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The Supreme Court of India. (File Photo: IANS)

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि प्रकरण : फैसले की घड़ी आ पहुंची है, उम्मीद है उन्या. का निर्णय, संविधान और कानून के राज को मजबूत करेगा

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि प्रकरण : फैसले की घड़ी आ पहुंची है, उम्मीद है उन्या. का निर्णय, संविधान और कानून के राज को मजबूत करेगा

अठारह नवम्बर को भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति (Chief Justice of India Ranjan Gogoi‘s retirement) के पूर्व बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले की घोषणा (Supreme Court verdict announced in Babri Masjid-Ramjanmabhoomi case) अपेक्षित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकों से शांति बनाये रखने की अपील की है।

यह स्वागतयोग्य है कि हिन्दू श्रेष्ठतावादी संगठन आरएसएस ने भी ‘खुले दिल’ से फैसले को स्वीकार कर देश में शांति बनाये रखने की ज़रूरत पर जोर दिया है।

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम पक्षकार तो बहुत पहले से कहते आये हैं कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, वे वह कर चुके हैं और अब वे न्यायालय का निर्णय स्वीकार करेंगें। उनका कहना है कि वे क़यामत के दिन शुद्ध अंतःकरण से खुदा का सामना कर सकते हैं। अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी शांति और व्यवस्था बनाये रखने की अपील करते हुए कहा है कि मुसलमानों को अदालत का फैसला स्वीकार करना चाहिए – चाहे वह उनके पक्ष में हो या उनके खिलाफ। हमें आशा है कि फैसले की घोषणा के बाद देश में किसी तरह की अशांति और अव्यवस्था नहीं फैलेगी।

इस लेख में हम बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मुक़दमे के इतिहास (History of Babri Masjid-Ram Janmabhoomi case) पर नज़र डालने का प्रयास कर रहे हैं।

यह कहानी, निर्मोही अखाड़ा द्वारा बाबरी मस्जिद परिसर के बाहरी प्रांगण में स्थित राम चबूतरे पर स्थायी ढांचा बनाने की मांग से शुरू होकर, 2.77 एकड़ की उस पूरी भूमि, जिस पर बाबरी मस्जिद थी, पर दावा जताने की कहानी है। इस कहानी में शामिल है रामजन्मभूमि न्यास द्वारा 1989 में दायर मुक़दमा और भारत की प्रजातान्त्रिक संस्थाओं द्वारा बहुसंख्यकवादी राजनीति के दबाव में संविधान और कानून के राज का मखौल बनने को चुपचाप देखते रहना।

कार्यपालिका और न्यायपालिका बाबरी मस्जिद को बचाने की ज़िम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बहुसंख्यक समुदाय की आस्था और बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने को कानूनी वैधता प्रदान कर दी। न्यायालय ने अपने निर्णय में विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित कर, उसका दो-तिहाई हिस्सा हिन्दू पक्ष को सौंप दिया।

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की शुरुआत Babri Masjid-Ram Janmabhoomi dispute started

सन 1855 में अयोध्या में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। कट्टरवादी सुन्नी मौलवी शाह गुलाम हुसैन ने अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्ज़ा करने के लिए अपने लगभग 500 अनुयायियों को लामबंद किया। उनका दावा था कि इस मंदिर का निर्माण मस्जिद को गिरा कर किया गया है। उनके हमले को 8,000 बैरागियों ने नाकाम कर दिया। गुलाम हुसैन के पराजित अनुयायियों ने मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित बाबरी मस्जिद में शरण ली। इन दंगों में जो मुसलमान मारे गए, उनमें से कई की कब्रें मस्जिद के नीचे हैं। अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने भी हनुमानगढ़ी मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। बैरागियों ने बाबरी मस्जिद पर किसी तरह का कोई दावा नहीं किया।

यह स्पष्ट नहीं है कि बाबरी मस्जिद परिसर में राम चबूतरे का निर्माण कब हुआ। It is not clear when the Ram Chabutra was constructed in the Babri Masjid complex.

अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्षकारों का दावा है कि इसे 1855 के बाद चोरी-छुपे बनाया गया। हिन्दू पक्षकार कहते हैं कि 17 गुणित 21 फीट का यह चबूतरा हमेशा से वहां था और उस पर राम की मूर्तियाँ स्थापित थीं, जिनकी हिन्दू आराधना करते आ रहे थे। सन 1855 के दंगों के बाद, मस्जिद के बाहर और अन्दर के आंगनों के बीच लोहे की ग्रिल लगा दी गयी। चबूतरा, बाहरी आंगन में था। सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम, जिसमें हिन्दुओं और मुसलमानों ने कंधे से कन्धा मिलाकर कम्पनी सरकार से लोहा लिया था, के कुचले जाने के बाद मई 1857 में अंग्रेजों ने अवध पर कब्ज़ा कर लिया।

राम को अपना आराध्य मानने वाले निर्मोही अखाड़े ने 1734 और 1800 के बीच किसी समय अयोध्या में डेरा जमाया था। अखाड़े ने महंत रघुबर दास के ज़रिये 29 जनवरी 1885 को फैजाबाद के सब-जज की अदालत में प्रकरण दायर कर चबूतरे पर मंदिर का निर्माण करने की अनुमति मांगी। उसका दावा था कि चबूतरा, भगवान राम का जन्मस्थान है और वहां स्थित ‘चरण पुण्य’ की पूजा की जाती है। निर्मोही अखाड़े का कहना था कि श्रद्धालुओं को मौसम की मार से बचाने के लिए चबूतरे पर छत का निर्माण ज़रूरी है। यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि उस समय अखाड़े ने न तो यह दावा किया था कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को ढहा कर बनाई गए है, न यह कहा था कि राम का जन्मस्थान मस्जिद के नीचे है, न ही यह कि हिन्दू मस्जिद की पूरी भूमि को राम जन्मस्थान मानते हैं और ना ही उसकी यह मांग थी कि मस्जिद की पूरी भूमि पर हिन्दुओं को कब्ज़ा मिलना चाहिए। सब-जज पंडित राम किशन ने 24 दिसंबर 1885 को मुकदमे को इस आधार पर ख़ारिज कर दिया कि उस स्थल पर मंदिर के निर्माण से भविष्य में अयोध्या में कौमी दंगे भड़कने का अंदेशा है।

इस निर्णय के खिलाफ फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत में अपील दाखिल की गयी। डिस्ट्रिक्ट जज कर्नल एफईए चेमियर ने 18 मार्च 1886 को अपने निर्णय में अपील को ख़ारिज कर दिया। इसके साथ ही, डिस्ट्रिक्ट जज ने सब-जज के निर्णय के उस हिस्से को भी निरस्त कर दिया जिसमें कहा गया था कि राम चबूतरे की भूमि का मालिक हिन्दू पक्ष है क्योंकि चबूतरे पर उसका कब्ज़ा है। डिस्ट्रिक्ट जज के निर्णय को अवध के कार्यकारी जुडिशल कमिश्नर डब्ल्यू यंग की अदालत में चुनौती दी गयी। यंग ने भी 1 नवम्बर 1886 को अपील ख़ारिज कर दी। अपने निर्णय में यंग ने कहा: “हिन्दुओं की मस्जिद से जुड़े अहाते के कुछ स्थलों तक बहुत सीमित पहुँच है। वे कई सालों अपनी पहुँच बढ़ाने और मस्जिद के प्रांगण में दो स्थानों पर भवन बनाने का प्रयास कर रहे हैं- 1) सीता की रसोई और 2) राम चन्द्र की जन्म भूमि…। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह ज़ाहिर होता हो कि अपीलार्थी किसी भी अर्थ में सम्बंधित भूमि का मालिक है”।

