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CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विडंबना : महान है ये जनता भी, इसे क्रांति चाहिए पर क्रांतिकारी नहीं

अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है कि अन्याय से लड़ने वाले लोग (People fighting injustice) अब नहीं रहे हैं। इन लोगों के अनुसार देश में इतना अन्याय हो रहा है पर इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग बहुत कम हैं। ये सब वे लोग हैं जो यह तो चाहते कि अन्याय के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई लड़ी जाए (Fight a big fight against injustice) पर उस लड़ाई में कोई योगदान करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। उल्टे लड़ने वाले लोगों से दूरी बनाकर रखना चाहते हैं। व्यवस्था से लड़ने वाले लोगों का सहयोग करना तो दूर, हां मौका मिले तो हतोत्साहित जरूर करने लगते हैं। ये वे लोग हैं जो शासन-प्रशासन के खिलाफ भड़ास निकालते तो जरूj मिल जाएंगे पर व्यवस्था से लड़ने वाले लोगों (People fighting the system) को नकारात्मक सोच का व्यक्ति मानते हैं। इमरजेंसी के खिलाफ भी क्रांति तब हुई जब प्रख्यात समाजवादी लोकनायक जयप्रकाश जैसा मंझा हुआ नायक जनता के लिए खड़ा हुआ था। जनता ने एकजुट होकर उनका साथ दिया तो इंदिरा गांधी जैसी प्रधानमंत्री को सत्ता से उखाड़ फेंका गया था।

एक समय था कि देश और समाज के लिए लड़ने वाले लोगों को सामाजिक स्तर से न केवल सम्मान मिलता था बल्कि लोग सहयोग भी करते थे। इसी सोच के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी गई। भगत सिंह ने तो आजादी की लड़ाई को गति देन के लिए संकल्प के साथ अपनी शहादत दी। आज देश में स्थापित होती जा रही कारपोरेट संस्कृति (Corporate culture) के चलते व्यवस्था से लड़ने वाले अपनों के ही निशाने पर आ जाते हैं। क्रांतिकारियों का पहला विरोध वे ही लोग करने लगते हैं जिनके लिए वे लड़ रहे हैं। यहां तक कि परिजनों से हौसला मिलने के बजाय विरोध मिलता है। संसाधनों की ओर भाग रहे लोगों की धारना यह बनती जा रही है कि बस आदमी धन कमाकर लाए, भले ही उसका तरीका गलत है। भले ही इस समझौतावादी प्रवृत्ति के चलते उसको कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही हो।

यह देश की विडंबना है कि क्रांति तो हर कोई चाहता है पर यह कोई समझने को तैयार नहीं कि आखिर क्रांति करेगा कौन ? हर कोई चाहता है कि उसके अपने बच्चे उच्च पदों पर सुशोभित होकर पैसा कमाकर लाएं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि सेना में भी किसान या मजदूर के बच्चे ही जाते हैं। जो लोग आज के सबसे बड़े राष्ट्रभक्त बने घूम रहे हैं वे लोग अपने बच्चों को सेना में भेजने से परहेज करते हैं। देश पर मरने-मिटने वाला तबका भी इन लोगों के दिखावे के राष्ट्रवाद के पीछे हो ले रहा है। आज मोदी राज में रोजी और रोटी का बड़ा संकट पैदा होने के बावजूद यदि लोग भावनात्मक मुद्दों में उलझकर रह जा रहे हैं तो इसका बड़ा कारण भी लोगों की यही समझौतीवादी प्रवृत्ति है। लोग लड़कर नहीं बल्कि झुककर अपना काम निकालना चाहता है। इन सबका फायदा उठाते हुए देश पर राज कर रहे प्रभावशाली लोगों ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि लड़ने वाले व्यक्ति को नक्सली की उपाधि दी जाने लगी है। कुछ लोग तो उसे देशद्रोही और कुछ तो और आगे बढ़कर आतंकवादी तक बोल देते हैं। इन लोगों में ऐसे भी बहुत लोग होते हैं जो खुद इस व्यवस्था के शिकार होते हैं। जिस देश में जरा-जरा से मुद्दे पर बड़े-बड़े आंदोलन होने लगते थे, उस देश में केंद्र में बैठी सरकार अब तक की सभी सरकारों से अधिक पैसा विश्व बैंक से ले आई हो। नोटबंदी, जीएसटी के नाम पर तमाम कोष करने का दावा करने बावजूद रिजर्व बैंक में आपदा के लिए रखा गया रिजर्व पैसा भी निकाल लिया हो। ऐसी परिस्थिति में भी लोग किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं। देश में रोजगार मिलने के बजाय कपंनियों में बड़े स्तर पर छंटनी चल है। सरकारी विभागों का निजीकरण (Privatization of government departments) कर पूंजीपतियों को कर्मचारियों का शोषण करने के ठेका दे दिया जा रहा है। ऐसे में भी लोग उदासीन बने हुए हैं।

