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अलवर गैंगरेप की घटना की तहकीकात : दबंग जातियों के दबदबे का नतीजा

So sad

मास्टर प्लान खेड़ली

अलवर जिले का छोटा सा कस्बा खेड़ली यानी मंडी. राजस्थान सरकार (Rajasthan government) ने कस्बाई विकास के लिए २०११ से २०३१ तक सुनियोजित विकास प्रारूप तैयार किया. वहीँ दूसरी ओर अनुसूचित जाति/जनजाति महिलाओं के साथ बलात्कार, गैंगरेप, छेड़छाड़ और हत्या की वारदातों (Rape, gangrape, molestation and murder cases with SC / ST women) में इजाफा हुआ है. संदेह है कि इस प्रारूप के भीतर कोई सूराख तो नहीं, जिसके चलते २०११ के बाद से दबी-कुचली जातियों पर हमले लगातार बढ़े हैं, उत्पीड़न में बढ़ोतरी हुई है. इस सूबे में गुजर-बसर करती जो दलित जातियाँ हैं, महिलायें हैं, उनके साथ ऐसी जघन्य वारदातें करके कोई राजनीतिक खेल तो नहीं खेला जा रहा है. बड़े पैमाने पर कोई सियासी दांव तो नहीं है वरना और कौन सी वजहें हैं कि सबल जातियां कमजोर तबके पर हमलावर हों.

अलवर गैंगरेप की घटना की तहकीकात

(Investigating the incident of Alwar gangrape)

पूरे मसले को जानना है तो अलवर गैंगरेप की घटना की तहकीकात को परखना होगा. मसले की तफसील में जाकर देखने पर ही हकीकत से पर्दा हट सकेगा.

मामला २६ अप्रैल २०१९ का है. कस्बा खेड़ली में मीणा समुदाय (Meena community) का एक नवविवाहित जोड़ा घर रवाना हुआ था. उसे कुछ मनचलों ने जबरन बीच रास्ते में रोका. पत्नी के साथ गैंगरेप किया. युवती १८ बरस की रही होगी.

मामले की जांच से पता चला आरोपी गुर्जर समुदाय (Gurjar community) के हैं, जिन्होंने पति को बुरी तरह मारा पीटा, उसके सामने ही पत्नी का गैंगरेप किया और बात यहीं खत्म नहीं हुई अश्लील वीडियो -porn video (BF) बनाकर सोशल मीडिया में डालने की धमकी भी दी. दो-तीन दिन के भीतर ही जान-पहचान के लोगों के बीच से ही वीडियो के सोशल मीडिया में अपलोड होने की बात सामने आई. पति-पत्नी के पास से २००० रूपये भी छीन लिए. फिर फिरौती की रकम ९००० रूपये मांगी गई.

इस वारदात से दो बातें बिलकुल साफ़ हैं-एक, गैगरेप की घटना को अंजाम देने वाले सबल तबके से आते हैं, और उन्हें तकनीकी चीजों के इस्तेमाल का तरीका मालूम है. वे किसी भी हद तक बेख़ौफ़ होकर बड़े से बड़ा गुनाह करने में एक्सपर्ट हैं, साइबर क्राइम उनके पेशे का हिस्सा है.

वारदात के मुख्य पहलू Main aspects of the incident

इस घटना में जो मुख्य बात है, वो है ऊँची जाति का गुमान’ या गुरूर.

सवाल ये है कि यह गुमान किसी सबल जाति में ही क्यूँ है? इस बात की तह में जाना है तो श्रेष्ठ मानने वाली जातियों के इतिहास को खंगालना होगा.

आखिर क्या वजह है देश के किसी भी कोने में दबंग जातियां बेफिक्र होकर कमजोर जातियों पर तमाम तरीके से हमलावर होकर कहर बरपा रही हैं. लड़कियों, महिलाओं को लेकर यौन कुंठा से भरी हैं, आक्रामक हैं, उग्र हैं, अराजक हैं. सूबा कोई हो कमजोर बिरादरी की महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है.