यंग ने कुछ कहा था, वह आगे चल कर एकदम सही सिद्ध हुआ। जो कहानी राम चबूतरे को जन्मस्थान बताकर उस पर दावे से शुरू हुई थी, वह 1989 में मस्जिद की पूरी भूमि पर दावे में बदल गयी। रामजन्मभूमि न्यास ने 1989 में बाबरी मस्जिद की संपूर्ण 2.27 एकड़ भूमि, जिसमें उसका अन्दर और बाहर का प्रांगण शामिल है, को हिन्दुओं के लिए पवित्र स्थान बताया। न्यास ने कहा कि चाहे इस भूमि पर बीच के काल में किसी का भी कितनी ही अवधि तक कब्ज़ा क्यों न रहा हो, वह भूमि राम की है। उन्होंने मुस्लिम पक्षकारों की शब्दावली उधार लेते हुए कहा कि “जो स्थान एक बार जन्मभूमि घोषित हो गया, वह हमेशा जन्मभूमि रहेगा’। मुस्लिम पक्षकारों का तर्क था कि कोई भी मस्जिद अल्लाह की और केवल अल्लाह की होती है और उसके मालिकाना हक में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हो सकता। रामजन्मभूमि न्यास ने भी यही तर्क दिया और इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इस दावे को हिन्दुओं की – सभी हिन्दुओं की – आस्था मान लिया।

स्वतंत्रता के बाद बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद Babri Masjid-Ram Janmabhoomi dispute after independence

सन 1886 से लेकर स्वतंत्रता तक, सन 1934 में अयोध्या में एक सांप्रदायिक दंगे को छोड़कर, बाबरी मस्जिद मामले से जुड़ी कोई घटना नहीं हुई।

सन 1949 में 22 और 23 दिसंबर की दरमियानी रात, मस्जिद के ताले तोड़कर भगवान राम की मूर्तियों को राम चबूतरे से हटा कर मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे रख दिया गया। उस समय वहां 15 पुलिस कर्मी तैनात थे परन्तु उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद केंद्र सरकार ने कई बार उत्तरप्रदेश सरकार से मूर्तियों को मस्जिद के अन्दर से हटाने के लिए कहा परन्तु राज्य सरकार ने इस आधार पर ऐसा करने से इंकार कर दिया कि उससे कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। मस्जिद में मूर्तियों की स्थापना अचानक नहीं की गई थी। इसकी योजना पहले से तैयार थी।

फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट ने 5 जनवरी 1949 को विवादित ढांचे पर ताला डलवा दिया और वहां नमाज़ पढ़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। सिविल जज की मूर्तियाँ हटाने और वहां होने वाली पूजा इत्यादि में हस्तक्षेप करने पर अस्थायी निषेधाज्ञा को लागू रखा गया। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने 1955 में जिला मजिस्ट्रेट के 19 जनवरी 1950 के आदेश को वैध ठहराया।

निर्मोही अखाड़े ने गोपाल विशारद के ज़रिये 1959 में बाबरी मस्जिद के अन्दर के प्रांगण पर अपने मालिकाना हक का दावा प्रस्तुत किया। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में प्रकरण दायर कर, मस्जिद के बाहर और अन्दर के प्रांगण पर अपना मालिकाना हक जताया।

सन 1986 में 1 फरवरी को अपरान्ह 4.40 बजे फैजाबाद के जिला न्यायालय ने उमेश चन्द्र पाण्डेय नामक व्यक्ति की अपील पर आदेश जारी किया कि रामजन्मभूमि मंदिर पर लगे ताले तोड़ कर वहां बिना किसी रोक-टोक की पूजा की अनुमति दी जाए। आनन-फानन में उसी दिन शाम 5.19 बजे ताले तोड़ दिए गए और पूजा की अनुमति दे दी गयी। यह अपील 31 जनवरी को दायर की गयी थी और अगले ही दिन, बिना अन्य पक्षों को नोटिस दिए, उस पर निर्णय सुना दिया गया। अपीलार्थी पाण्डेय अयोध्या मामले में पक्षकार नहीं था। उसने यह अपील, हरिशंकर दुबे की मुंसिफ अदालत के निर्णय के खिलाफ दायर की थी। मुंसिफ अदालत ने ताले खोलने की मांग करने वाली पाण्डेय की याचिका को 25 जनवरी को इस आधार पर ख़ारिज कर दिया था कि प्रकरण इलाहबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

सन 1989 में रामजन्मभूमि न्यास ने रामलला विराजमान की ओर से एक और प्रकरण दायर किया जिसमें कहा गया था कि मस्जिद की भूमि रामलला की है और उन्हें उसके मालिकाना हक से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यास ने यह प्रकरण रामलला के ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ (वह व्यक्ति जो किसी अन्य की ओर से उसका संरक्षक न होते हुए भी कानूनी कार्यवाही कर सकता है) की हैसियत से प्रस्तुत की। फिर, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी। यह चुपचाप और रात के अँधेरे में नहीं बल्कि दिन-दहाड़े किया गया। इसकी योजना पहले से तैयार थी और इसके लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकठ्ठा किया गया था।  देश की सर्वोच्च अदालत और केंद्र सरकार – दोनों इसे रोक न सकीं। यह साफ़ है कि अगर वे चाहतीं और पर्याप्त इच्छाशक्ति दिखातीं तो इस घटना को रोका जा सकता था।

बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने की घटना की जांच के लिए नियुक्त लिब्रहान आयोग इस निष्कर्ष पर पंहुचा कि यह काम सुनियोजित ढंग से किया गया था। “संघ परिवार के उद्देश्य के पूर्ति के लिए कल्याण सिंह (उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री) एक आवश्यक घटक थे और वे परिवार की अपेक्षाओं पर खरे उतरे।”

मस्जिद को ज़मींदोज़ किये जाने की घटना के बारे में आयोग ने कहा, “इसकी तैयारी अभूतपूर्व गोपनीयता से की गयी, योजना में तकनीकी दृष्टि से कोई खामी नहीं थी और उसके परिणामों के बारे में कोई संदेह नहीं था। ”

मस्जिद के ढहाए जाने पर जिन लोगों ने खुशियाँ मनाईं उनमें भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और एल. के. आडवाणी शामिल थे। छह दिसंबर 1992 को केवल बाबरी मस्जिद ही ज़मींदोज़ नहीं हुई, उस दिन भारत का संविधान और न्यायपालिका और कार्यपालिका सहित वे सभी संस्थाएं भी जमींदोज हुईं जिन पर भारत के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व है। जिस समय मस्जिद को ढहाने की तैयारियां चल रहीं थीं, उस समय ये सभी संस्थाएं निर्णय लेने से घबरा रहीं थीं और मस्जिद की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल रहीं थीं।

अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील पर जल्दी से जल्दी निर्णय लेने के लिए उच्चतम न्यायालय पर ज़बरदस्त दबाव डाला गया। वरिष्ठ आरएसएस नेता इन्द्रेश कुमार ने 28 नवम्बर 2018 को कहा कि दो-तीन जजों के कारण देश अपनी आस्था को दरकिनार नहीं कर सकता। भाजपा महासचिव राम माधव ने चेतावनी दी कि अगर अपील पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो अन्य विकल्पों पर विचार किया जायेगा।

पक्षकारों के तर्क

उच्चतम न्यायालय के समक्ष पहले हिन्दू पक्षकारों ने अपने तर्क रखे। निर्मोही अखाड़े ने संपूर्ण विवादित भूमि पर अपना दावा जताते हुए कहा कि एक विशिष्ट धार्मिक पंथ होने के नाते उसे उस स्थान पर आराधना करने का अधिकार मिलना चाहिए। उसका कहना था कि निर्मोही राम को अपना आराध्य मानते हैं और उन्हें 1950 में आराधना करने के उनके अधिकार से तब वंचित कर दिया गया था जब फैजाबाद के डीएम ने उस स्थान को अपने कब्ज़े में ले लिया था। रामलला विराजमान का तर्क था कि उन्हें भारतीय विधिशास्त्र के अंतर्गत विधिक व्यक्ति का दर्जा प्राप्त है और वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत में प्रकरण दायर कर सकते हैं। यह तर्क भी दिया गया कि ‘समस्त’ हिन्दू समुदाय अनंत काल से अयोध्या के उस स्थल को राम का जन्मस्थान मानता आया है और वहां लगातार रामलला की आराधना होती रही है। मुसलमानों ने 1934 से या कम से कम 23 दिसंबर 1949 से उस स्थान पर आराधना बंद कर दी है। विवादित स्थान मंदिर था या मस्जिद, इसका फैसला इसी आधार पर किया जा सकता है कि वहां कौनसा समुदाय आराधना करता था या करता है।