दरअसल पूंजीपति, राजनेता और ब्यूरोक्रेट ने मिलकर देश में एक ऐसा माहौल बना दिया है कि मोदी सरकार के खिलाफ कहीं से भी कोई आवाज न उठ पाए। इसके लिए हर हथकंडा अपनाया जा रहा है। भाजपा शासित राज्यों सरकारों का भी यही हाल है। उत्तर प्रदेश में तो सारी हदें पार कर दी जा रही हैं। कई पत्रकारों पर संगीन अपराधों में मामले इसलिए दर्ज कर लिये गये क्योंकि उन्होंने सरकार की खामियों को जनता के सामने ला दिया था। हाल ही में बिजनौर में कुछ पत्रकारों पर इसलिए मुकदमे दर्ज किये गये क्योंकि उन्होंने दबंगों द्वारा हैंड पंप से पानी न भरने देने पर एक दलित परिवार के अपने घर पर बिकाऊ का स्लोगन लगा देने की खबर प्रकाशित कर दी थी।

ऐसा नहीं है कि सत्ता पक्ष में बैठे ही लोग व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। विपक्ष में स्थापित मुख्य पार्टियों के नाते भी किसी ऐसी आवाज को बर्दश्त नहीं कर पाते हैं, जिसमें व्यवस्था से लड़ने का दम हो। उन्हें लगता है कि यदि आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया तो ये लोग उनके लिए ही खतरा बन जाएंगे।

अन्ना आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी के वर्चस्व में आने तथा दिल्ली में उसका कब्जा होने पर राजनीतिक दल किसी भी आंदोलन को मजबूत होते नहीं देखना चाहते हैं। आज स्थिति यह है कि विपक्ष बदलाव तो चाहता है पर न खुद संघर्ष करने तो तैयार है और न ही संघर्ष करने वाले लोगों को पचा पा रहा है। ये लोग बिल्ली के भाग से छींका टूटने की फिराक में हैं।

लोकतंत्र का मजबूत करने वाले स्तंभ पंगू बना दिये गये हैं। कार्यपालिका, न्यायपालिका सरकार का साथ देती प्रतीत हो रही है। बगावती लोगों को कहीं पर भी बर्दश्त नहीं किया जा रहा है। विधायिका तो खुद शोषक की भूमिका में है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाना वाला मीडिया तो देश में मजाक बनकर रह गया है। आज के मीडिया का काम बस इतना रह गया है कि बस किसी तरह से शासन प्रशासन से सेटिंग कर अपने मालिक के गलत कामों की ढाल बना रहे। कहने को तो व्यवस्था पर सबसे ज्यादा बातें मीडिया में होती हैं। बड़े बड़े पत्रकार, लेखक अपने बयानों औेर लेखनी से क्रांति की बातें करते हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि शोषकों के सबसे बड़े समर्थक और क्रांति के सबसे बड़े दुश्मन ये ही लोग हैं। इन लोगों ने निजी स्वार्थ के चलते मीडिया को पंगू बनाकर रख दिया है। कुछ करने का जज्बा लिये मीडिया में आ रहे युवाओं को समझौतावादी प्रवृत्ति में ढालकर प्रभावशाली लोगों का चाटुकार बना दिया है।

सोशल मीडिया फिर दूसरे माध्यमों से देश औेर समाज के लिए पत्रकारिता करने वाले जुनूनी पत्रकार और कुछ करने का जज्बा रखने वाले सोशल एक्टिविस्ट हर किसी के निशाने पर हैं। देश के युवा को जाति और धर्म के नाम पर भटका दिया गया है। ऐसे में कहां से उठेगी क्रांति की चिंगारी और कौन करेगा क्रांति ? बहुत साल बाद देश के मीडिया में आगे बढ़कर एक राष्ट्रव्यापी लड़ाई लड़ी गई।

प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर विभिन्न मीडिया संस्थानों में मीडियाकर्मियों अपने हक के लिए सड़क से लेकर अदालत कर मोर्चा संभाला है। यह देश के कानून पर अपने आप में सवाल है कि जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के सम्मान में अवमानना करने वाले प्रिंट मीडिया मालिकों के खिलाफ सड़क पर उतरे उन्हें रोजी-रोटी से ही हाथ धोना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट उनको कोई सुरक्षा न प्रदान कर सका। ये ऐसे क्रांतिकारी मीडियाकर्मी हैं जो विषम परिस्थितियों और अभाव में रहकर भी इस कुव्यवस्था से लड़ रहे हैं। देश की सर्वोच्च संस्था अपने आदेश के पक्ष में भी इन मीडियाकर्मियों की मदद नहीं कर पा रही है। अब कई-कई सालों से ये अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। इसे क्या कहा जाए कि सुप्रीम कोर्ट के कई बार लेबर कोर्ट को एक समय-सीमा में मजीडिया वेज बोर्ड से जुड़े मामलों का निपटारा करने का आदेश भी कुछ न कर सका। उसके द्वारा दी गई समय सीमा कई बार निकल चुकी है फिर भी मामले अभी तक विचाराधीन हैं। यह हाल तब है जब देश में प्रेस परिषद के अलावा अनगिनत पत्रकार के संगठन और प्रेस क्लब हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है जब मीडिया में यह हाल है तो इस व्यवस्था में जनता को हक क्या खाक मिलेगा ? हर जगह मैनेज का खेल चल रहा है। यही वजह है कि किसान, मजदूर या फिर अपने हक के लिए लड़ रहे युवाओं की बात कोई सुनने को तैयार नहीं है।

जमीनी हकीकत यह भी है कि  देश में चल रहे हजारों एनजीओ ने आंदोलन को भी मैनेज करने का काम ले रखा जो अनौपचारिक रूप से सरकारों की ही मदद करते हैं।  

Irony: this public is great too, it needs revolution but not revolutionary

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