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आप के खिलाफ ‘‘सुपारी किलर’’ की भूमिका में कितने कामयाब होंगे कपिल मिश्र

आप तो सलामत पर उसकी राजनीति फेल

राजेंद्र शर्मा

क्या आम आदमी पार्टी नाम के राजनीतिक फिनामिना के अंत की शुरूआत हो चुकी है?

आप पार्टी की दिल्ली सरकार में महत्वपूर्ण जल विभाग के मंत्री रहे, कपिल मिश्र की बगावत के बाद से खासतौर पर इलैक्ट्रिोनिक मीडिया में यह सवाल बार-बार पूछा जा रहा है।

इस सवाल के पीछे, समाचार चैनलों के अच्छे खासे हिस्से की आप पार्टी और उसकी दिल्ली सरकार का शोक गीत पढ़ने की जो उतावली है, उसके अर्थ भी किसी से छुपे हुए नहीं हैं। आखिरकार, यह वह दौर है जब रवीशकुमार की चेतावनी के अनुरूप, खासतौर पर खबरिया चैनल, सत्तापक्ष के भाड़े के लठैतों की भूमिका में उतर चुके हैं। वे अब सत्तापक्ष का बचाव करने की रक्षात्मक मुद्रा से ही संतुष्ट नहीं हैं बल्कि चुन-चुनकर उसके राजनीतिक विरोधियों को पीटने की सक्रिय भूमिका में भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में कपिल मिश्र के आरोप, कई-कई गुना विस्तारित होकर, आप पार्टी और उसकी सरकार के लिए वास्तव में कितना और कैसा संकट पैदा करते हैं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। हां! इतना जरूर है कि कम से कम तात्कालिक रूप से इस संकट के सामने प्रमुख आप नेता और जाहिर है कि मंत्री, विधायक आदि, अपनी एकता का ही प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं।

इस संदर्भ में कुमार विश्वास का अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी में आस्था जताना खासतौर पर महत्वपूर्ण है।

याद रहे कि कपिल मिश्र का संकट सामने आने से सिर्फ चौबीस घंटे पहले तक आप पार्टी, कुमार विश्वास की ही नाराजगी का संकट झेल रही थी और विश्वास के पार्टी छोड़ने की अटकलों से जूझ रही थी।

वास्तव में ऐसा समझा जाता है कि कपिल मिश्र के खिलाफ मंत्रिमंडल से हटाने की कार्रवाई, पिछले ही महीने हुए दिल्ली के नगर निगम चुनाव में आप पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद से, कुमार विश्वास के गिर्द हो रही केजरीवाल-विरोधी गोलबंदी से उनकी नजदीकी की ही सजा थी।

बेशक, मिश्र को हटाने के लिए खासतौर पर नगर निगम चुनाव के मौके पर उनके आधीन जल विभाग के ‘‘खराब प्रदर्शन’’ का बहाना बनाया गया है। लेकिन, सभी जानते हैं कि यह एक बहाना ही है। कपिल मिश्र को आप पार्टी में असंतोष के बढ़ते स्वरों के साथ खड़े होने की सजा दी गयी है। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद, मिश्र की बगावत कम से कम फिलहाल अकेले चने की भाड़ फोडऩे की कोशिश ही बनती नजर आती है।

                लेकिन, इसका मतलब आप पार्टी के कपिल मिश्र संकट का तात्कालिक रूप से अंत होना भी नहीं है।

कपिल मिश्र, आप पार्टी के खिलाफ ‘‘सुपारी किलर’’ की भूमिका में अंतत: कितने कामयाब होते हैं इससे अलग, उन्होंने न सिर्फ सीधे केजरीवाल पर घूस लेने के आरोप लगाए हैं बल्कि एंटी-करप्शन ब्यूरो तथा सी बी आइ से लेकर, लैफ्टीनेंट गवर्नर तक से इस संबंध में लिखित शिकायतें कर, केंद्र सरकार के हाथों में आप सरकार पर निशाना साधने के लिए एक असरदार हथियार थमा दिया है। केंद्र सरकार को, कम से कम किसी न किसी प्रकार की जांच शुरू कराने का तो बहाना मिल ही गया है। यह दूसरी बात है कि मिश्र के आरोपों की रौशनी में केजरीवाल का इस्तीफा मांगने के अलावा केंद्र में सत्ताधारी भाजपा की ओर से आमतौर पर जैसी सधी हुई प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं, उनसे ऐसा नहीं लगता है कि केंद्र सरकार, लैफ्टीनेंट गवर्नर के जरिए, तत्काल कोई बड़ी कार्रवाई करने का जोखिम उठाने जा रही है। इसके बजाए, उसके लिए राजनीतिक रूप से शायद यही ज्यादा माफिक पड़ेगा कि इसे ‘‘आपसी झगड़े’’ में आप पार्टी की ‘‘पोल खुलने’’ का ही मामला बनाए रखे और सरकार को प्रत्यक्ष रूप से इससे एक हाथ दूर रखे। वर्ना मिश्र के आरोप भी अपनी विशिष्टता खोकर, केजरीवाल के विरोधियों के आरोपों की भीड़ में खो जाएंगे। इसके विपरीत भाजपा इन आरोपों का अधिकतम राजनीतिक लाभ लेना चाहेगी। इसके लिए यह ज्यादा उपयोगी होगा कि यह सब आप पार्टी के खासतौर पर दिल्ली में उत्तरोत्तर कमजोर होने की कहानी का हिस्सा बने, जिस पर पिछले महीने हुए दिल्ली नगर निगम चुनावों ने मोहर लगा दी है।

