योगी आदित्यनाथ के राज का एक साल : क्या उल्टी गिनती शुरू हो गयी मोदी राज की ?

मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के जश्न की जान पहले ही निकल गयी लगती है

राजेंद्र शर्मा
Updated on : 2018-03-26 15:59:41

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योगी आदित्यनाथ के राज का एक साल पूरा होने के जश्न पर, उत्तर प्रदेश की जनता ने ठंडा पानी ही डाल दिया। गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभाई चुनावों के धक्के की टाइमिंग इससे मारक नहीं हो सकती थी। लेकिन, योगी राज के दुर्भाग्य से और वास्तव में मोदी राज के भी दुर्भाग्य से, उनकी मुश्किलों का सिलसिला उक्त धक्के के साथ थम नहीं गया है। उल्टे इस हार का दर्द कम करने की भाजपा की अति-चतुर कोशिशें भी वास्तव में उसके लिए उल्टी ही पड़ती नजर आ रही हैं। उत्तर प्रदेश से दस राज्यसभा सीटों के लिए हाल ही में हुआ चुनाव, इसकी मिसाल है। बेशक, प्रकटत: इस चुनाव में भाजपा को कोई नुकसान नहीं हुआ है बल्कि वह अपने पैंतरों में कामयाब ही रही है। राज्यसभा की दस में से आठ सीटों पर अपनी विधानसभाई संख्या के बल पर भाजपा की और एक सीट पर सपा की जीत पक्की थी। भाजपा सिर्फ उक्त आठ सीटें ही जीतने में कामयाब नहीं हुई है बल्कि दसवीं सीट के लिए कड़े मुकाबले में भी उसने सपा तथा कांग्रेस द्वारा समर्थित बसपा उम्मीदवार को दूसरी वरीयता के वोट के आधार पर हरा दिया है। इस तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की एक सीट अतिरिक्त जीत ली है।

इसके बावजूद, इस चुनाव के बाद के घटनाक्रम ने राज्य सभा की एक सीट अतिरिक्त जीतने की भाजपा की खुशी पर जैसे पानी ही फेर दिया है। हालांकि, भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राज्यसभा चुनाव की अपनी इस कामयाबी को, गोरखपुर तथा फूलपुर उपचुनाव की हार का ‘‘बदला’’ कहकर चलाने की कोशिश की है, यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के दावों को प्रदेश की जनता रत्तीभर गंभीरता से नहीं लेती है। हां! सभी राजनीतिक प्रेक्षकों की निगाहें इस पर जरूर लगी हुई थीं कि सपा तथा कांग्रेस के समर्थन के बावजूद, राज्यसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार की हार के बाद, मायावती की क्या प्रतिक्रिया रहती है और इस तरह आने वाले दिनों के लिए वह क्या राजनीतिक संकेत देती हैं? वास्तव में अधिकांश राजनीतिक प्रेक्षकों से यह सच भी छुपा नहीं रहा था कि राज्यसभा की दसवीं सीट के मुकाबले में भाजपा ने केंद्र तथा राज्य, दोनों स्तरों पर सत्ता के जरिए उपलब्ध साम, दाम, दंड, भेद के सारे हथियार आजमाने में अपनी पूरी ताकत इसीलिए झौंकी थी कि वह इस नतीजे से, लोकसभाई उपचुनाव में सामने आयी सपा-बसपा दोस्ती में दरार डालना चाहती थी।

वास्तव में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने, राज्यसभा की दसवीं सीट का नतीजा आने के फौरन बाद, भाजपा की जीत की शेखी ही नहीं मारी थी बल्कि बसपा को यह समझाने की भी कोशिश की थी कि उसके उम्मीदवार की हार, समाजवादी पार्टी के पूरी मदद न करने की वजह से ही हुई थी और समाजवादी पार्टी सिर्फ लेना जानती है, देना नहीं जानती है। इस तरह मुख्यमंत्री खुद इस चुनाव नतीजे का सहारा लेकर, सपा-बसपा एकता में यह कहकर खलल डालने की कोशिश करने के लिए उतावले नजर आए कि इन पार्टियों का साथ चल ही नहीं सकता है। बेशक, योगी आदित्यनाथ की यह उतावली अकारण ही नहीं थी। गोरखपुर तथा फूलपुर लोकसभाई उपचुनाव में भाजपा की हार, प्रतिष्ठा की ऐसी दो सीटों पर भाजपा की हार ही नहीं थी, जिन पर 2014 के आम चुनाव में भाजपा को 52 फीसद से ऊपर वोट मिले थे। इस हार में, उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख विपक्षी पार्टियों--सपा-बसपा--की एकता के जरिए, 2019 के लोकसभाई चुनाव समेत आने वाले चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा के अर्श से फर्श पर आ जाने के इशारे भी छुपे हुए थे। अचरज की बात नहीं है कि भाजपा की इस हार के साथ ही व्यापक रूप से मीडिया ने इसका गणित लगाना शुरू कर दिया था कि सपा-बपसा के साथ आने से, लोकसभाई चुनाव में भाजपा के लिए कैसी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं? पिछले लोकसभाई चुनाव और विधानसभाई चुनाव में इन पार्टियों को पड़े वोट के योगफल के आधार पर ही, भाजपा की सीटों का आंकड़ा वर्तमान 71 से सिखककर, एक दर्जन से दो दर्जन के बीच रह जाने का अनुमान लगाया जा रहा था। इस उलटफेर को ही 2019 के चुनाव में दोबारा जीत के मोदी की भाजपा के सपनों पर पानी फेरने के लिए काफी बताया जा रहा था। जाहिर है कि भाजपा, सपा-बसपा के साथ आने को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की दसवीं सीट के लिए भाजपा का उम्मीदवार खड़ा किया जाना तथा उसके लिए सारी ताकत का झौंका जाना, इस खतरे को टालने की हड़बड़ाहट भरी कोशिश का ही हिस्सा था।

बहरहाल, राज्यसभा चुनाव के नतीजे पर बसपा सुप्रीमो मायावती की प्रतिक्रिया ने, योगी-शाह-मोदी के इस खेल पर पानी फेर दिया। मायावती ने न सिर्फ भाजपा पर शासन की ताकत तथा धनबल का तरह-तरह से दुरुपयोग कर, दलित उम्मीदवार को हराने का आरोप लगाया बल्कि साफ-साफ शब्दों में इसका भी एलान कर दिया कि इस चुनाव नतीजे का, सपा-बसपा की नजदीकी पर रत्तीभर असर नहीं पड़ेगा। इतना ही नहीं, सपा-बसपा के साथ के चल न सकने के भाजपा के तर्कों का खुद ही जवाब देते हुए, मायावती ने न सिर्फ यह दावा किया कि अनुभव की कमी की वजह से अखिलेश पैंतरेबाजी में चाहे कच्चे हों, उन्होंने बसपा उम्मीदवार के लिए पूरा जोर लगाया था, इसके साथ ही उन्होंने चर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड’ की यादों को सपा से नजदीकी के आड़े न देने का संकेत देते हुए, अखिलेश यादव को यह कहते हुए उक्त कांड से अलग कर दिया कि वह तब तक राजनीति में आए भी नहीं थे। इस तरह, सपा-बसपा दोस्ती तुड़वाने की अपनी हड़बड़ी में भाजपा ने, इस दोस्ती को और पुख्ता ही कर दिया लगता है।

इसके साथ ही मोदी राज की उल्टी गिनती शुरू हो जाने की अटकलें तेज हो गयी हैं। याद रहे कि उत्तर प्रदेश के चर्चित राज्यसभा चुनाव में सपा-बसपा की दोस्ती के साथ कांग्र्रेस भी जुड़ गयी है। इतना ही नहीं, अजीतसिंह के लोकदल ने इस चुनाव में बसपा को वोट देने के अपने निर्देश का उल्लंघन करने के लिए, अपने इकलौते विधायक को निलंबित कर, इस कतारबंदी का हिस्सा बनने का संकेत दे दिया है। याद रहे कि वामपंथी पार्टियों समेत दूसरी छोटी-छोटी पार्टियों ने भी गोरखपुर तथा फूलपुर के चुनाव में सपा का समर्थन किया था। सुहेलदेव समाज पार्टी तथा अपना दल की भाजपा से बढ़ती नराजगी भी किसी से छुपी हुई नहीं है। यह कम से कम उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ समूचे विपक्ष की एकता की ओर इशारा करता है, जो सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के पैमाने पर भी चुनाव में भाजपा की बाजी पलटता नजर आती है। फिर भी, यह प्रक्रिया सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है।

हाल में बिहार में हुए अररिया संसदीय तथा जहानाबाद विधानसभाई सीट के नतीजे इसका इशारा करते हैं कि नीतीशकुमार के पल्टी मारकर भाजपा की गोदी में जा बैठने के बावजूद, बिहार के पिछले विधानसभाई चुनाव की भाजपाविरोधी हवा बनी हुई है। इससे पहले, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश के उपचुनावों तथा गुजरात के विधानसभाई चुनावों के नतीजे भी साफ तौर पर भाजपा का ग्राफ नीचे आने के इशारे कर चुके हैं। इसके ऊपर से शिव सेना के बाद, तेलुगू देशम् पार्टी तथा बिहार में जित्तन राम मांझी की पार्टी व प0 बंगाल के पर्वतीय इलाके में गोरखा जन मुक्ति परिषद के भाजपा से नाता तोडऩे के साथ, एनडीए के बिखरने की शुरूआत भी हो गयी है। इसके अलावा राफाल लड़ाकू विमान सौदे पर संदेहों से लेकर नीरव मोदी के फुर्र होने तथा यहां तक कि इराक में 39 भारतीयों की आइएस द्वारा हत्या का सच अंतत: सरकारी तौर पर स्वीकार किए जाने तक, हर चीज मोदी राज के खिलाफ पड़ती नजर आती है। अचरज नहीं कि इन हालात में भाजपा के प्रवक्तागण सिर्फ इसके नकारात्मक प्रचार से ही काम चलाने को मजबूर हैं कि विपक्ष इकट्ठा नहीं हो सकता है, कि उसमें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर सहमति बन ही नहीं सकती है, कि विपक्षी मोर्चों के अलग-अलग प्रयास चल रहे हैं, आदि आदि। मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के जश्न की जान पहले ही निकल गयी लगती है।

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