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Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

कर्नाटक से आगे : एक पूर्व-घोषित हत्या का रोजनामचा

‘‘रामदास उस दिन उदास था/ अंत समय आ गया पास था/ उसे बता, यह दिया गया था, उसकी हत्या होगी/ धीरे-धीरे चला अकेले/ सोचा साथ किसी को ले ले/ फिर रह गया, सडक़ पर सब थे/ सभी मौन थे, सभी निहत्थे/ सभी जानते थे यह, उस दिन उसकी हत्या होगी।’’

कर्नाटक में जनतंत्र की पूर्व-घोषित हत्या (Pre-declared murder of democracy in Karnataka) का जो मंजर हम पिछले एक पखवाड़े से ज्यादा से देख रहे हैं, उसकी विडंबना को और सबसे बढ़कर उसमें जनता की लाचारी को, दिवंगत रघुवीर सहाय की चर्चित कविता, ‘रामदास’ की ये पंक्तियां बहुत ही बेधक तरीके से सामने रखती हैं।

जिस जनता के नाम पर जनतंत्र का सारा ताम-झाम है, उसकी इससे बड़ी लाचारी क्या होगी कि,

‘‘सभी मौन थे, सभी निहत्थे/ सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी।’’

दुर्भाग्य से इस तरह ‘‘सभी निहत्थे’’ कर दिए जाने में कर्नाटक के विधायकों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले (Supreme Court’s latest verdict in Karnataka legislators case) ने भी कुछ न कुछ योग जरूर दिया है।

अदालत के फैसले का व्यावहारिक अर्थ यही है कि कर्नाटक के सत्ताधारी जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के जिन विधायकों ने पाला बदल लिया है, उनके इस पाला-बदल पर दलबदल कानून की बंदिश लागू नहीं होगी। जिस पार्टी के टिकट पर चुनकर वे विधानसभा में पहुंचे हैं, उसकी सरकार गिरवाने के लिए विरोधियों का हथियार बनने के बावजूद, इसकी उन्हें इतनी कीमत भी नहीं चुकानी पड़ेगी कि एक सीमित अवधि तक, उन्हें मंत्री पद से दूर रहना पड़े! सब कुछ देखते-समझते हुए भी सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक में करीब डेढ़ दर्जन विधायकों के इस पाला बदल के सामने जनता और उसके लिए जनतंत्र, दोनों को पूरी तरह से ही मौन और निहत्था कर दिया।

इसके बाद, एच डी कुमारस्वामी की सरकार पूर्व-घोषित हत्या से कैसे बच सकती थी। अलबत्ता उसके जिबह होने से पहले के हाथ-पैर मारने ने, राज्यपाल जैसी संस्था के भी इस हत्या का सहयोगी होने को ही उजागर किया है।

अचरज की बात यह नहीं है कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार, येद्दियुरप्पा के लिए अपने ऑपरेशन कमल-4.0 के कामयाब होने के बाद, इंतजार का एक-एक पल भारी हो रहा था। विश्वास मत पर मतदान की औपचारिकता, जितनी जल्दी पूरी होती, उनके लिए उतना ही अच्छा था। विश्वास मत पर बहस लंबी खिंचती देखकर, उनके संगियों ने राज्यपाल का दरवाजा जा खटखटाया कि स्पीकर को निर्देश दें कि इस औपचारिकता में ज्यादा टाइम बर्बाद न करें।

और मोदी सरकार द्वारा राज्यपाल के पद पर बैठाए गए, गुजरात से निकले पूर्व-भाजपा नेता वजूभाई वाला ने, अपने पद की गरिमा की रत्ती भर परवाह न कर, राजनीतिक वफादारी का सबूत देते हुए, स्पीकर के लिए बाकायदा यह निर्देश भी जारी कर दिया कि, विश्वास मत रखे जाने के दिन दोपहर तक ही, उसका फैसला कर दें।

और जब विधानसभा के स्पीकर ने इस अवैध निर्देश को अनसुना कर दिया और अविश्वास प्रस्ताव पर बहस अगले दिन जारी रहना तय हो गया, तो पहले तो इस आशय की खबरें फैलायी गयीं कि राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर, धारा-356 लगाकर जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार को बर्खास्त किया जा सकता है।

बाद में राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर, उन्हें अगली दोपहर का डेढ़ बजे तक, बहुमत साबित करने का निर्देश दे दिया। बेशक, वाला के ऐसे राजनीतिक पक्षधरता दिखाने पर शायद ही किसी को अचरज हुआ होगा।

आखिरकार, चौदह महीने पहले विधानसभाई चुनाव के फौरन बाद, कांग्रेस और जेडीएस के स्पष्ट बहुमत के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने का दावा पेश करने के बावजूद, वाला ने भाजपा नेता येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ ही नहीं दिलवा दी थी, उन्हें बहुमत साबित करने के लिए दस दिन से ज्यादा का समय भी दे दिया था, ताकि विरोधी गठबंधन में तोड़-फोड़ कर के बहुमत जुगाड़ सकें, जिसमें भाजपा और येद्दियुरप्पा वैसे भी माहिर हैं। उस समय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने बहुमत साबित करने के लिए लंबा समय दिए जाने को अनुचित माना था और दो दिन में ही बहुमत की परीक्षा कराने का निर्देश जारी किया था।

अंतत: खरीद-फरोख्त की सारी कोशिशों के बावजूद, इतनी जल्दी खरीद-फरोख्त और तोड़-फोड़ के जरिए बहुमत न जुटा पाने के चलते, येद्दियुरप्पा को सबसे कम समय के मुख्यमंत्री का रिकार्ड बनाते हुए, इस्तीफा देना पड़ा था।

बहरहाल, खरीद-फरोख्त का यह खेल उसके बावजूद लगातार जारी रहा और अब 14 महीने बाद उस मुकाम पर पहुंचा है, जहां येद्दियुरप्पा अपने साथ बहुमत का समर्थन साबित करने के लिए उतावले हो रहे थे।

बेशक, यह बहुमत भी कोई सामान्य बहुमत न होकर, येद्दियुरप्पा की भाजपा के खास ट्रेड मार्क वाला विधानसभा ही छोटी कर देने पर टिका ‘बहुमत’ है।

विश्वास मत पेश किए जाने के मौके पर अगर येद्दियुरप्पा अपनी ‘101 फीसद कामयाबी’ का दावा कर रहे थे, तो कोई इस आधार पर नहीं कि भाजपा को 222 सदस्यीय विधानसभा में आधे से ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल हो गया था। सब कुछ के बावजूद, वह अपने साथ तो सिर्फ 105 विधायकों का समर्थन होने का ही दावा कर रहे थे। लेकिन, जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के पंद्रह विधायकों के इस्तीफे और उसका समर्थन कर रहे दो निर्दलीय मंत्रियों के पालाबदल के बल पर वह, विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 105 से नीचे खिसक जाने के गणित से, बहुमत के अपने साथ होने का दावा कर रहे थे।

बहुमत का आंकड़ा ही नीचे खिसकाकर, विधानसभा में अल्पमत को बहुमत बनाने को इसी खेल का नाम ‘आपरेशन कमल(Operation lotus) है, जिसका आविष्कार पहली बार 2008 में येद्दियुरप्पा ने अपने अल्पमत को बहुमत में तब्दील करने के लिए किया था। इस ऑपरेशन के दो हिस्से हैं। विपक्षी सदस्यों से इस्तीफा दिलाकर बहुमत का आंकड़ा नीचे लाना। फिर उन्हें मंत्री बनाकर औपचारिक रूप से बदबदल कराना और भाजपा का उम्मीदवार बनवाकर जितवाना। यह खासतौर पर दलबदल कानून के 2004 के संशोधनों को धता बताने की कार्यनीति है, जो इस तरह दलबदल करने वालों को दलबदल की परिभाषा से और इसलिए उसे हतोत्साहित करने के लिए रखी गयी मामूली सजा से भी बचाती है।

ऑपरेशन कमल-4.0 में, जो इस समय चल रहा है, इस खेल को और मारक बना दिया गया है। जहां पहले, एक-एक, दो-दो कर के विपक्षी विधायकों का शिकार किया जाता था, इस बार सत्तापक्ष के एक साथ सवा-दर्जन से ज्यादा विधायकों पर यह जाल डाला गया है।

जिनके लिए अब भी यह साबित किए जाने की जरूरत हो कि कर्नाटक में जो हो रहा था और हुआ है, सिर्फ कुमारस्वामी की सरकार का शिकार किए जाने तक या कर्नाटक तक ही सीमित मामला नहीं है, कर्नाटक के ताजातरीन ऑपरेशन कमल के सुर्खियों में रहते-रहते ही, गोवा में केंद्र व राज्य दोनों में सत्ता में बैठी भाजपा द्वारा इस ऑपरेशन के अगले चरण को भी आजमाया जा चुका था।

अगला चरण, 2004 में संशोधित दलबदल कानून की गुंजाइशों के तहत, मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के विधायक दल का ही, दो-तिहाई बहुमत के बल पर, भाजपा में विलय कराने का था।

बेशक, दलबदल कानून बनाते समय कम से कम यह नहीं सोचा गया था कि किसी पार्टी के संसदीय/ विधायक दल के दो-तिहाई बहुमत के ही खरीद लिए जाने की नौबत आ सकती है। बहरहाल, मोदी-2 में बाकायदा यह नौबत आ चुकी है।

वास्तव में गोवा से भी पहले, यही दांव आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम् के राज्यसभा ग्रुप पर आजमाया गया था और उसके चार के चार राज्यसभा सदस्यों को भाजपा में मिला लिया गया था।

गोवा और आंध्र प्रदेश के ये ऑपरेशन, वास्तव में दूसरी पार्टियों के लिए इसका संदेश हैं कि जो भाजपा का साथ नहीं देगा, उसके विधायकों/ सांसदों यानी पार्टी को ही हाइजैक कर लिया जाएगा। हां! राज्यसभा में किसी भी तरह बहुमत जुगाडऩे की मुहिम में एक साथ, आवश्यकतानुसार सभी दांव आजमाए जा रहे हैं।

यूपी में फिलहाल, पुराना ऑपरेशन कमल ही चल रहा है। चंद्रशेखर पुत्र के पीछे-पीछे, सपा-बसपा के दो और राज्यसभा सदस्यों के भाजपाशरणम् गच्छामि करने की खबरें चल रही हैं।

‘कांग्रेस-मुक्त’ भारत का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का चुनाव भाजपा ने, अपने इतिहास में सबसे बड़ी संख्या में तुरंत-तुरंत कांग्रेसी से पूर्व-कांग्रेसी कराए गए उम्मीदवारों के साथ लड़ा और जीता था। इस विडंबना को रेखांकित करने वालों से यह प्राय: अनदेखा रह गया था कि यह रास्ता वास्तव में ‘विपक्ष-मुक्त’ भारत का है।

मोदी-1 में इसका पहले अरुणाचल तथा उत्तराखंड में, थोक में दलबदल कराने के जरिए, सरकार कब्जाने की अदालत के हस्तक्षेप के चलते विफल कोशिशों में और आगे चलकर गोवा, मणिपुर, मिजोरम में, चुनावी अल्पमत को खरीद-फरोख्त से बहुमत में तब्दील करने की सफल कोशिशों में, विस्तार किया गया।

मोदी-2 में इसी मुहिम को और आगे बढ़ाते हुए ‘विपक्ष मुक्त’ भारत के लक्ष्य को स्पष्ट कर दिया गया है। बेशक, राज्यसभा में बहुमत जुगाड़ऩा या कर्नाटक, बंगाल, केरल जैसी मुखर विपक्षी सरकारों को उखाडऩा या भाजपा की गोवा जैसी डगमग सरकारों को स्थिर करना, इस मुहिम की पहली प्राथमिकताएं हैं, लेकिन यह रास्ता साफ तौर पर विपक्षी पार्टियों से मुक्त भारत का है।

नवउदारवाद के दौर में, जिस तरह एक ओर तो जीडीपी की संख्या के सिवा जनता के हित की नजर से सभी आर्थिक प्रश्नों को राजनीति से बाहर किया गया है और दूसरी ओर राजनीति की मुख्यधारा में बड़े पैसे की तथा शहरी व ग्रामीण धनपतियों की बाढ़ आयी है, उसने राजनीतिक पार्टियों के बीच की विभाजक रेखाओं को पहले ही बहुत कमजोर कर दिया था। मोदी-2 में अब राजनीति से राजनीतिक पार्टियों यानी बची-खुची जनतांत्रिक राजनीति को भी बाहर करने की कोशिश की जा रही है। यह जनतंत्र की ही हत्या का रास्ता है। मगर इसे पहचान कर, पूरी ताकत से रोके जाने के आसार कम से कम फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं।

इस मुकाम पर ‘रामदास’ की अंतिम पंक्तियां बेसाख्ता याद आती है:

‘‘भीड़ ठेल कर लौट गया वह/ मरा पड़ा है रामदास यह/ ‘देखो-देखो’ बार-बार कह/ लोग निडर उस जगह खड़े रह/ लगे बुलाने उन्हें, जिन्हें संशय था हत्या होगी।’                                                           

0 राजेंद्र शर्मा

 

About राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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