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स्मृतिलोप से हट कर यथार्थ की ओर : हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश

स्मृतिलोप से हट कर यथार्थ की ओर : हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश

सुभाष गाताडे

( अकार, हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित)

‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये ! ..दार्शनिक आए ! फिर भी    अस्पृश्यता  , विषमता अमर है ! ..यह सब कैसे हो गया ? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आंखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ? ..बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदनशून्यता दुनिया भर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी ! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, सन्तों और राज करनेवालों को मंजूर थी ! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।

– बाबुराव बागुल /17 जनवरी 1930 –  26 मार्च 2008/

,  एवं मातादीन हेला

1.

वर्ष 2014 में हिन्दी की प्रथम दलित कविता कही जानेवालीे एक कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1 के सौ साल पूरे हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सितम्बर माह में प्रकाशित अंक में यह कविता छपी थी।

हीरा डोम द्वारा रचित इस कविता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किस तरह यह कविता साहित्य में नयी जमीन तोड़ती है, धर्म, पूंजीवाद, सामाजिक गैरबराबरियों को वैधता प्रदान करती मौजूदा व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है, ढेर सारी बातें लिखी गयी हैं। फिलवक्त़ न मैं इसकी तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूं, न इस बहस की तरफ कि क्या उसे प्रथम दलित कविता कहा जा सकता है या नहीं ! साहित्य के सुधी पाठक एवं प्रबुद्ध आलोचक इसके बारे में मुकम्मल राय दे सकते हैं। /इतनाही याद रखना जरूरी है कि पत्रिका में छपनेवाली रचनाओं के बारे में संपादक के तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी काफी सख्त माने जाते थे। उनकी इस सख्ती का अन्दाज़ा इस बात से लगता है कि निराला – जो बाद में महाकवि के तौर पर सम्बोधित किए गए – उनकी चन्द कविताएं भी शुरूआत में उन्होंने लौटा दी थीं। लाजिम है कि हीरा डोम की इस कविता को प्रकाशित करने में भी उन्होंने अपने पैमानों को निश्चित ही ढीला नहीं किया होगा।/

कल्पना की जाए कि सरस्वती के अंक में अगर उपरोक्त कविता छपी नहीं होती तो हीरा डोम नामक वह शख्स ताउम्र लगभग गुमनामी में ही रहते। कोई नहीं जान पाता कि उत्पीड़ित समुदाय में एक ऐसे कवि ने जन्म लिया है, जिसकी रचनाओं में जमाने का दर्द टपकता है।

अलबत्ता एक दूसरे स्तर पर देखें तो अभी भी वह गुमनामी में हैं क्योंकि हम उनके बारे में और नहीं जानते। वह कहां पैदा हुए, कब गुजर गए? अपनी इस बहुचर्चित कविता के पहले या बाद में उन्होंने क्या लिखा ? क्या उनका कोई संकलन प्रकाशित हुआ था या नहीं ?

कुछ साल पहले मैंने हीरा डोम के बारे में अपनी जिज्ञासाएं हिन्दी के बेहद प्रतिष्ठित दलित साहित्यकर्मियों से साझा की थीं। रेखांकित करनेवाली बात थी कि वह भी इसके बारे में कुछ बता नहीं सके।

हीरा डोम की यह गुमनामी क्या अपवाद कही जा सकती है ?

दरअसल यह अपवाद नहीं है बल्कि यही गोया नियम है, उत्पीड़ित-शोषित तबके से आने वाले कलमकारों, रचनाकारों आदि के बारे में। स्पष्ट है कि हीरा डोम की यह गुमनामी कई अन्य गुमनामियों का रास्ता खोलती है। मिसाल के तौर पर अगर आप से पूछा जाए कि ताराबाई शिन्दे – जो महात्मा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज की कार्यकर्ती थी – और जिनकी रचना ‘स्त्राी पुरूष तुलना’ के चलते नारीवादी हल्कों में उन्हें भारत की प्रथम महिला सिद्धांतकार कहा जाता है, उनके जीवन के बारे में लोग कितना जानते हैं ? अपनी इस रचना के बाद वह कहां रहीं, उन्होंने शेष जिन्दगी किस तरह बीताई।

ताराबाई की ही नियति ज्योतिबा फुले, सावित्राीबाई फुले की अनन्य सहयोगिनी फातिमा शेख की दिखती है – जो 1848 में पुणे में दलित लड़कियो ंके लिए खोले गए स्कूल में सावित्राीबाई की साथी थी और समाजसुधार के इस काम के चलते जिन्हें भी प्रताडना झेलनी पड़ी थी – न कोई जानता है कि फातिमा शेख का बाद में क्या हुआ और न हम जानते हैं उनके भाई उस्मान शेख के बारे में जिन्होंने सावित्राीबाई एवं ज्योतिबा को अपने घर में आसरा दिया था, जब ज्योतिबा केे पिता ने उनके सामाजिक कामों के चलते उन्हें घर से निकाल दिया था।