अब हम इस मामले में 1885 और 1886 में सुनाये गए निर्णयों पर लौटते हैं। वह प्रकरण, बाबरी मस्जिद के बाहरी प्रांगण में स्थित राम चबूतरे पर मंदिर के निर्माण की अनुमति मांगने के लिए दायर किया गया था। प्रकरण में संपूर्ण भूमि पर दावा नहीं जताया गया था। उस समय हिन्दू पक्षकारों का दावा मुख्यतः दो आधारों पर ख़ारिज किया गया था: 1) परिसीमा – यह कि प्रकरण बहुत देरी से दायर किया गया है क्योंकि उस स्थान पर 1528 से बाबरी मस्जिद है। 2) यह दावा केवल कब्ज़े के आधार पर किया जा रहा है और आवेदकों के पास इस स्थल की भूमि पर उनके अधिकार सम्बन्धी कोई दस्तावेज़ नहीं है। तीसरा मुद्दा जो उनके खिलाफ गया वह था मंदिर बनाने से दोनों समुदायों के बीच हिंसा या संघर्ष की आशंका।

हिन्दू पक्षकारों ने इन तर्कों का प्रतिवाद करने के लिए दो रणनीतियां अपनाईं – 1) वहां सामान्य स्थिति न रहने दी जाये और अपने दावे को मज़बूत करने के लिए, कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की धमकी का इस्तेमाल किया जाए और 2) यह तर्क दिया जाए कि उनका दावा किसी कानून, दस्तावेज या सुबूत पर आधारित न होकर केवल आस्था पर आधारित है। अब तक उनकी यह रणनीति कारगर रही है और इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने हिन्दुओं की आस्था को अपने निर्णय का मुख्य आधार बनाया। कानून और व्यवस्था के बिगड़ने की आशंका तो हमेशा रहती ही है।

अंत में

मस्जिद को गिराने के पीछे धार्मिक कारण नहीं थे। इसका एक उद्देश्य था कांग्रेस को सत्ताच्युत कर, भाजपा का शासन लाना। दूसरा दीर्घावधि उद्देश्य था संविधान और उसमें निहित स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और कानून के राज के मूल्यों को कमज़ोर कर हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का वर्चस्व स्थापित करना।

कांग्रेस सन 1992 में मस्जिद की रक्षा करने और देश की सत्ता हिन्दू श्रेष्ठतावादियों के हाथों में जाने से रोकने में असफल रही। मस्जिद के ध्वंस के बाद देश के विभिन्न हिस्सों- विशेषकर पश्चिमी और उत्तरी भारत – में सांप्रदायिक हिंसा हुई। मुंबई में हुए दंगों में लगभग 900 लोग मारे गए। गुजरात में 246, भोपाल में 95, मध्यप्रदेश के अन्य हिस्सों में 25, उत्तरप्रदेश में 200, असम में 100, कर्नाटक में 60, पश्चिम बंगाल में 32, राजस्थान में 48, बिहार में 24, केरल और आंध्रप्रदेश में 15-15 और तमिलनाडु में 2 व्यक्ति असमय काल के गाल में समा गए।

हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के लिए हिंसा का सहारा लिया। बाबरी मस्जिद को गिरा कर उन्होंने यह स्पष्ट सन्देश दिया कि उनके लिए कानून के राज का कोई अर्थ नहीं है और उनकी आस्था कानून से ऊपर है।

हमें आशा है कि उच्चतम न्यायालय का निर्णय, संविधान और कानून के राज में देश की सभी नागरिकों की आस्था को मज़बूत करेगा।

इरफान इंजीनियर

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

 

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Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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