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चर्चा में ‘समाज का आज’
चर्चा में ‘समाज का आज’

इन लेखों में कोई भी पीड़ा सघन रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है, उसकी सूचना मात्र है. फिर भी, किताब की पठनीयता की उन्होंने उन्मुक्त सराहना की.

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-19 22:53:51
मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं
मुक्तिबोध जिन गढ़ों एवं मठों को तोड़ना चाहते थे वह गढ़ और मठ और मजबूत हुए हैं

मुक्तिबोध की कविताओं में आत्म संघर्ष प्रमुखता से उभरता है। वे सच्चे अर्थों में किसानों मजदूरों से जुड़कर कविताएं लिखते थे।

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-07 01:44:20
कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी- कुमार अंबुज
कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी- कुमार अंबुज

जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है, उनका हल निकालने में मदद कर सकता है और अंततः समूची मानवता को मुक्ति ...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-06 23:46:33
सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थे मुक्तिबोध  ललित सुरजन
सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थे मुक्तिबोध : ललित सुरजन

मुक्तिबोध जैसी समझ दुनिया में कितने लोगों की होती है। किसानों मजदूरों वचितों के साथ उनमें राजनैतिक चेतना की गहरी समझ थी।मुक्तिबोध दुरुह नहीं अपित...

हस्तक्षेप डेस्क
2017-02-05 12:25:28
रैम्प पर खादी खादी आश्रम में तम्बोला
रैम्प पर खादी, खादी आश्रम में तम्बोला

गुलाम देश की जनता ने गांधी को ही नहीं, उनके सपनों को भी सिर-माथे लिया था। उनके लिये लाठियां खायीं, कोड़े खाए, पर आजाद भारत ने उनकी एक-एक याद को रो...

राजीव मित्तल
2017-01-31 10:27:28
‘मनुष्य से बड़ा कौनसा लक्ष्य हो सकता है’- स्वयं प्रकाश
प्रेमचंद का लेखन तमगों का मोहताज नहीं