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इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और भाजपा सरकारों का इतिहास से बैर

फिर से इस बार भोपाल (Bhopal) जाना है इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस (Indian History Congress) के लिए जो फरवरी 26-28 में है। तो याद आयी 2001 की जिसकी कुछ बातें शेयर कर रहा। जब-जब भाजपा सरकार (BJP Government) आती है तो उसका इतिहास (History) से कुछ खास ही बैर है जो अब छिपी बात नहीं। तो उन दिनों बाजपेयी सरकार (Bajpai Government) थी जो कहने को तो राजग (NDA) था पर इतिहास इसके निशाने पर था।

Indian History Congress And hate with History of BJP Governments

क्या है इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस

What is Indian History Congress

जो लोग इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस को नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि ये देश भर के इतिहासकारों की बहुत पुरानी संस्था (old institution of historians) है, 1935 से। कुछ विदेशी इतिहासकार भी इसमें हैं, जो आते हैं। देश के लगभग सभी इतिहासकार हमेशा से इससे जुड़े रहे हैं। आर सी मजूमदार, हेमचन्द्र रायचौधुरी, ए एल बाशम, ईश्वरी प्रसाद और अनगिनत इतिहासकार इसकी शोभा रहे हैं। यहां पर इतिहासकार अपने-अपने विषय से सम्बंधित शोध पत्र पढ़ते हैं और चर्चा वाद विवाद होता है। यह बहुत सम्मानित संस्था है और इसमें छपना अच्छे-अच्छे इतिहासकारों का सपना होता है।

तो साहब एक जमाने में साम्प्रदायिक संगठन आरएसएस ने इसे हाईजैक करने की कोशिशें भी कीं। चूंकि सदस्यता के लिए ये पहले उदार संस्था हुआ करती थी तो इसमें अपनी हल्ला ब्रिगेड को घुसाने की खूब कोशिशें की गईं जो इतिहासकारों की जागरूकता के कारण विफल होती रही हैं।

तो उस इतिहास विरोधी और बवाल समर्थक दौर में भोपाल में इतिहास कांग्रेस हुई। तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने स्वयं आकर इतिहास पर हमलों की निंदा (condemnation of attacks on history) की और एक शानदार वक्तव्य दिया।

मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह खुद रोज स्थल पर आते रहे और सबकी सुरक्षा खातिरदारी आदि उन्होंने स्वयं देखी। भोपाल में एक पुरानी विधान सभा है, उसे उन्होंने sessions proceedings के लिए खोल दिया था। लेकिन बवालियों को तो बवाल बनाना ही था। बस दो घटनाओं का जिक्र करेंगे।

वहां पर डिस्ट्रीब्यूशन के लिए कुछ मैटेरियल बिपन चन्द्र टीम की तरफ से था, जिसे हम लोग बहुत कम दाम पर लोगों को बांट रहे थे। एक प्रोफेसर का बेटा भी (10 साल से कम ही होगा) उत्साह में पम्फलेट बेच रहा था। उसको एक साम्प्रदायिक बवाली ने अकेले में डाँटा और धमकी दी कि तुम्हे बन्द कर देंगे। जब ये बात टीम तक आयी तो हम लोगों ने उसका प्रतिवाद किया जो देश में बड़ी खबर बनी। तब के साम्प्रदायिक आज जितने बेशर्म नहीं हुए थे तो उसने सफाई दी और माफी मांग ली

बवालियों ने एक बहाना हिंदी का उठाया कि हिस्ट्री कांग्रेस तो अंग्रेज दां लोगों के लिए और इसमें हिंदी का अपमान (insult of Hindi) होता है। लोग हिंदी में पेपर क्यों नहीं लिखते पढ़ते। जबकि असलियत यह है कि हिस्ट्री कांग्रेस में हिंदी में भी पर्चा पढ़ने की स्वतंत्रता है। अब इस मुद्दे पे उन लोगों ने हल्ला शुरू किया और 100 लोगों का जमावड़ा इकट्ठा कर लिया। हिंदी के लिए नारे लगने लगे। इतिहास और इतिहासकारों को कोसा जाने लगा। बहुत से genuine हिंदी प्रेमी भी भाषा की राजनीति न समझ कर उनके साथ आने लगे और हां में हां मिलाने लगे। खास टारगेट इरफान हबीब साहेब और जेएनयू के लोग थे।

मेरा खुद का हिसाब ऐसा है कि जो हिंदी जानते हों उनके साथ हिंदी में ही बोलता हूं क्योंकि ये सहज होता है। गैर हिंदी वालों के लिए इंग्लिश ही विकल्प है। तो मेरी छवि एक हिंदी वाला टाइप ही थी। तो वहां पर कुछ लोग मुझे भी उकसाये की कुछ बोलो। मैंने कहा कि हमें भाषा का मुद्दा मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उठाना चाहिए क्योंकि वही उच्च शिक्षा की पालनहार है। एक प्रस्ताव बनाया जाए कि ज्ञान विज्ञान की सारी सामग्री हिंदी में हमें उपलब्ध कराई जाए। चलिए मुरली मनोहर जोशी को घेरने का प्लान बनाइये। तब तक हिस्ट्री कांग्रेस चलने दी जाए क्योंकि इतना सारा अनुवाद में तो बहुत समय लगेगा। बहुत से लोग समझ गए कि ये बन्दा तो गलत कैम्प का है।

कुल मिलाकर ये बवाल भी एक आध घण्टे में फुस्स हो गया।

तो भोपाल में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस पर नजर रखिये। ये एक यादगार आयोजन होने जा रहा है।

इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, दिसम्बर 2001, भोपाल:कुछ बातें यादें।

(आलोक वाजपेयी, लेखक इतिहासकार हैं।)

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