Breaking News
Home / समाचार / देश / झारखंड : मॉब लिंचिंग व आदिवासियों का हाशियाकरण
National News

झारखंड : मॉब लिंचिंग व आदिवासियों का हाशियाकरण

झारखंड में मॉब लिंचिंग पर सीएसएसएस टीम की तथ्यांवेषण रपट CSSS team’s fact-finding report on mob lynching in Jharkhand

(भाग-1)

भूमिका

चौबीस वर्ष के तबरेज अंसारी (Tabrez Ansari) को झारखंड (Jharkhand) के सराईकेला में एक भीड़ ने पेड़ से बांध कर पीटा। भीड़ की  मांग थी कि तबरेज, ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ के नारे लगाए। उसे एक मोटरसाईकिल चुराने के संदेह में पकड़ा गया था। उसने ‘जय श्रीराम’ (Jai Shri Ram) और ‘जय हनुमान’ के नारे लगाए भी परंतु फिर भी उसे बख्शा नहीं गया।

हत्यारी भीड़ के एक सदस्य द्वारा बनाए गए वीडियो में तबरेज अपनी जान की भीख मांगता हुआ नजर आ रहा है। इस वीडियो में पृष्ठभूमि में जो आवाजें सुनाई पड़ रही हैं उनसे  लगता है कि मौके पर महिलाएं और बच्चे भी मौजूद थे, जो असहाय अंसारी की हालत देखकर उसपर हंस रहे थे।

अंसारी के चेहरे पर मौत का डर साफ देखा जा सकता था। उसे भीड़ द्वारा बेरहमी से लाठियों से पीटा गया। भीड़ जानना चाहती थी कि वह मुसलमान है या नहीं।

इस घटना के चार दिन बाद, तबरेज की एक अस्पताल में मौत हो गई। पुलिस ने उसकी जान बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए।

Such incidents which mock the law are common in Jharkhand.

कानून का मखौल बनाने वाली इस तरह की घटनाएं झारखंड में आम हैं। दस अप्रैल 2019 को प्रकाश लकड़ा, पीटर केरकेट्टा, बेलारियस मिंज और जनेरियस मिंज पर भीड़ ने तब हमला कर दिया जब वे एक मृत बैल की खाल उतार रहे थे। इस घटना में लकड़ा की जान चली गई और अन्यों को गंभीर चोटें आईं। पीड़ितों के विरूद्ध गौवंश रक्षा अधिनियम (cattle protection act india) के तहत मुकदमा कायम कर दिया गया। हमलावर भीड़ में शामिल 40 लोगों में से केवल 7 को गिरफ्तार किया गया। झारखंड में पीड़ितों को अपराधी घोषित करना भी आम है।

मॉब लिंचिंग और हिंसक भीड़ के हमलों के शिकार लोगों को शायद ही कभी न्याय मिल पाता है।

नागरिक समाज संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक तथ्यांवेषण दल ने इस घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जुरमू और डुमरी की यात्रा की। यात्रा का उद्देश्य झारखंड में मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के कारणों को समझना भी था। इस तथ्यांवेषण दल ने तबरेज की हत्या के पहले झारखंड की यात्रा की थी।

कार्यपद्धति

इस दल में लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म (Center for Study of Society and Secularism) के निदेशक इरफान इंजीनियर, सेंटर की उपनिदेशक नेहा दाभाड़े, सामाजिक कार्यकर्ता अशोक वर्मा और प्रमुख आदिवासी कार्यकर्ता मरदी शामिल थे। दल ने 17 से 19 जून 2019 के बीच रांची, रामगढ़ और दुमड़ी की यात्रा की। दल जुमरू भी गया जहां 10 अप्रैल 2019 को प्रकाश लकड़ा और उनके तीन साथियों पर जानलेवा हमला किया गया था। युनाईटेड मिली फोरम के अफजल अनीस ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं को समझने में दल की मदद की। अनीस, मॉब लिचिंग और भीड़ की हिंसा के शिकार व्यक्तियों और उनके परिवारों के साथ काम कर रहे हैं।

जुमरू में दल ने सामाजिक कार्यकर्ता सरोज हेब्राम और मृतक प्रकाश लकड़ा के परिवार के सदस्यों से भी मुलाकात की। हमने जुमरू के निवासियों के साथ एक बैठक भी की। इस बैठक में गांव के ईसाई और गैर-ईसाई रहवासी शामिल हुए। दल ने जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अखिल भारतीय आदिवासी विकास  परिषद की मुखिया गीताश्री ओरांव और सामाजिक कार्यकर्ता व कलाकार बशीर अहमद से भी मुलाकात की।

झारखंड की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि Socio-Economic Background of Jharkhand

भारत के पूर्व में स्थित झारखंड राज्य का निर्माण, बिहार को दो हिस्सों में बांटकर किया गया था। झारखंड की सीमाएं बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश से मिलती हैं।

