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HD Kumaraswamy. (File Photo: IANS)

कर्नाटक में एक बार फिर जनता की पराजय, लोकतंत्र की हार हुई

गांधी या गैर गांधी, अध्यक्ष कोई भी हो, लेकिन अब कांग्रेस को फैसला ले ही लेना चाहिए।

कर्नाटक के सियासी प्रहसन (Political tragedy of Karnataka) का पहला भाग 23 जुलाई को खत्म हो गया। जुलाई के पहले सप्ताह से जारी उठापटक में आखिरकार मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी (HD Kumar Swamy) को कुर्सी छोड़नी पड़ी। लगभग एक महीने तक देश की जनता ने विधायकों के बागी होने, रूठने, रोने-धोने, मान मनौव्वल किए जाने और आखिर में विधानसभा में ही सोने जैसे सारे राजनैतिक इमोशनल अत्याचार (Political Emotional Atrocities) देख लिए। भाजपा पर आरोप (Allegations against BJP) लगाए गए कि सत्ता हासिल करने के लिए उसने विधायकों को खरीद लिया (Purchase of legislators)। इस पर सोशल मीडिया पर तंज (Humor on social media) भी हुआ कि अच्छा हुआ कर्नाटक की सरकार गिर गई (Karnataka government fell), वर्ना लोगों का पैसे पर से भरोसा उठ जाता। व्यंग्य से भरी इस मारक टिप्पणी में कर्नाटक की राजनैतिक उठापटक (Karnataka’s political upheaval) का सार व्यक्त हो गया है।

तंज करने वाले अब ये भी कह रहे हैं कि हार के जीतने वाले को बाजीगर नहीं, बीएस येदियुरप्पा (BS Yeddyurappa) कहते हैं।

इस प्रहसन का दूसरा अंक जब शुरु होगा, तब शायद गठबंधन सरकार के बागी विधायकों में से कुछ विधायक मंत्री पद संभालते दिखेंगे और येदियुरप्पा फिर से कर्नाटक की गद्दी संभालेंगे।

अब इसमें भाजपा की जीत हुई या कांग्रेस-जेडीएस की हार, इसका विश्लेषण विशेषज्ञ करेंगे, फिलहाल सामने तो यही नजर आ रहा है कि कर्नाटक में एक बार फिर जनता की पराजय हुई है, लोकतंत्र की हार हुई है

अगर धनबल या पद के लालच या अन्य किसी लोभ से ही किसी दल में विधायकों की संख्या तय होना है, तो फिर लोकतांत्रिक चुनाव, मतदान का अधिकार, मतदाताओं का हक ऐसी तमाम बातों का क्या अर्थ? इससे बेहतर तो यही हो कि जो पार्टी सत्ता बनाने के लिए जितना निवेश कर सके, शासन की कमान उसे ही सौंप दी जाए।

कर्नाटक में जनादेश का इस तरह मजाक बनने पर कांग्रेस की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई है, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी सब इसे भाजपा की करतूत ठहरा रहे हैं। लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। क्या कर्नाटक की स्थिति कांग्रेस से छिपी थी? क्या गठबंधन सरकार बचाने के लिए डीके शिवकुमार जिस तरह कोशिशें कर रहे थे, वह कांग्रेस के बड़े नेताओं को नजर नहीं आ रहा था?

राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ा है तो उनकी जगह अध्यक्ष किसे बनाया जाए, कांग्रेस इसी में उलझी हुई है और एक के बाद एक राज्यों में उसकी स्थिति कमजोर हो रही है।

राहुल गांधी को अब तय कर ही लेना चाहिए कि वे किस नाव पर सवार होना चाहते हैं? क्योंकि उनकी अनिश्चितता का असर पूरी पार्टी और जमीनी कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है।

कर्नाटक में गठबंधन सरकार का भविष्य क्या होगा (What will be the future of coalition government in Karnataka), इसकी इबारत अरसे से लिखी जा रही थी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व उसे पढ़ने तैयार ही नहीं था। नतीजा यह हुआ कि भाजपा का पलड़ा भारी होता गया।

अब मध्यप्रदेश से भी शिवराज सिंह चौहान ने चेतावनी दे दी है कि हम यहां सरकार गिराने का कारण नहीं बनेंगे। कांग्रेस नेता खुद ही सरकार के पतन के लिए जिम्मेदार होंगे।

कांग्रेस पार्टी के भीतर कलह है और उसे बसपा का समर्थन हासिल है, अगर कुछ होता है तो हम इसमें कुछ नहीं कर सकते। इस बयान के बाद अब कांग्रेस पर मप्र की सरकार बचाने की चुनौती है।

उधर पंजाब में भी कांग्रेस ने खुद को अंतर्कलह के दलदल में फंसाए रखा है और उससे निकलने की इच्छाशक्ति भी नजर नहीं आ रही। जबकि यह वो राज्य है, जहां की जनता ने कांग्रेस को तब जीत दिलाई थी, जब बाकी देश में भाजपा का परचम बुलंद था। लेकिन यह कोहिनूर भी कांग्रेस के हाथ से फिसल रहा है।

अगले कुछ महीनों में महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। महाराष्ट्र में पिछली कड़वाहटों के बावजूद भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन पर काम करना शुरु कर दिया है, लेकिन कांग्रेस अपने सहयोगी एनसीपी से उलझी हुई है। दिल्ली भी अंदरूनी कलह का शिकार थी, अब शीलाजी के निधन के बाद कौन, किस तरह जिम्मेदारी संभालता है, पता नहीं।

यह असमंजस कांग्रेस के लिए उस वक्त तो बिल्कुल भी सही नहीं है, जब भाजपा काफी मजबूत होने के बाद भी एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रही है और जिन राज्यों में वह थोड़ी बहुत कमजोर है, वहां ताकत हासिल करने में लगी है।

गांधी या गैर गांधी, अध्यक्ष कोई भी हो, लेकिन अब कांग्रेस को फैसला ले ही लेना चाहिए।

(देशबन्धु का संपादकीय)

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