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Narendra Modi An important message to the nation

“घर में घुस कर मारने” से वोट मिल सकते हैं आर्थिक समस्याएं हल नहीं हो सकतीं

उग्र राष्ट्रवाद के बादल में कटु आर्थिक सच्चाई कब तक छुप सकेगी

वरिष्ठ पत्रकार उबैद उल्लाह नासिर देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति की समीक्षा (Review of the country’s current economic status) कर रहे हैं कि किस तरह देश की अर्थव्यवस्था ढहने के कगार पर है (The economy of the country is on the brink of collapse)।

मोदी सरकार (Modi Govt.) ने “गोदी मीडिया” (Godi Media) की सहायता और साज़िश से चुनाव से पहले और और चुनाव के बीच में कटु आर्थिक सच्चाइयों को जनता की नज़रों से ओझल रखा हालांकि उस समय भी सच्चाई छन-छन कर सामने आती रहती थी जिससे सरकार उस समय इंकार करती रहती थी। यहां तक कि सरकारी संस्था NSSO के नौकरी से संबंधित आंकड़ों को भी झूठ बता दिया था, लेकिन अब जब चुनाव खत्म हो गए हैं और मोदी जी पहले से भी ज़्यादा ताक़तवर बन कर उभरे हैं, यह कटु आर्थिक सच्चाइयां उनकी सरकार के सामने मुंह बाए खड़ी हैं।

सोने पर सुहागा यह कि जिन ट्रम्प की सफलता के लिए हिंदूवादियों ने केवल मुस्लिम दुश्मनी के कारण हवन पूजन किया था, उसी ट्रम्प ने मोदी सरकार को झटका देते हुए भारत के सियासी तिजारत में सहूलियतों को समाप्त कर दिया है जिससे भारत की लगभग दो सौ वस्तुओं को अमरीका भेजना मंहगा हो जाएगा। ज़ाहिर है उनकी सप्लाई रुक जायेगी जिससे भारत में उनका उत्पादन काम होगा। उत्पादन कम होगा तो उन क्षेत्रों में रोज़गार घटेगा और सप्लाई न होने से उनका एक्सपोर्ट रुकेगा, जिसका असर विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign exchange reserves) पर पड़ेगा। इस तरह ट्रम्प ने भारत को आर्थिक मैदान में दोहरी मार दी है।

World Bank excluded India from the list of developing countries

समस्या का अंत यही नहीं हुआ विश्व बैंक (World Bank) ने भारत को विकासशील देशों की सूची (list of developing countries) से भी बाहर कर दिया है कहाँ भारत विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने के लिए हाथ पैर मार रहा था कहाँ सत्तर की दहाई में उसे विकासशील देश की मिलने वाली हैसियत भी समाप्त हो गयी और अब भारत अफ्रीका के कई देशों की श्रेणी में आ गया जिस श्रेणी में पाकिस्तान भी है।

सरकार ने बड़ी चतुराई के कटु आर्थिक सच्चाइयाँ जनता से छुपाये रखीं और उन्हें “घर में घुस के मारूंगा” का ऐसा नशा पिला दिया कि चुनाव में न तो उनके सामने बढ़ती बेरोज़गारी कोई मसला थी न किसानों की आत्महत्याएँ, न बर्बाद होते छोटे कारोबार, न ही बढ़ता हुआ विदेशी क़र्ज़ और न ही वास्तव में असुरक्षित सीमाएं. क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि मोदी जी की पांच वर्ष की हुकूमत में हमारे ज़्यादा फौजी शहीद हुए हैं, आतंकवादी हमले ज़्यादा हुए हैं, युद्ध विराम का उललंघन ज़्यादा हुआ है, यहाँ तक कि उरी, पठानकोट के हमारे फौजी अड्डे भी सुरक्षित नहीं रहे।

पुलवामा में जो कुछ हुआ वह गहन समीक्षा और जांच का विषय है, लेकिन हवा बंधाई में माहिर संघ परिवार के प्रचार तंत्र का ही कमाल था कि यह सब पीछे चला गया और उग्र राष्ट्रवाद के बादल में यह सारे काण्ड और कटु आर्थिक सच्चाइयां पीछे चली गयीं।

बेरोज़गारी के जो आंकड़े चुनाव के दौरान सामने आये थे, संघ परिवार और गोदी मीडिया ने हवा बांध कर उनको नकार दिया, लेकिन अब जब चुनाव खत्म हो गए और इस हवा बंधाई से चुनावी सफलता की लहलहाती फसल काट ली गयी तो सरकार को भी NSSO के उन आंकड़ों को मानना पड़ा, जिस में कहा गया था कि भारत में बेरोज़गारी का स्तर विगत 45 वर्षों में सब से ऊंचा हो गया है।

नए आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2018 से जून 2019 तक देश में बेरोज़गारी किदर 6 .1 % रही जो 45 वर्षों में सब से ज़्यादा है यहाँ तक की 2008 -13 तक की मंदी में जब अमरीकी अर्थव्यवस्था तक की चूलें हिल गयी थीं, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था डिगी नहीं और न ही बेरोज़गारी का दर इतनी खतरनाक स्तर पर पहुंचा था।

कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में बेरोज़गारी की समस्या ने निपटने की कुछ ठोस तजवीज़ें रखी थीं, लेकिन राष्ट्रवाद के शोर में जनता ने उन सब की अनदेखी कर दी।