झारखंड के दो सबसे बड़े धार्मिक समूह हिन्दू (आबादी का 67.83 प्रतिशत) और मुसलमान (14.53 प्रतिशत) हैं। आदिवासी, झारखंड की आबादी का 26.21 प्रतिशत हैं और वे या तो हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं या ईसाई धर्म के। संथाल, ओरांव, मुंडा और हो, राज्य की प्रमुख जनजातियां हैं। इन जनजातियों के सदस्य, राज्य की आदिवासी आबादी का लगभग 77 प्रतिशत हैं।

खनिज संपदा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर झारखंड का निर्माण आदिवासियों के लंबे संघर्ष की परिणति था। आदिवासियों की शिकायत थी कि गैर-आदिवासियों द्वारा उनका शोषण किया जा रहा है जिसके चलते उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

जल, जंगल और जमीन से जुडे़ मुद्दे झारखंड के राजनैतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा हैं। राज्य में खनिज के प्रचुर भंडार, खनन उद्योग के लिए बहुत बड़ा आर्कषण हैं। खदानें और कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर वनभूमि का अधिग्रहण किया गया। वन, आदिवासियों के घर हैं। वनों से उनके विस्थापन के कारण वे जीवनयापन के अपने पारंपरिक स्त्रोत खो बैठे। दूसरी ओर, जो उद्योग वहां स्थापित हुए उनसे आदिवासियों को कोई लाभ नहीं हुआ। न तो उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी और ना ही उन्हें रोजगार मिला। उन्हें उनके जंगलों से बाहर धकेल दिया गया।

झारखंड के आदिवासी चुपचाप अत्याचार सहने वालों में से नहीं हैं। वहां स्वतंत्रता के पूर्व से आदिवासी आंदोलन का लंबा इतिहास है। वहां के संथालों ने ब्रिटिश शासन का विरोध किया था और बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी थी।

Jharkhand: Mob lynching and marginalization of tribals

स्वाधीनता के बाद, औद्योगिकरण के चलते झारखंड का आदिवासी चरित्र (Tribal character of jharkhand) कमजोर पड़ने लगा। उद्योगों के कारण देश भर के लोग काम करने के लिए झारखंड आने लगे। जमशेदपुर, जो कि स्टील सिटी के नाम से जाना जाता है, इस तरह के प्रवास का  उदाहरण है। झारखंड में विभिन्न राज्यों, धर्मों और जातियों के लोग आकर बस गए हैं। उनमें सबसे बड़ी संख्या में बिहार, बंगाल और उत्तरप्रदेश के निवासी हैं। ये प्रवासी राज्य के उद्योगों में अलग-अलग प्रकार के कार्य कर रहे हैं।

प्रवासियों के बढ़ते दबाव से भी राज्य के वनों को नुकसान पहुंचा और आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच की खाई और गहरी हुई। बाहर से आए लोग आदिवासियों के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं और उन्हें नीची निगाहों से देखते हैं। इस सबका नतीजा यह हुआ कि आदिवासी, सामाजिक और आर्थिक हाशिए पर धकेल दिए गए।

आदिवासियों की जमीनों पर औद्योगिक और खनन परियोजनाएं, सेना की फायरिंग रेंजें, बांध आदि बन गए। सरकार जंगलों को आदिवासियों का सामुदायिक संसाधन मानने की बजाए अपनी संपत्ति समझने लगी। जंगलों से अपना जीवनयापन न कर पाने के कारण, आदिवासियों की सरकारी कल्याण योजनाओं पर निर्भरता बढ़ गई। ये योजनाएं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं थीं और उन्हें मजबूर होकर मजदूरी करने के लिए राज्य से बाहर जाना शुरू करना पड़ा। जहां वे गए वहां भी उनका शोषण हुआ। विडंबना यह है कि आदिवासियों को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से बदहाल बनाने और उनकी पहचान उनसे छीनने की इस प्रक्रिया को ‘विकास’ और ‘राष्ट्रीय एकीकरण’ बताया गया।

झारखंड में दक्षिणपंथी हिन्दू श्रेष्ठतावादियों के उभार से आदिवासियों के हाशियेकरण की प्रक्रिया में तेजी आई।

हिन्दू श्रेष्ठतावादी, आदिवासियों को साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित करने में सफल रहे हैं। आदिवासियों पर हिन्दू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं लादकर वे उनका ‘हिन्दूकरण’ करना चाहते हैं। आदिवासियों के जीवन जीने के तरीके को दरकिनार कर वे उन्हें हिन्दू राजनैतिक पहचान देना चाहते हैं। ईसाई आदिवासियों सहित जो लोग इसका विरोध करते हैं, उन्हें नफरत और यहां तक कि हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह आरोप लगाया जाता है कि ईसाई मिशनरियां आदिवासियों का धर्मांतरण करवा रही हैं।

वनवासी कल्याण आश्रमों में आदिवासी बच्चों को हिन्दू धर्म के उच्च जातियों के संस्करण से परिचित करवाया जाता है। उन्हें ऐसा बताया जाता है कि हिन्दू धर्म उनकी संस्कृति से बेहतर है और उन्हें उसे अपनाना चाहिए। शनैः- शनैः आदिवासियों का हिन्दू देवी-देवताओं से परिचय करा दिया गया है। उनमें से कुछ, हिन्दू परंपराओं का पालन करने लगे हैं और हिन्दू त्यौहार मनाने लगे हैं। ऐसे आदिवासी अपने उन भाई-बहनों को नीची निगाह से देखते हैं जो आदिवासी परंपराओं का पालन करते हैं और प्रकृति पूजक हैं। आदिवासियों का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण कर दिया गया है।

कुल मिलाकर, झारखंड में आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी और हिन्दू आदिवासी बनाम ईसाई आदिवासी संघर्ष चल रहे हैं। आदिवासियों के ध्रुवीकरण का सबसे ज्यादा लाभ भाजपा को हुआ है।

पृथक झारखंड आंदोलन के सबसे पहले शीर्ष नेता जयपाल सिंह नामक एक ईसाई आदिवासी थे जिन्होंने इंग्लैंड के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने आदिवासियों की महत्वाकांक्षाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलवाई। बाद में वे कांग्रेस के सदस्य बन गए जिसके कारण पृथक झारखंड आंदोलन बिखर सा गया। इस आंदोलन ने सन् 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के उभार के बाद फिर से जोर पकड़ा।

यह विडंबना है कि आक्रामक हिन्दुत्व और नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों में आस्था रखने वाली भाजपा, एक ऐसे राज्य में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रही है जहां आदिवासियों का विस्थापन और उनकी भूमि का अधिग्रहण राजनैतिक विमर्श के प्रमुख मुद्दे होने थे। भाजपा ने कड़ी मेहनत से इस राज्य में अपनी राजनैतिक जमीन तैयार की है। उसने आदिवासियों को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत कर दिया है।

सन् 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अधिसंख्य हिन्दू मत तो प्राप्त हुए ही, लगभग तीस प्रतिशत आदिवासियों ने भी उसे मत दिया। यह झारखंड मुक्ति मोर्चा को मिले आदिवासी मतों से एक प्रतिशत ज्यादा था।

राज्य में भाजपा की चुनावी सफलताओं का एक कारण यह भी है कि उसने राज्य में प्रवासियों के प्रवेश और उन्हें राज्य के मूल निवासी का दर्जा दिलवाने में मदद की। भाजपा सरकार ने यह निर्णय लिया कि राज्य में 1986 या उसके पहले से निवासरत प्रत्येक व्यक्ति को राज्य का मूलनिवासी माना जाएगा। यह निर्णय प्रवासियों में अपनी पैठ बनाने के भाजपा के प्रयासों का हिस्सा है।

आदिवासी, प्रवासियों को ‘दिकु’ (बाहरी) मानते हैं। भाजपा सरकार राज्य में नव-उदारवादी नीतियों को प्रोत्साहन दे रही है। इसी के अंतर्गत आदिवासियों को उनकी भूमि के अधिग्रहण के लिए दिए जाने वाले मुआवजे संबंधी प्रावधानों को कमजोर किया गया है। दयामनी बारला के अनुसार, भाजपा ऐसे इलाकों में लोगों को विभाजित और ध्रुवीकृत नहीं कर सकी है जहां जनांदोलन मजबूत हैं।

आदिवासियों और दिकुओं को हिन्दुत्व के नाम पर एक करने का प्रयास किया जा रहा है। आदिवासियों के एक तबके का हिन्दूकरण कर दिया गया है व इस कारण दिकुओं के खिलाफ आदिवासियों का आंदोलन कमजोर हुआ है।

राज्य में रहने वाले प्रवासियों की अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है परंतु उन्हें अपनी भलाई इसी में नजर आती है कि वे हिन्दुत्व की छतरी तले खड़े हो जाएं और ‘विदेशी धर्मों’ (इस्लाम व ईसाई धर्म) को निशाना बनाएं। आदिवासियों के हिन्दूकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत उन्हें उनकी परंपरागत प्रथाओं से दूर किया जा रहा है और नीची जातियों के हिन्दुओं की नकल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, आदिवासियों में बीफ का सेवन बहुत आम है। परंतु अब उनमें से कई ने बीफ खाना छोड़ दिया है और वे हिन्दू आराधना और विवाह पद्धतियां भी अपना रहे हैं।

आदिवासियों को सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्दुओं से एकरूप बनाने की कोशिश हो रही है। मुसलमानों पर साम्प्रदायिक दंगों और हिंसा के जरिए सांस्कृतिक एकरूपता लादने का प्रयास किया जा रहा है। यही कारण है कि राज्य में मुसलमानों और ईसाईयों की लिंचिंग हो रही है और इस हिंसा का सामान्यीकरण कर दिया गया है।

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

(अगले अंक में जारी…)

About हस्तक्षेप

Check Also

Cancer

वैज्ञानिकों ने तैयार किया केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में फैल चुके कैंसर के इलाज के लिए नैनोकैप्सूल

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में फैले कैंसर का इलाज (Cancer treatment) करना बेहद मुश्किल है। लेकिन …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: