ तथा विभाजन और घृणा के उस एजेंडा के खिलाफ आवाज़ उठाना आज अनिवार्य हो गया है। अब हालत ऐसे हो गए हैं की चुप रहना मुश्किल है। राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे पर आरोप लगा कर इस महत्वपूर्ण मुद्दे को अब किनारे नहीं कर सकती और अब क्योंकि आपकी पार्टी सत्ता में है, आपने संविधान को स्थापित रखने की शपथ ली है, और आपके चुनावी घोषणा पत्र में आपने महिला अधिकार सम्बन्धी वादे किये थें इसलिए ये सवाल आपसे पूछा जा रहा है और आशा की जा रही है की आप अपने वादे पूरा करें। इस देश की आधी आबादी के अधिकारों की मांग नयी नहीं है पर अब समय आ गया है कि इस अन्याय पूर्ण ढांचे में बदलाव हो।

बहुत हुआ नारी पर वार, चाहे हो कोई भी सरकार,

न्याय की है यही पुकार, नहीं सहेंगे और अत्याचार।

ये लेख किसी भी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं लिखा गया परन्तु यह सिर्फ इस कारण लिखा गया है कि महिला सुरक्षा वे सशक्तिकरण के लिए उपयुक्त वातावरण बने, सत्ता में चाहें कोई भी पार्टी क्यों न हो महिला सुरक्षा और अधिकार के मुद्दे पर वो काम करें। भारतीय संविधान में निहित सामाजिक न्याय, पंथनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक और उदार उन मूल्यों को जो संविधान में विहित हैं, और गिराया न जाये यह अभिप्राय है। अपना रोष व्यक्त करने के लिए महिलाओं ने काफी प्रयास किये हैं ये उन्ही कदमो का एक हिस्सा है।

क्या हुआ तेरा वादा की मुहिम के तहत मैं आप सबसे जो इस लेख को पढ़ रहें हैं, अनुरोध करना चाहूंगी की अपने राज्य, ज़िले गांव या शहर जहाँ भी आप रहते हों और वहां किसी भी पार्टी या विचारधारा के लोग सत्ता में हों, अपने नेताओं से ये सवाल करें की उन्होंने महिला सुरक्षा और घृणा अपराधों के विरोध में क्या कदम उठायें हैं और कुछ नहीं किया तो क्यों नहीं किया, क्यूंकि लोकतंत्र में आपकी भूमिका सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं है, सक्रिय साझेदारी निभाएं। नेताओं की जवाबदेही तय करें। प्रजातंत्र में पूरी भागीदारी निभाएं। सूचना के अधिकार के आंदोलन का अगला कदम शायद यह है की जानकारी का प्रयोग कर शासन से सवाल पूछे और जो नीतिया बनायीं गयी है उसे सही ढंग से लागू करने का प्रयत्न करें। जिस लोकतंत्र में महिलाएं वे बच्चियां सुरक्षित नहीं, जो प्रजा तंत्र दलित वे अन्य अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने में नाकामयाब हो वो प्रजातंत्र नहीं है निरंकुश शासन है। ऐसे दमनकारी शासन के विरूद्ध आवाज़ उठाएं और उसे बदलें। मैं समझती हो की आप में से कुछ लोगों को शायद ये बातें अच्छी न लगें पर वास्तविकता तो यही है की महिलाओं और अब तो छोटी बच्चियों के विरुद्ध जघन्य हिंसा के अपराध बढ़ रहे हैं और कुछ कदम उठाना इसलिए अनिवार्य है की देश में बच्चियों को सुरक्षित माहौल दिया जा सके क्यूंकि `बचेगी बेटी तो पढ़ेगी बेटी और आगे बढ़ेगी बेटी’।

जय हिन्द!

लेखिका शालू निगम एक अधिवक्ता, एक्टिविस्ट और शोधकर्ता हैं और महिला अधिकार आंदोलन से वर्षों से जुड़ीं हैं।

 

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