सरकारी कंपनी बीएसएनएल के एक कर्मचारी ने मुझे बताया कि यह जानते हुए कि मोदी जी के दोबारा सत्ता में आने से बीएसएनएल बंद हो सकती है और हम सब सड़क पर आ जाएंगे हमें वेतन के अतिरिक्त मिलने वाली सभी सुविधाएं पहले ही बंद की जा चुकी थीं फिर भी इन कर्मचारियों में से अधिकतर ने बीजेपी को वोट दिया था।

मोदी जी अपनी दूसरी पारी में बेरोज़गारी की इस समस्या से कैसे निपटेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। पहली बार तो उन्होंने बेरोज़गारों को पकौड़े तलने का मश्विरा दे कर काम चला लिया था, इस बार क्या करेंगे, इस पर नज़र बनाये हुए हैं, क्योंकि सरकार बजट तो पहले ही पेश कर चुकी है, अब जो भी सामने आएगा वह पूरक बजट में ही होगा।

सरकार की नियत पर शक नहीं करना चाहिए, लेकिन वैश्विक आर्थिक हालात ईरान अमरीका के बीच समस्या अमरीका का भारत को ट्रेड के मैदान में झटका आदि को देखते हुए नहीं लगता कि अगले कुछ वर्षों में कोई बड़ा क़दम सरकार उठा सकेगी। उधर प्रतिदिन बेरोज़गारों की तादाद बढ़ रही है।

मोदी सरकार ने एक चाल और चली थी उस ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना का फार्मूला बदल कर उसमे क़रीब 2 % का इज़ाफ़ा दिखा दिया, लेकिन फिर भी सच्चाई जल्द ही सामने आ गयी। सरकार की तमाम कलाबाजियों के बावजूद 2018 -19 की चौथी तिमाही में आर्थिक विकास दर 5. 8 % रही जो पांच वर्षों में सब से कम है। ऐसे में सरकार के सामने अपने वादों को पूरा करने की बड़ी समस्या खड़ी होगी।

दूसरी ओर देश पर विदेशी क़र्ज़ा बढ़ता ही जा रहा है विगत चार वर्षों में विदेशी क़र्ज़ में 49 % का इज़ाफ़ा हुआ है और इस समय देश पर 82 लाख करोड़ का विदेशी क़र्ज़ है। समझा जा सकता है कि इसकी अदायगी तो दर किनार इस पर सूद ही कितना देना होता होगा।

जानकारों का कहना है कि विदेशी क़र्ज़ की बड़ी वजह सार्वजनिक क़र्ज़ में 52 % का इज़ाफ़ा है, जो विगत चार वर्षों में 48 लाख करोड़ से बढ़ कर 73 लाख करोड़ हो गया है। सरकार ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा है कि सरकार की पूरी देनदारी गिरावट की ओर अग्रसर है और वह राजकोषीय घाटा कम करने के लिए बाज़ार से क़र्ज़ की मदद ले रही है।

दर असल सरकार की आर्थिक परेशानियों में बहुत बड़ा हाथ गैर उत्पादक खर्च हैं। मिसाल के तौर पर प्रधान मंत्री के विदेशी दौरों पर 66 अरब रुपया खर्च किया गया, जबकि सरकार ने अपनी पब्लिस्टी पर 22 खरब रुपया खर्च किया।

सकल घरेलु उत्पाद ही पांच वर्षों में सब से निचली स्तर पर नहीं आया इन डेढ़ वर्षों में हम चीन से पहली बार पिछड़ गए हैं। रिज़र्व बैंक ने आशा जताई थी कि 2019 -20 में यह 8. 2 % तक जा सकती है, जिसके इमकान बहुत कम दिखाई देते हैं। सब से महत्वपूर्ण यह है कि जीडीपी में कृषि का योगदान (Agriculture contribution to GDP) कम होता जा रहा है। इस साल अगर मानसून ने साथ न दिया तो हालात और भी बिगड़ सकते हैं।

उधर मैन्युफैक्चरिंग और ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी आफत आयी हुई है। कार बनाने वाली कम्पनियों ने पैदावार काम कर दी है क्योंकि खरीदार घटे हैं।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पिछले वर्ष जनवरी से मार्च की तिमाही में विकास दर 5. 9 % प्रतिशत थी जो इस साल घट कर साढ़े तीन प्रतिशत के आस पास आ गयी है। अमरीकी पॉलिसी में बदलाव के बाद इस सेक्टर पर और संकट निश्चित रूप से आएंगे। इन सब का असर रोजगार के अवसरों पर ही सब से ज़्यादा पड़ेगा। सरकार के लिए आवश्यक होगा कि वह पैदावार बढ़ाने के लिए खपत बढ़ाए और खपत तभी बढ़ेगी जब जनता की जेब में पैसा होगा। यह पैसा कहाँ से आएगा सरकार के पास फिलहाल इसका कोई ब्लू प्रिंट नहीं है।

नयी वित्त मंत्री के सामने यह आर्थिक सवाल मुंह बाए खड़े हैं, जिनके लिए ठोस क़दम उठाने होंगे। लफ़्फ़ाज़ी कर के फाइलें दबाना और आर्थिक संकट से निपटना दो अलग-अलग बातें हैं।

उबैद उल्लाह नासिर

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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