भारतीय सभ्यता में पागलपन डर या भय नहीं, उम्मीद पैदा करता है

यूरोप में भी पुनर्जागरण काल के पहले पागलपन को बीमारी नहीं माना जाता था और इसलिये कोई पागलखाना नहीं था। भारत में तो अंग्रेजों के आने के पहले इस तरीके के पागलखानों के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती ...

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भारतीय सभ्यता में पागलपन डर या भय नहीं, उम्मीद पैदा करता है

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अतहर हुसैन

15वी सदी में जर्मन कवि ब्रायंट की एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें पागलों को एक काल्पनिक जहाज़ में भरकर सामान्य लोगों से दूर भेजा जा रहा है। दूसरी ओर यह भी अहसास है कि ये अलग किस्म के लोग किसी असाधारण चीज की खोज में निकले हैं। वे किसी ऐसी सच्चाई की तलाश में हैं जिसे पाना और लोगों के बूते के बाहर है।

आगे के समय में (विशेषकर पुनर्जागरण काल में), तर्क और बुद्धि को अंतिम सत्य मानने वाली, आधुनिकता का आतंक इस कदर फैला कि अहसास-अतार्किकता को पागलपन मान लिया। यूरोपीय सभ्यता में ऐसों को समाज से दूर एक अलग बीमार श्रेणी में रखा गया। भारतीय सभ्यता में पागलपन विशेष किस्म के बोध से जुड़ा हुआ है और नवीनता लाने में बड़ी भूमिका अदा करता है। यह डर या भय नहीं, उम्मीद पैदा करता है।

जब यूरोप में कोई पागलखाना नहीं था

वैसे तो यूरोप में भी पुनर्जागरण काल के पहले पागलपन को बीमारी नहीं माना जाता था और इसलिये कोई पागलखाना नहीं था। भारत में तो अंग्रेजों के आने के पहले इस तरीके के पागलखानों के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। पुनर्जागरण काल में आधुनिकता ने अपनी सार्वभौमिक मूल्य को ख़ारिज करने वालों को पागल घोषित करके पागलखानों में ठूंसना शुरू किया। मध्य युग के बाद यूरोप में कुष्ठ रोग ख़त्म हो चुका था। शहरों के बाहर, आबादी के बाहर, उजाड़-बंजर जगहों पर कोढ़ियों को रखने के रखने का जो शिविर गृह बनाया गया था, वे वीरान पड़े थे। 17वीं सदी के बाद इनको पागलखानों में तब्दील कर दिया गया। इनको फिर से आबाद करने वालो को नैतिक कोढ़ी माना गया।

भारत का पहला पागलखाना

इसी सोच-समझ के साथ अंग्रेजों ने, हिंदुस्तान को गुलाम बनाये रखने के लिये पुलिस, अदालत, जेल की तरह पागलखाना को अनिवार्य अंग माना। जहाँ-जहाँ अंग्रेजों ने कदम डाला वहाँ पागलखाना बनाते गए। सबसे पहले बंगाल को गुलाम बनाया और पहला पागलखाना भी कलकत्ता में। यही क्रम इनके शासन के फैलाव और पागलखानों की स्थापना में आगे बढ़ता चला।

और बग़ावत पागलपन हो गया

गोरों को डर था कि उनके हुकूमत के खिलाफ़ बगावत का सबसे अधिक खतरा सिपाहियों से है। इसलिये शुरुआती समय में पागलखाने केवल सिपाहियों के लिये ही था। बग़ावत, पागलपन हो गया। 1857 में उनका डर सही साबित हुआ। इसके बाद पागल और पगलखानों ओर व्यवस्थित करने की जरुरत को पूरा करने की खातिर लूनेंसी एक्ट,1858 लाया गया। जैसे-जैसे अंग्रेजों के खिलाफ आम जन की भागेदारी बढ़ने लगी, पागलखाना सबके लिए खोल दिया गया। इन बागी पागलों को अपराधी के तौर पर लिया जाता रहा। इसीलिए लंबे समय तक पगलखानों को इंसपेक्टर जनरल, जेल के अधीन रखा गया। इन जगहों में किस प्रकार का अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा इसकी तस्दीक बोहर समिति(1946) करती है।

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आधुनिकता और उसके उपचार के तरीकों ने अपने मूल्यों को स्वीकार कराने के लिए पहले शारीरिक यातना को हथियार बनाया। इसमें इतनी यातना दी जाती है कि पागलों के होश ठिकाने आ जायें, लेकिन यह तरीका लंबे समय तक कायम रखना संभव नहीं था। धीरे-धीरे आधुनिक उपचार ने कैदखाना शारीर के बाहर नहीं, शारीर के भीतर ही तैयार किया जाने लगा। पागलपन का इलाज शारीर से निकाल कर दिमाग की ओर बढ़ गया। देह के बजाय दिमाग पर कब्ज़ा अधिक सूक्ष्म और कारगर तरीका बन गया।

आधुनिक मनोचिकित्सक मरीजों के भीतर ही पतन के बोध को रचता और उसे उसकी ही नजरों में गिरा देता है। ये तरीके अपने नैतिकता, कायदे-कानून गढ़ता है। इसके खिलाफ मरीज (बागी) को कहीं अपील करने की गुंजाइश नहीं होती है। यह आधुनिक उपचार की तानाशाही और अमानवीयता को साफ कर देता है।

आजादी के बाद भी अंग्रेजियत मानस वाले ही नए शासक बने। इसलिए संविधान में पागल को वोट देने या चुनाव लड़ने पर पाबन्दी लगा दी। बिना इस बात को तय किये कि पागल कौन? पागल घोषित करने तरीका और मानक क्या होगा? यह फैसला आधुनिक डॉक्टर और अदालत मिलकर कर सकते हैं। जबकि आधुनिक मेडिकल विज्ञानं भी दिमाग के मसले पर बहुत कम जानकारी होने की बात करता है तो अदालतें अभी भी अपराधी और पागल के अंतर को स्पष्ट नहीं कर पायी हैं।

ऐसे में इस लूट व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वालो को पागल करार देने के लिए शहरों से गाँव की गलियों तक केंद्र फ़ैल चुके हैं। ऐसा अभी प्रायः सामाजिक स्तर पर किया जाता है जरूरत होने पर कानूनी स्तर पर भी।

अगर भारत को अपना पागलपन बनाये रखना है तो इस आधुनिकता और उसके उपचार में मौज़ूद नैतिक पाखंड को तोड़ना होगा

(लेखक अतहर हुसैन कॉर्ड (CORD) के डायरेक्टर हैं।)

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