देश के अंधे सम्राट को पत्र

अलवर गैंगरेप में भी यही हुआ. चुनावी माहौल के चलते वारदात की रिपोर्ट दर्ज होने में देरी हुई. गैंगरेप में शामिल आरोपी जैसा मालूम हुआ ‘गुर्जर’ समुदाय के हैं. तो यह तबका अमूमन लम्बे अरसे से खेती और पशुपालन करके गुजर-बसर करता रहा है. इतिहास में दर्ज है कि चुस्त-दुरुस्त देह के चलते इन्हें योद्धा के रूप में पहचान मिली. आज़ादी के बाद भारतीय सेना में इन्हीं खासियतों की वजह से अच्छी खासी तादाद में इन्हें नौकरी मिली. बावजूद इसके लम्बे अरसे से यह समुदाय मांग करता रहा है कि सेना में ‘गुर्जर रेजिमेंट’ बनाई जाय. जिसके लिए लोकल स्तर से नेशनल लेवल पर ‘राष्ट्रीय वीर गुर्जर सेना’ ‘देव सेना’ ‘गुर्जर युवा वाहिनी’ गुर्जर सेवक दल’ बने.  जबकि  कानूनी तौर से ये दल वैध नहीं हैं. ये सबल जातियों की स्वतंत्र जन सेनायें हैं, जो जाति और नस्ल की श्रेष्ठता को मान देती आई हैं. इन सेनाओं के संचालक स्थानीय ताकतवर लोग हैं, सियासी दल हैं, भू-माफिया हैं, लोकल स्तर के दबंगई करने वाले लोग हैं, जिनका दखल स्थानीय स्तर पर बना हुआ है. इनकी खासियत है कि यहाँ केवल  सवर्ण जाति के युवाओं को जन सेना में भर्ती मिली. इसमें भी जो संचालक हैं, वो अधिकांश धनबल से मजबूत और दबंग किस्म के हैं. अपराधी दिमाग के हैं.

यह खुद बेहद डरे हुए हैं ….इस नंगी औरत से ….

इन संगठनों की खूबी है कि स्थानीय स्तर परम धार्मिक, सांस्कृतिक संगठनों, दल और प्रशासन से अच्छा तालमेल बना हुआ है. असल में यही इनकी ताकत हैं, जिनके आसरे समाज और कानूनी तौर से सुरक्षा मिली हुई है. राष्ट्रीय दलों के साथ भी इनकी सांठगाँठ बड़े पैमाने पर लम्बे अरसे से है. यही वजह है उत्तर भारत के आठ राज्यों में इनकी पैठ है, हैसियत है, एक रुतबा है.

दूसरी तरफ अलवर गैंगरेप में जो पीड़ित पक्ष है, वो ‘मीणा’ समुदाय से आता है. यह सूबे में अनुसूचित जाति में शामिल है. अन्य सूबों में इसे कहीं जनजाति तो कहीं पिछड़ा वर्ग में रखा गया है.

दूसरा पहलू : साइबर क्राइम (Second aspect: Cybercrime)  

दूसरा पहलू है ‘साइबर क्राइम में माहिर गिरोह’, अलवर में हुई वारदात से एक बात साफ़ समझनी होगी कि  गैंगरेप की घटनायें ज्यूँ ज्यूँ बढ़ रही हैं, क्राइम में तकनीकी चीजों का इस्तेमाल भी बढ़ा है. जुर्म करने के बाद गुनहगार पीड़िता की तस्वीरें खींचते, अश्लील वीडियो बनाते नजर आ रहे हैं, डरा रहे हैं. जान से मार देने की धमकियाँ दी जा रही हैं. इस दिशा में ये गुनाह एक और शक्ल ले रहा है.

ताज़ा घटनाओं की क्लिपिंग बेचने का धंधा.

घटना के बाद यह देखा गया है कि केस दर्ज करते हुए केवल रेप या गैंगरेप के ही चार्जेस ज्यादातर मामलों में लगाये गए  हैं. इन्हें साइबर क्राइम की धारा नहीं जोड़ी गई. जबकि महिला के साथ रेप करना, नग्न तस्वीरें लेना, वीडियो बनाना, इंटरनेट पर सर्कुलेट करना ये दो अलग-अलग अपराध हैं जो कि साइबर क्राइम में आता है. इस पर कानून की धारा आईटी एक्ट 67 का प्रावधान है. तीन से पांच साल तक की सजा और पांच लाख रूपये जुर्माना है.

अलवर गैंगरेप में जब मीडिया का दबाव बढ़ा और भीम आर्मी की तरफ से सामाजिक न्याय की मांग उठी, विरोध प्रदर्शन हुए, सूबे की सरकार के खिलाफ सामाजिक संस्थाओं का दखल हुआ तब जाकर सियासी अमले में हरकत हुई. साथ ही पुलिस की जांच में तेजी आई. आननफानन में अपराधियों को मात्र ट्रक ड्राइवर या खलासी के रूप में पेश किया गया. इसके पीछे का मकसद कहीं ये तो नहीं कि पेशेवर कातिलों और गुनहगारों को कुछेक धाराओं से बचाया जा सके, जिससे उनके पीछे छिपे गोरखधंधे में शामिल अभियुक्तों को आसानी से छिपाया जा सके और मामला केवल उन्हीं पर बने जो पकड़े गये हैं. ताकि मामले को अन्य जांच से बचकर रफादफा करने में आसानी हो.

ऐसे गुनाह के पीछे जहां एक ख़ास मंशा काम कर रही है, वहीँ क्रिमिनल के दल, गिरोह की पहचान छिपाने की खातिर आहिस्ते से मामले में कुछ अन्य शिगूफे भी छोड़े जाते हैं. मसलन निजी विवाद, जमीनी विवाद, आपसी लड़ाई, आदि. ताकि सिर्फ पकड़े गये मुजरिम पर नजर रहे और जल्द से जल्द जुर्म क़ुबूल करवाकर मामले को तूल देने से बचाया जा सके. पुलिस महकमे की अनदेखी और प्रशासनिक अमले की जांच-पड़ताल में लीपापोती का ये नतीजा है. आखिरकार दबंग जातियों के धनबल और सियासी दबाव भी झेलने पड़ते हैं. खासतौर से तब जबकि दबंग मानी जाने वाली जातियों के कई कई  गुप्त और अनाम गिरोह, दल हैं इनमें भी जो सबसे बलवान है वो सरगना और मुखिया बने हुए हैं.

भरतपुर, सीकर और झुंझुनू की दर्ज रिपोर्ट

अलवर की ये जघन्य वारदात ज्यूँ ही सामने आई, राज्यभर में जहां-जहां बलात्कार हुए, उनमें भरतपुर, सीकर और झुंझुनू की दर्ज सूचनाएं सामने आने लगीं.

१३ मई को बीकानेर में ‘गोदारा’ समुदाय के पाँच लोगों ने युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया, घटना का वीडियो बनाया. इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दी. पीड़िता को लगातार ब्लैकमेल किया. इस घटना में भी आरोप ऊंची जाति के थे.

‘गोदारा’ समुदाय उत्तर भारत के कई राज्यों में बसा हुआ है. ये जाट समाज का गोत्र है. घटना में शामिल अब तक सभी आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं.

तकरीबन साल भर पहले भरतपुर में भी १३ साल की नाबालिग के साथ तीन लोगों ने बलात्कार की वारदात को अंजाम दिया. लड़की को सड़क पर फेंककर फरार हो गये. सोशल मीडिया पर अश्लील वीडियो को वायरल कर दिया. इस घटना में प्रशासन ने ठोस कार्रवाई करने के बजाय घटना में शामिल तीनों आरोपियों को फरार बताकर मामले को निबटाने की कोशिश की है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े (Statistics of rape national crime record bureau)

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने बलात्कार के जो आंकड़े दिए हैं, वह गौरतलब है- २०१५ जनवरी-अप्रैल माह तक राजस्थान में १,३१२ घटनाएँ दर्ज हुई, वहीं २०१९ में इन्हीं चार माह में यह आंकड़ा बढ़कर १,५०९ की संख्या को पार कर गया है. इनमें से ८५८ केस पुलिस कार्रवाई से अब तक अछूते हैं. केवल ३०२ मामलों में फाइनल रिपोर्ट सौंपी गई है और ३४९ मामलों में चार्जशीट फ़ाइल की जा सकी है.

ये आंकड़े बताते हैं राजस्थान में महिलाओं के साथ जुर्म कई मायनों में औसतन बढ़ा है.

अंत में यही कह सकते हैं कि ऊंची जातियों का दबदबा अनुसूचित तबके पर बहुत हद तक बना हुआ है. लगातार साइबर क्राइम में इजाफा हो रहा है. नई तकनीक का इस्तेमाल जहां गलत मंशा से अपराध के ग्राफ में वृद्धि कर रहा है, वहीं इसकी बढ़ोतरी दर रोकने में यह तकनीक नाकाफी साबित हुई है.

डॉ. अनिल पुष्कर

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