​​​​​​​खेतों में जहर : आंकड़ों में सिमटकर रह जाएं यवतमाल की मौतें

पिछले 16 साल में महाराष्ट्र के विदर्भ में तकरीबन 14,000 किसानों ने आत्महत्या की है. कीटनाशक के इस्तेमाल से कई मजदूरों और किसानों की मौत हुई है. अगस्त से अब तक इस वजह से 19 लोगों की जान गई है. ...

हाइलाइट्स

कीटनाशक बेचने वालों को जहरीले कीटनाशक बेचने से भी परहेज नहीं है.  कीटनाशकों में कई तरह के केमिकल मिला देने से ये और जहरीली हो गईं. पैसे बचाने के चक्कर में किसान दिहाड़ी मजदूरों को इस काम में लगा देते हैं. जो बगैर किसी सुरक्षा उपाय के छिड़काव करते हैं.

खेतों में जहर : किसानों और मजदूरों की मौत की वजह बन रहे हैं जहरीले कीटनाशक

पिछले 16 साल में महाराष्ट्र के विदर्भ में तकरीबन 14,000 किसानों ने आत्महत्या की है. यह दिखाता है कि विकास के मामले में यह क्षेत्र कितना पिछड़ा हुआ है. इस साल जुलाई से यहां दूसरी तरह की समस्या पैदा हो गई है. कीटनाशक के इस्तेमाल से कई मजदूरों और किसानों की मौत हुई है. अगस्त से अब तक इस वजह से 19 लोगों की जान गई है.

अब इस समस्या की ओर मीडिया और सरकार की नजर गई है. हालांकि, यह समस्या पिछले कई सालों से थी लेकिन इससे बचाव का कोई उपाय नहीं किया गया. कुल मिलाकर कीटनाशकों की वजह से यवतमाल में 30 लोगों की मौत हुई है. ये मौतें कीटनाशकों के नियमन की जरूरत को रेखांकित कर रही हैं.

2002 से इस क्षेत्र में बीटी कपास उपजाने को मंजूरी मिली. तब से सिंचाई की समस्या झेल रहे इस क्षेत्र में इसका बोलबाला है. पिछले साल कपास की अच्छी कीमत मिलने से इस साल किसानों ने 16 से 17 लाख हेक्टेयर में यह फसल लगाई. पिछले कई सालों से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कीटों का प्रभाव अधिक दिख रहा है. पिंक बोलवॉर्म की वजह से पिछले दो साल में कपास कपास की फसल पर नकरात्मक असर पड़ा है. कपास की किस्म बॉलगार्ड-1 पहले से ही इसकी चपेट में थी लेकिन अब बोलगार्ड-2 भी इसकी चपेट में आ गया है. इस वजह से महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कपास की फसल को नुकसान हो रहा है.

अनाधिकारिक तौर पर यह बातें कही जा रही हैं कि बीटी कपास अब अपने फायदों को खो चुकी है लेकिन सरकार ने इसकी जगइ नई किस्म लाने को लेकर कुछ नहीं किया है. इसके उलट किसानों को ही कीटों का ठीक प्रबंधन नहीं करने का कसूरवार ठहराया जा रहा है.

केंद्रीय कपास शोध संस्थान ने जुलाई में कीटों के बढ़े प्रभाव की वजह की व्याख्या की है. दिसंबर में खेतों से हट जाने वाली कपास की फसल कई सालों से मार्च तक खेतों में रह रही है. इससे पिंक बोलवार्म का चक्र बाधित नहीं हो रहा है. इस वजह से अगली बार जब फसल लगने पर इसका आक्रमण बढ़ जा रहा है. इसके अलावा मौसम भी इसके अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहा है. पिछले साल से कीटनाशक प्रतिरोधक कपास की एक नई किस्म अवैध तरीके से प्रचलित है. ये जिन पैकेट में बेचे जा रहे हैं, उन पर कोई जानकारी नहीं दर्ज रहती. गुजरात में भी 2001 में अवैध बीटी कपास बीज नवभारत द्वारा बेचा रहा था. आंध्र प्रदेश में हुए एक सर्वेक्षण में यह बात आई है कि कपास के कुल रकबे के 15 फीसदी पर अवैध बीटी कपास उगाया जा रहा है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि 2006 से लगातार कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा है. 2013 तक हाइब्रिड कपास की हिस्सेदारी 95 फीसदी पहुंच गई थी. इसमें भी कई किस्में हैं. इस वजह से भी कीटों के हमले बढ़े हैं. इस साल विदर्भ में तीन कीटों के हमले बढ़े. इस वजह से कीटनाशकों में कई तरह के केमिकल मिलाकर छिड़काव करना पड़ा. इससे उन लोगों के लिए जोखिम बढ़ा जो छिड़काव करते हैं.

कीटनाशक बेचने वालों को जहरीले कीटनाशक बेचने से भी परहेज नहीं है.  कीटनाशकों में कई तरह के केमिकल मिला देने से ये और जहरीली हो गईं. पैसे बचाने के चक्कर में किसान दिहाड़ी मजदूरों को इस काम में लगा देते हैं. जो बगैर किसी सुरक्षा उपाय के छिड़काव करते हैं.

यह दुखद होगा कि यवतमाल की मौतें आंकड़ों में सिमटकर रह जाएं. मजूदरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ कीटनाशकों का नियमन और अच्छी गुणवत्ता वाली बीजों और मजदूरों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है. सरकार को इस समस्या के समाधान करने की दिशा में काम करना चाहिए.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय

(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः41, 14 अक्टूबर, 2017)

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