                बहरहाल, आप पार्टी और उसकी दिल्ली सरकार के लिए भले ही फौरन कोई गंभीर खतरा नजर न आ रहा हो, आम आदमी पार्टी की राजनीति आज सचमुच गंभीर खतरे में है। यह खतरा सिर्फ इस तथ्य में छुपा हुआ नहीं है कि शीर्ष से और सत्ता के शीर्ष पर, भ्रष्टाचार के अंधाधुंध आरोप लगाने की जो कार्यनीति, केजरीवाल तथा उनकी आप पार्टी की पहचान बनी रही थी, आज उन्हें खुद उसी कार्यनीति का स्वाद चखने को मिल रहा है। यह खतरा सिर्फ इस तथ्य में भी निहित नहीं है कि भ्रष्टाचारविरोध की आप पार्टी की यूएसपी यानी खास पहचान, लगातार हमलों से कमजोर पड़ती जा रही है और आप भी दूसरी पार्टियों जैसी ही नजर आने लगी है। इसके खतरे के संकेत सिर्फ इस तथ्य तक भी सीमित नहीं हैं कि पहले पंजाब की तथा गोवा की विफलता और अब दिल्ली नगर निगम के चुनाव के खराब प्रदर्शन के बाद, आप की देश के ज्यादा से ज्यादा हिस्से में, रातों-रात पांव फैलाने की अति-महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लग गया लगता है। इसकी शुरूआत तो संसदीय चुनाव में आप की देश के पैमाने पर जोर-आजमाइश की विफलता के बाद ही हो गयी थी, लेकिन दिल्ली में ही नगर निगम चुनाव में खतरे की घंटी बजने के बाद तो जैसे इस पर पक्की मोहर ही लग गयी है। गुजरात के आने वाले विधानसभाई चुनाव में अब आप पार्टी की धमा-चौकड़ी शायद ही दिखाई दे, हालांकि भाजपा और कांग्रेस के बीच मोटे तौर पर सीधे मुकाबला होने के चलते गुजरात, आप के हिसाब से उसके चुनावी हस्तक्षेप के लिए आदर्श था।

दरअसल आप की राजनीति की यह बुनियादी सीमा थी कि वह सिर्फ भ्रष्टाचारविरोध की अपनी मुद्रा के बल पर, देश भर की तमाम राजनीतिक ताकतों को प्रतिस्थापित करना चाहती है और वह भी तब जबकि उसकी भ्रष्टाचार की संकल्पना भी ऐसी बहुत ही सीमित मध्यवर्गीय संकल्पना है, जो खासतौर पर सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग के साथ भ्रष्टाचार के नाभि-नाल संबंध को देख तक नहीं पाती है। यह सीमित दृष्टि, सत्ताधारी वर्ग के अनुमोदन के सहारे, मध्यवर्ग को सक्रिय रूप से गोलबंद करने के जरिए, रातों-रात वैसी हवा तो बना सकती है, जैसी आम आदमी पार्टी की दिल्ली में बनी थी। लेकिन, यह हवा न तो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सार्वदेशिक हो सकती है और न टिकाऊ हो सकती है।

आप की सीमित दृष्टि में ही एक ओर उसका अपने अलावा सभी को भ्रष्ट करार देकर, तमाम राजनीतिक ताकतों को प्रतिस्थापित करने का रास्ता अपनाना निहित था, तो दूसरी ओर इसी सीमित दृष्टि में अपने प्रभाव को एक बार की कामयाबी से आगे सुदृढ़ करने तथा उसका विस्तार करने में उसका विफल रहना भी निहित था। यह विफलता और आप के जनाधार की अस्थिरता तब और उजागर हो गयी जब आप के लिए सत्ताधारी वर्ग के अनुमोदन की राजनीतिक सीमा को उजागर करते हुए, नगर निगम चुनाव में भाजपा ने आप से उस वोट का बड़ा हिस्सा छीन लिया, जिसने विधानसभा चुनाव में तो आप को अभूतपूर्व कामयाबी दिलायी थी, लेकिन इससे चंद महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया था।

अब जबकि इन बुनियादी सीमाओं के साथ, आप और उसकी दिल्ली सरकार को, केंद्र की भाजपा सरकार की खुल्लमखुल्ला शत्रुता का सामना करना पड़ रहा है, आप पार्टी दिल्ली में विधानसभा में अपने प्रचंड बहुमत के बावजूद, राजनीतिक सहयोगियों तथा मित्रों की तलाश करने के लिए मजबूर हो गयी है। इसके साथ ही वह अपनी राजनीति की केवल भ्रष्टाचार-केंद्रितता की सीमाओं को भी पहचानने के लिए मजबूर हो रही है। इस तरह आप और उसकी सरकार भले सलामत हैं, उनकी राजनीति फेल हो गयी है। अेकेले दम पर तमाम वर्तमान राजनीतिक ताकतों का मुकाबला करने की अपनी पुरानी राजनीतिक मुद्रा को छोड़कर आप जितनी जल्दी जनता के जनतांत्रिक हितों के आधार पर राजनीतिक दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करना सीखेगी,          उसके लिए उतना ही अच्छा रहेगा। हां! अगर वह अपनी पिटी हुई राजनीति के साथ ही सती होना चाहे तो बात दूसरी है।    

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