Breaking News
Home / गढ़ा हुआ विवाद : अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पर हमला करने की असली वजह जिन्ना की तस्वीर नहीं

गढ़ा हुआ विवाद : अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पर हमला करने की असली वजह जिन्ना की तस्वीर नहीं

गढ़ा हुआ विवाद : अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पर हमला करने की असली वजह जिन्ना की तस्वीर नहीं

भारतीय जनता पार्टी का विश्वविद्यालय परिसर में गुंडागर्दी को बढ़ावा देने का एक और अवसर मिल गया है. इस बार निशाने पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय है. विवाद मोहम्मद अली जिन्ना की उस तस्वीर को लेकर है जो 1938 से लगी है. 2 मई को संघ परिवार, हिंदू युवा वाहिनी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने इस तस्वीर को हटाने की मांग के साथ विश्वविद्यालय परिसर में प्रदर्शन किया. इन लोगों पर कार्रवाई करने के बजाए पुलिस ने विश्वविद्यालय के उन छात्रों पर हल्ला बोल दिया जो इसकी शिकायत करने जा रहे थे.

फिर छिड़ी बंटवारे में जिन्ना की भूमिका पर बहस



इस गढ़े हुए विवाद देश के बंटवारे में जिन्ना की भूमिका पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. इस प्रश्न पर पेशेवर इतिहासकार बहुत ध्यान नहीं देते. यह मान लिया गया कि बंटवारा जटिल काम था और इसके लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. पाकिस्तान में जिन्ना को जहां बेहद सम्मान मिलता है तो भारत में उन्हें कसूरवार के तौर पर देखा जाता है.

अपने अतीत से परेशान रहती है भाजपा

इस घटना के बाद भाजपा नेताओं के जो बयान आए उससे पता चलता है कि जिन्ना की भूमिका को लेकर उनमें स्पष्टता नहीं है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदर्शनकारियों की चिंता को सही बताया तो उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरुष बताया. इसके बाद उन्हें पार्टी से निकालने की मांग भी उठी. जसवंत सिंह के साथ भी 2009 में यही हुआ था और 2005 में लालकृष्ण आडवाणी को अध्यक्ष पद इसी वजह से छोड़ना पड़ा था. इन घटनाओं से यह पता चलता है कि भाजपा अपने अतीत से परेशान रहती है. इसमें एक तथ्य यह भी है कि मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा में एक दौर में करीबी संबंध रहा था.

अंग्रेजों का साथ हिंदू महासभा ने भी दिया और मुस्लिम लीग ने भी

दो देशों के जिस सिद्धांत के आधार पर मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग उठाई थी लेकिन यह मूल रूप से भारतीय मुसलमानों की मांग नहीं थी. पहली बार यह बात 1923 में विनायक दामोदर सावरकर ने सामने रखी थी. द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ हिंदू महासभा ने भी दिया और मुस्लिम लीग ने भी. बंगाल में तो दोनों ने मिलकर सरकार भी बनाई. भाजपा को तो इस बात पर जलन होनी चाहिए कि उनके वैचारिक गुरू के विचार को मुस्लिम लीग ने उठाकर उसे एक तार्किक परिणति पर पहुंचा दिया. महासभा की विरासत को आगे बढ़ाने वाली भाजपा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए अब भी संघर्षरत है.

बंटवारे का कसूरवार के तौर पर जिन्ना को पेश करने का लंबा इतिहास रहा है. कांग्रेसी विचारधारा के इतिहासकारों ने भी जिन्ना को खलनायक के तौर पर स्थापित किया. जिन्ना शुरुआत में कांग्रेसी थे. उन्हें दादाभाई नौरोजी ने तैयार किया था. वे गोपाल कृषण गोखले का बहुत सम्मान करते थे. राष्ट्रदोह के मुकदमे में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक का बचाव भी किया था. तिलक के साथ उन्होंने 1916 के लखनऊ समझौता तैयार करने के लिए काम भी किया था. 1906 में लीग की स्थापना हुई लेकिन कई सालों तक जिन्ना इसमें शामिल नहीं हुए. वे 1913 में लीग में शामिल हुए और तीन साल बाद अध्यक्ष बन गए.

जिन्ना आखिर तक एक भारत के लिए प्रयास करते रहे

ऐसे कई ऐतिहासिक प्रमाण हैं जिनसे यह साबित होता है कि आखिर तक जिन्ना एक भारत के लिए प्रयास करते रहे जहां सत्ता हिंदू और मुसलमान मिलकर चलाएं. जिन्ना के नेतृत्व में लीग ने पाकिस्तान के गठन को अपना अंतिम लक्ष्य 1940 में घोषित किया. 1946 में जिन्ना ने कैबिनेट मिशन के उस प्लान को मान लिया था जिसमें एक फेडरेशन के अंदर सत्ता हिंदू और मुस्लिम मिलकर चलाते. लेकिन कांग्रेस ने उस बात को नहीं माना और वार्ता टूट गई. जब बंटवारा तय लगने लगा तो कांग्रेस और महासभा इस बात पर एक हो गए कि पंजाब और बंगाल का भी बंटवारा हो जाए. इसका मतलब यह था कि दो राष्ट्र के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया. कांग्रेस और महासभा ने यह मान लिया कि अगर मुस्लिम हिंदू के साथ नहीं रह सकते तो पंजाब और बंगाल के हिंदू और सिख भी मुस्लिमों के साथ नहीं रह सकते. इन बातों को कांग्रेसी इतिहासकार खारिज करते आए हैं. अब वक्त आ गया है कि इन तथ्यों को जनता के सामने लाया जाए.



2019 के चुनावों तक यह मुद्दा चलाने के लिए हुआ एएमयू पर हमला

हमें यह याद रखना चाहिए कि जिस वजह से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उपद्रव हुआ, वह किसी ऐतिहासिक व्याख्या पर आधारित नहीं है. यह भाजपा की उस कोशिश का नतीजा है जिसके तहत वह आलोचनात्मक सोच को कुचलना चाहती है. अभी भी इस विश्वविद्यालय के नाम में ‘मुस्लिम’ शब्द है. इस वजह से मोदी के भारत और योगी के उत्तर प्रदेश में इस पर हमला होना स्वाभाविक है. इस विश्वविद्यालय पर हमला इस सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में हुआ है ताकि 2019 के चुनावों तक यह मुद्दा चलता रहे.

EPW Hindi Editorials, वर्षः 53, अंकः 19, 12 मई, 2018



About हस्तक्षेप

Check Also

Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

तार्किकता के विरोधी और जन्म-आधारित असमानता के समर्थक हैं मोदी और हिन्दू राष्ट्रवादी

भारतीय राजनीति में भाजपा के उत्थान के समानांतर, देश में शिक्षा के पतन की प्रक्रिया …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: