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क्या सपा कंपनी पहले की तरह भाजपा की मददगार बनने की ओर अग्रसर है?

क्या सपा कंपनी पहले की तरह भाजपा की मददगार बनने की ओर अग्रसर है?

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ।

जैसे-जैसे देश लोकसभा चुनाव 2019 की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही सियासत के महारथी अपनी कलाओं से सियासत के नए परिदृश्य बनाने में जुट गए हैं। यूपी के सियासी महासंग्राम में सबसे ज़्यादा उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। इसके परिणाम क्या होंगे, यह तो आने वाले समय में ही साफ हो पाएँगे, लेकिन सपा कंपनी आज कल बड़ी उहापोह की स्थिति में दिख रही है, उससे न उगलते बन रहा है न निगलते बन रहा है। कांग्रेस को महागठबंधन से बाहर रखने पर कहीं यह संदेश न चला जाए कि सपा, कांग्रेस को महागठबंधन से बाहर रख मोदी की भाजपा को फ़ायदा पहुँचाना चाहती है। अगर यह संदेश गया तो उसका वोटर समझे जाने वाला मुसलमान सीधे कांग्रेस की तरफ़ रूख न कर ले, इसे लेकर सपा कंपनी भयभीत है। वैसे भी अधिकांश मुसलमान यह बात मानता है कि मुलायम सिंह यादव परिवार पहले की भाजपा व आज की मोदी की भाजपा को अंदर खाने मदद करता रहा है, इसके एक नहीं सैकड़ों प्रमाण हैं – जैसे, साम्प्रदायिक संगठनों को अपने शासन में अराजकता फैलाने की छूट देकर भाजपा को मज़बूत करना आदि-आदि। 2013 में मुज़फ्फरनगर, शामली, बागपत व सहारनपुर में साम्प्रदायिक दंगे करा कर मोदी की भाजपा को मज़बूत किया, जिसके बाद दनदना कर यूपी में सरकार बनवाई गई। बिहार में महागठबंधन तोड़ कर मोदी की भाजपा को लाभ पहुँचाने की भरपूर कोशिश की गई और चुनाव से पूर्व मुलायम सिंह यादव ने सपा के प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि बिहार में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, जिसे सुन वहाँ मौजूद कार्यकर्ता हैरान रह गए थे। पत्रकार भी वहाँ मौजूद थे, उन्हें कोई हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि उनको तो मालूम ही रहता है कि यह परिवार क्या करता है और क्या दिखाता है, लेकिन जब वहाँ की जनता ने अपना निर्णय सुनाया, तो वह महागठबंधन के पक्ष में था। बिहार में सभी सीटों पर सपा के प्रत्याशी लड़ाने का भी कोई लाभ नहीं हुआ था। सपा कंपनी में अब वही तरीका उनके बेटे अखिलेश यादव अख़्तियार कर रहे हैं, जबकि जनता का व उनके वोटरों का मानना है कि यूपी में मज़बूत महागठबंधन बने, जिसके बाद मोदी की भाजपा का सफ़ाया किया जा सके, लेकिन सियासी दलों के नेताओं को आम आदमियों की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं होता है वह तो बस अपना सियासी उल्लू बिठाने में मस्त रहते हैं।

सवाल यह उठता है कि जब कोई दल इस स्थिति में नहीं है कि केन्द्र में मोदी की भाजपा को अकेले मात दे सके, फिर तीसरे मोर्चे की बात करना कहाँ से सही कहा जा सकता है ? अगर कोई दल इस हालात में ऐसी डगर बनाता है तो उसे क्या कहा जाएगा ? क्या यह क़दम मोदी की भाजपा को लाभ नहीं पहुँचाएगा ? और अगर यही करना है तो फिर सेकुलर होने का ड्रामा क्यों करते हो ? वैसे भी सियासत में किसी को सेकुलर कहना या साम्प्रदायिक कहना ठीक नहीं है क्योंकि कब कौन साम्प्रदायिक हो जाए और कौन सेकुलर होने का ड्रामा करने लगे, कुछ नहीं कहा जा सकता।

सियासत में सबसे बड़े परिवार का तमग़ा लिए घूम रहे सपा परिवार ने हमेशा सेकुलर होने का ड्रामा किया, लेकिन उसकी स्ट्रेटेजी साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने की रही है। अगर इसी तरह की स्ट्रेटेजी पर काम किया गया तो यह उनके सियासी भविष्य के लिए शायद बेहतर न रहे, क्योंकि मुसलमान इस बार उसकी इस तरह की स्ट्रेटेजी को समझ रहा है। समझता तो पहले भी था पर जब मुलायम सिंह यादव अपने जज़्बाती भाषणों से उनके साथ खिलवाड़ करने में कामयाब हो जाते थे, अब वह हालात नहीं है जब के हालात और आज के हालात में बहुत फ़र्क़ है, इस लिए अब माफ नहीं करेगा उसका मुक़ाबला ऐसे दल से है जो देश को एक ऐसी राह पर ले जाना चाहती है जिस देश में संविधान नाम की कोई चीज़ नहीं, न्यायालय व जाँच एजेंसियाँ हर जगह वह अफ़रा तफ़री का माहौल बनाने में लगी हैं, जो न बहुसंख्यक के लिए बेहतर है और न अल्पसंख्यकों के लिए बेहतर है। इस सोच का हिन्दू भी विरोधी है और मुसलमान भी।

तथाकथित तीसरे मोर्चे को हवा देने या बनाने की बात करने का मतलब साम्प्रदायिक ताक़तों को बढ़ावा देना है। अगर यही हाल रहा सपा कंपनी का तो यह कहने में क़तई भी गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि पिता की तरह अखिलेश यादव भी मोदी की भाजपा के इसारे पर ही काम कर रहे हैं। अगर यह सच नहीं तो जिस तीसरे मोर्चे से मोदी की भाजपा को लाभ हो, उस रास्ते पर क्यों चल रहे हो ? क्या ये यह सिद्ध नहीं करता कि आप संघ की गोद में सीधे न बैठ दाएँ बाएँ कर रहे हैं?

के चन्द्रशेखर राव ने तेलंगाना में समय पूर्व चुनाव इसी स्ट्रेटेजी के चलते कराए क्योंकि विधानसभा चुनाव साथ होते तो मोदी की मदद इस तरह नहीं की जा सकती थी। उन्हें विधानसभा चुनाव हारने का ख़तरा रहता, उससे बचने के लिए वह ऐसा नहीं करते ?

असल में सारा झगड़ा तेलंगाना का है, वहाँ कांग्रेस के चन्द्रशेखर राव की विपक्षी पार्टी है उसके लिए वह यह खेल खेल रहे हैं, इसी तरह जैसे दो सीट वाली साम्प्रदायिक पार्टी को 1989 में जनता दल बनाकर उसमें शामिल किया गया था, वह भी कांग्रेस के विरोध के चलते उस पाप को आज तक देश की जनता भुगत रही है। आज भी वही हो रहा है कि तेलंगाना की सियासी दुश्मनी देश को ग़लत रास्ते पर चलने को कह रही है।

यही हाल सपा कंपनी का है उसको डर सता रहा है कि कहीं उसका वोटबैंक सीधे कांग्रेस की और न चला जाए।जो सियासी दल तीसरे मोर्चे की वकालत कर रहे हैं, उन्हें न देश की चिन्ता है, न संविधान की, न लोकतंत्र की। ऐसे हालात में अगर सपा कंपनी के सीईओ अखिलेश यादव के चन्द्रशेखर राव के बनाए मार्ग पर चलने की राह पकड़ते हैं तो यह साफ तौर पर समझा जाएगा कि वह अपने वोटर व देशहित का नहीं अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सेकुलर ताक़तों को कमज़ोर करने का काम कर रहे हैं।

अब यह तो जनता को सोचना चाहिए कि वह जो चाहती है सपा कंपनी वह नहीं कर रही है उसे चुनावों में सबक़ सिखाया जाना चाहिए। सपा अपने बिहाफ पर नहीं उड़ रही वह बसपा के कंधों पर सवार होकर ऐसा करने की सोच रही है। बसपा की बैसाखी उससे हटते ही वह सीधे ज़मीन पर जा गिरेगी और कोई उसको उठाने वाला नहीं होगा, क्योंकि उसे मालूम है अगर उसने बसपा से समझौता नहीं किया तो उसका वोटबैंक सीधे कांग्रेस की तरफ़ मूव कर जाएगा। यादव पहले भी उसे छोड मोदी की भाजपा में जा चुका है। रही बात बसपा की उसे इस परिवार ने पहले भी धोखा दिया था आगे भी देगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

सपा के कई लोगों से चर्चा करने के बाद ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि बसपा चाहे कितनी सीट पर लड़ ले ज़्यादा सीट हम ही जीतेंगे, क्योंकि हमारा वोट उस पर इतनी संख्या पर जाएगा ही नहीं कि उनकी सीटें निकल सकें, हमारे पास उसका वोट पूरा आएगा। इस लिए हम ज़्यादा सीट जीतेंगे और बसपा कम सीट जीतेगी। यह हाल तो पहले ही है सपा का आगे क्या होगा ?

क्या सपा कंपनी को इस सियासी आत्मघाती क़दम के बारे में सोचना चाहिए, जिससे साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से हटाया जा सके ? क्योंकि उसका वोटर साम्प्रदायिक शक्तियों हटाना चाहता है अब यह तो फ़ैसला सपा कंपनी के सीईओ अखिलेश यादव को करना है कि वह साम्प्रदायिक शक्तियों को मज़बूत करने वाला क़दम उठाएँगे या सेकुलर ताक़तों को मज़बूत करने के मार्ग पर चलेंगे। उनका सियासी भविष्य भी तय हो जाएगा उन पर व उनके परिवार पर लगते रहे यह आरोप सही है या ग़लत कि वह साम्प्रदायिकता को मज़बूत करते हैं इस सवाल का भी जवाब मिल जाएगा।

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