कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी- कुमार अंबुज

जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है, उनका हल निकालने में मदद कर सकता है और अंततः समूची मानवता को मुक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।...

हाइलाइट्स

आज के साहित्य को बेहतर दुनिया के संघर्ष का हिस्सा होना होगा-प्रलेस

 

भोपाल 6 फरवरी. प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेसं) की मध्य प्रदेश इकाई ने गत 4-5 फरवरी को राजधानी भोपाल में युवा कवियों के कविता शिविर का आयोजन किया। इस शिविर में भिन्न स्थानों से आये कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया. सभी शिविरार्थियों ने इन कविताओं के अच्छे बुरे पहलुओं पर और उन कविताओं की सामर्थ्य और सीमाओं पर चर्चा की।

कविता शिविर का आगाज करते हुए वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने सभी प्रतिभागियों से कहा कि कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी है। क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता और तर्क की कसौटी पर नहीं कसता तो उसकी कविता का न तो उद्देश्य और न ही उसका फलक इतना बड़ा हो पायेगा कि वह समाज के अपने अनुभवों को सही परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त कर सके।

प्रलेसं, मध्य प्रदेश के महासचिव विनीत तिवारी ने कविता शिविर के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि साहित्य और कविता प्रतिरोध का उपकरण है। जो गलत है उसके विरोध का, फिर गलत को परास्त करने का और फिर सही समाज व्यवस्था को लागू करने का जो वृहत्तर उत्तरदायित्व सभी जागरूक  मनुष्यों का है, उसमें साहित्य को भी अपनी भूमिका निभानी होती है। उन्होंने हिंदी के महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध का जिक्र करते हुए कहा कि मुक्तिबोध ने हर सामान्य मनुष्य और हर जागरूक मनुष्य से अपनी कविता में अपना राजनीतिक पक्ष साफ़ करने की बात की है। जैसे-जैसे हम साहित्य की समाज में भूमिका को समझते जाते हैं, हमारी चुनौती और ज़िम्मेदारी बढ़ती जाती है। तब साहित्य मात्र मनोरंजन नहीं रह जाता बल्कि वो बेहतरी के लिए संघर्ष का हिस्सा बन जाता है।

शिविर की शुरुआत उरुग्वे के चर्चित लेखक एडवार्डो गैलियानो के महत्त्वपूर्ण लेख 'आखिर हम लिखते ही क्यों हैं' के पाठ से हुई। यह एक शाश्वत प्रश्न है जो एक लेखक के मन में कभी न कभी आता है। इस लेख तथा इस पर हुई चर्चा ने युवा कवियों के मन की तमाम दुविधाओं को दूर किया।

शिविर के पहले दिन दीपाली चौरसिया, मानस भारद्वाज, प्रज्ञा शालिनी और अल्तमश जलाल ने अपनी कवितायें पढ़ीं। बाद में हुई चर्चा में इन कविताओं की खूबियों और खामियों पर हुई लंबी बातचीत ने सभी कवियों को उनकी रचनाओं के छुए-अनछुए पहलुओं के बारे में जानने में मदद की। नए कवियों को कुमार अम्बुज, विनीत तिवारी और अनिल करमेले और रवींद्र स्वप्निल प्रजापति ने कविता को पढ़ने और समझने के तथा विश्लेषण की दृष्टि विकसित करने के कुछ तरीके बताये कि कविता के अर्थ को किस कोण से बेहतर खोल जा सकता है। 

शिविर के दूसरे दिन एक सत्र मुक्तिबोध को समर्पित किया गया। ये वर्ष मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष भी है और वे हिंदी कविता के एक अनिवार्य कवि हैं। इस सत्र में उन पर लिखे लेखों के पाठ के साथ ही उनके लेख 'जनता का साहित्य किसे कहते हैं' का भी पाठ हुआ। पाठ के पश्चात तमाम प्रतिभागियों ने लेख के कथ्य पर चर्चा की। जिसका निष्कर्ष यही रहा कि जनता का साहित्य वह साहित्य है जो उसके जीवन की समस्याओं को संबोधित कर सकता है, उनका हल निकालने में मदद कर सकता है और अंततः समूची मानवता को मुक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

कुमार अम्बुज ने कहा कि जीवन विवेक को ही साहित्य विवेक कहा था और वही आज भी बड़ा पैमाना है।

शिविर के दूसरे दिन श्रद्घा श्रीवास्तव, अभिदेव आजाद और संदीप कुमार ने अपनी कविताओं का पाठ किया। कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, अनिल करमेले, आरती, दीपक और पूजा ने इन पर अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया भी दी जो अभ्यास के हिस्से के तौर पर की गयी। इसी तरह पाठ, तुकांत-अतुकांत, लयात्मकता, आंतरिक लयात्मकता, बिम्ब विधान आदि कविता से जुड़े मुद्दों पर बात हुई । इस दौरान प्रतिभागियों ने भी एक दूसरे की कविताओं पर टिप्पणियां कीं। इस बात पर बार बार ज़ोर दिया गया कि अच्छा लिखने के लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है कि हमसे पहले के लोगों ने क्या क्या अच्छा और ख़राब लिखा है। एक कवि या साहित्यकार अपना कहन का तरीका, कहने की बात और भाषा का चुनाव केवल अपने ही समय और अपनी ही ज़मीन से नहीं करता। उसे अपने पूर्वज लेखकों से भी सीखना होता है। जीवन विवेक और साहित्य विवेक को रचने और मज़बूत करने वाली कुछ प्रमुख किताबों की सूची बनाई गयी जिसे प्रतिभागियों ने अगले एक वर्ष में पढ़ने का संकल्प किया।  इनमे गोर्की, टॉलस्टॉय, व्हिटमैन, चेखोव, जैक लन्दन, होवार्ड फास्ट, निकोलाई ओस्त्रोव्स्की से लेकर प्रेमचंद, मुक्तिबोध, परसाई, रेणु, श्रीलाल शुक्ल, पाश आदि की कृतियाँ शामिल थीं। 

शिविर के समापन तक प्रतिभागी आपस में खुल चुके थे और उनके सवाल औपचारिकता के संकोच को लांघकर बहार आने के लिए और उतावले हो रहे थे कि वे पूछ रहे थे कि अगला शिविर कब लगेगा या इसे एक दिन और नहीं बढ़ाया जा सकता क्या। ज्ञातव्य है कि मध्य प्रदेश में प्रति वर्ष रचना और विचार के ये आवासीय शिविर प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा वर्षों से आयोजित किये जाते रहे हैं। हाल के वर्षों में ये शिविर कालाकुंड (इंदौर), उज्जैन, अशोकनगर, छिंदवाड़ा, दमोह आदि अनेक स्थानों पर लगाए गए हैं।

 

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