रैम्प पर खादी, खादी आश्रम में तम्बोला

गुलाम देश की जनता ने गांधी को ही नहीं, उनके सपनों को भी सिर-माथे लिया था। उनके लिये लाठियां खायीं, कोड़े खाए, पर आजाद भारत ने उनकी एक-एक याद को रोंदने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ...

 

छह साल पुराना है यह वाकया ।

 राजीव मित्तल

अय्यर जी, आप भी किस चक्कर में पड़ गए कि गांधी को मरवाने में फलाने-फलाने भी थे। कुछ नहीं, अपनी फजीहत करा रहे हो। मन को भायी नहीं अखबार में छपी वो फोटो, जिसमें बाल ठाकरे के हाथ में जूता है और सामने मणि शंकर पुतला।

खैर, मुद्दा यह है कि गोडसे की गोली खा कर मरे गांधी को तो 30 जनवरी 1948 के बाद से रोज ही मारा जा रहा है, तिल-तिल कर मारा जा रहा है, तो किस-किस को कटघरे में खड़ा करेंगे आप। उनके हाथों में चाकू-पिस्तौल न हों, पर असर ज्यादा घातक है, ज्यादा गहरा है। आप को तो बस इस बात की पड़ी है कि बुढ़ाऊ पर गोली चलाने वाले, चलवाने वाले ये थे, वो थे, पर उसका क्या करेंगे, जिसमें उन्हें मिटाने का खेल चल रहा है।

आप नेताओं के सिर पर से गांधी टोपी उतर चीथड़ा हो गयी, उनके चरखे की खादी आपके बदन को छीलती थी, सो वो भी आपने उतार फेंकी, जो अब किसी फैशन शो में रैम्प पर उतरे रति-कामदेवों के जोड़ों के अंगवस्त्रों में इस्तेमाल हो रही है, तो फिर गांधी को वक्त-बेवक्त याद क्यों करते हैं? पुण्य तिथि और जन्म तिथि को राजघाट पर हुजूम लगा कर ‘रघुपति राघव राजा राम’ का पाठ करना काफी नहीं है क्या?

पर, एक काम बहुत अच्छा हो रहा है कि उन्हें राजघाट तक सीमित कर बाकी देश भर से उनको बुहारा जा रहा है। जो कुछ गांधीमय था, वह स्वर्गीय होता जा रहा है।

अब देखिये न, जिस चम्पारण से मोहन दास करमचंद गांधी महात्मा गांधी बने वहां अब उनकी ऐसी कौन सी चीज बची है, जहां जा कर सिर श्रद्धा से झुक सके या दो मिनट खामोश बैठ कर बापू को महसूस किया जा सके। गांधी वहां पग-पग में घूमे थे, उस समय न जाने कितने भले- मानुषों से उन्हें भूमि दान में मिली थी ताकि वे अपने सपनों को अमलीजामा पहना सकें।

गुलाम देश की जनता ने गांधी को ही नहीं, उनके सपनों को भी सिर-माथे लिया था। उनके लिये लाठियां खायीं, कोड़े खाए, पर आजाद भारत ने उनकी एक-एक याद को रोंदने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

देश की आजादी से 12-15 साल पहले गांधी जी खादी का प्रचार करते-करते वैशाली के गौरोल इलाके में पहुंचे तो वहां की जनता गुलामी की कातरता भूल इतना उत्साहित हुई कि अपना सब कुछ इस महात्मा पर न्योछावर करने पर उतर आयी। पर वे साल 1935-40 के थे, जिनके आदर्शों पर सन् 60 आते-आते मकड़ी का जाला लग चुका था।

लेकिन मकड़ी भी गांधी जी की धरोहरों को कब तक संभालती, सो अब जाले छंट चुके हैं, गांधी जी को दान में दी गयी भूमि बिक चुकी है, शायद रजिस्टरी तक हो चुकी है, अब वहां पर क्या होगा, ये तो खरीदने और बेचने वाले जानें, पर वहां गांधी जी किसी रूप में नहीं होंगे।

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