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भगवा संगठन सामाजिक अमन-चैन और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनते जा रहे हैं

भगवा संगठन सामाजिक अमन-चैन और कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनते जा रहे हैं

योगी सरकार में कानून व्यवस्था ध्वस्त : माले

* सरकार के दावों का पोल खोलती हैं बुलंदशहर और सीतापुर की घटनाएं

law and order demolishes in Yogi government

लखनऊ, 4 दिसंबर। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) की राज्य इकाई ने कहा है योगी सरकार में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। बुलंदशहर में गोकशी की आड़ में प्रायोजित हिंसा और सीतापुर में दुराचार की शिकार महिला की रिपोर्ट पुलिस द्वारा दर्ज करने से इनकार के बाद आरोपियों द्वारा जिंदा जला कर मार देने की कोशिश जैसी हाल की घटनायें इसका पुख्ता प्रमाण हैं।

यह बात भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने मंगलवार को जारी बयान में कही। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार में यूपी की कानून व्यवस्था को लेकर अपनी पीठ थपथपाते नजर आते हैं, जबकि हकीकत में वे झूठ का प्रचार कर रहे होते हैं। क्योंकि प्रदेश में हत्या-दुराचार-उत्पीड़न-साम्प्रदायिक तनाव की बढ़ती घटनाएं मुख्यमंत्री के दावों की पोल खोलती हैं।

माले नेता ने कहा कि योगी ने यूपी में जो माहौल तैयार किया है, उसमे खुद संघ-भाजपा से जुड़े भगवा संगठन ही कानून को अपने हाथ मे ले रहे हैं और सामाजिक अमन-चैन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। बुलंदशहर में भगवा संगठनों की अगुवाई में पुलिस इंस्पेक्टर की भीड़ हत्या (मॉब लिंचिंग) से यह स्पष्ट हुआ है कि नफरत की राजनीति और ध्रुवीकरण के लिए संघ-भाजपा किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को इस बार बुलंदशहर के रास्ते सम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बनाने की साजिश रची जा रही है। इसके लिए तब्लीगी इज्तमा का मौका चुना गया, जब बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग धार्मिक कार्य से बुलंदशहर में थे।

राज्य सचिव ने कहा कि सीतापुर जिले के तंबौर थानाक्षेत्र में महिला को जिंदा जला कर मार देने की कोशिश ने दिखाया कि छेड़छाड़ और दुराचार की घटनाओं में महिलाओं की थानों में सुनवाई अब भी नहीं होती, न्याय मिलना तो दूर की कौड़ी है। पीड़िता ने अपने साथ हुई हिंसा की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए दो बार थाने और अधिकारियों के चक्कर लगाये थे। अनदेखी करने के बजाय यदि पुलिस ने त्वरित कारवाई की होती, तो अभियुक्तों का मनोबल नहीं बढ़ता और वे उसी समय सलाखों के पीछे होते।

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