अगर विगत दो सदी के भारत के इतिहास पर निगाह डाली जाएं तो हम ऐसी तमाम शख्सियतों से मिल सकते हैं।

लाजो एवं मातादीन हेला को ही देखें, जो 1857 के ऐतिहासिक समर के तमाम विवरणों में कहीं खो गए हैं, जबकि मंगल पांडे जैसी जांबाज सिपाही को बाग़ी बनाने में उनकी भूमिका दस्तावेजों में दर्ज है। 2 मंगल पांडे के बारे में या 1857 में उन्होंने दिखाए पराक्रम के बारे में इतिहास की किताबें ही नहीं बॉलीवुड की फिल्में भी खूब बातें करती हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि उन्होंने बेमिसाल बहादुरी का परिचय दिया और मौत को गले लगाने में संकोच नहीं किया।

इसके लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि किस तरह उसके लोटे से पीने का पानी मांगने पर आगबबूला हुए मंगल पाण्डे को अंग्रेजी पलटन में स्वच्छकार मातादीन ने ललकारा था, बन्दूकों के कारतूसों में लगने वाली गाय और सूअर की चरबी की परिघटना के बारे में अवगत कराया था और कहा था कि गाय की चरबी से बनी कारतूस को मुंह से काटने पर तो उसका धर्म बिगड़ता नहीं, लेकिन अगर कोई गैरजाति का व्यक्ति पीने का पानी मांगे तो उसका धर्म ढह जाता है। यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है कि मातादीन की इस भूमिका के पीछे उसकी पत्नी लाजो की सक्रियता थी। अंग्रेज अफसरों के टेण्ट में सफाई का काम करनेवाली लाजो को ही किसी अंग्रेज अफसर के मार्फत यह बात पता चली थी कि किस तरह कारतूसों के इस्तेमाल में गाय-सूअर की चरबी का इस्तेमाल हो रहा है।

मंगल पांडे का नाम मनमस्तिष्क पर अंकित हो जाना और लाजो-मातादीन का कहीं विलुप्त हो जाना ! माजरा क्या है ? एक युवा पत्राकार की बिल्कुल अलग संदर्भ में लिखी बात यहां गौरतलब जान पड़ती हैं जिसमें वह कहते हैं कि

‘‘स्मृतिया महज अतीत की घटनाओं का समुच्चय नहीं होती, जिन्हें हम सामूहिक तौर पर याद रखते हैं ; वह निर्धारित होती है हमारी जिन्दगी के वर्चस्वशाली आख्यान से, जिसे हुकूमत पर काबिज लोग प्रचारित करते हैं। वह इस कथन से अधिक जटिल होती है कि ‘‘जीतनेवाले इतिहास लिखते हैं ’’। हुक्मरान उसे अपने हिसाब से उसका पुनर्लेखन नहीं कर सकते है जब तक वे जो उस समूची कहानी को जानते हैं खामोश न हो जाएं …(https://www.theguardian.com/commentisfree/2018/may/31/turkey-poland-rightwing-populism )

अब चूंकि लाजो-मातादीन की कहानी बयां कर सकनेवाले लोग ही ‘‘खामोश रहे थे ’’ तो फिर कौन याद दिलाएगा उनके अलख जगाने को !

दिलचस्प है कि एक तरफ जहां उत्पीड़ित, शोषित तबकों से आनेवाले या उनकी नुमाइन्दगी करनेवाले लोगों को, उनके नायकों को इतिहास की किताबों में स्थान नहीं मिलता वहीं दूसरी तरफ अगर यदा कदा उन्हें तवज्जो मिलती भी है तो उनकी विक्रत छवि अधिक प्रचारित की जाती है। हम कैसे भूल सकते हैं कि कार्ल मार्क्स – जिन्होंने दुनिया के शोषितों के लिए मुक्ति का फलसफा रचा उन्हें लम्बे समय तक पूंजीवादी मीडिया ‘‘लाल आतंकी’’ जैसे लब्जों से नवाजता था या ऐसे ही किसी विशेषण अक्तूबर क्रांति के कर्णधार कामरेड लेनिन के संदर्भ में पहले इस्तेमाल होते थे, यह अलग बात है कि जब रूस में सफल इन्कलाब हुआ तो पूंजीवादी मीडिया को ही अपनी भाषा बदलनी पड़ी।

2.

रेखांकित करनेवाली बात यह है कि भारत में वर्चस्वशाली चिन्तन – जिसे आप मनुवाद कहें या ब्राहमणवाद कहें – का दबदबा इस प्रकार रहा है कि उसने न केवल शख्सियतों को ‘गायब’ कर दिया, तवारीख के पन्नों से विलुप्त कर दिया या उनका कोई विक्रत चित्राण पेश किया, साथ ही साथ उसने इस बात का भी ध्यान रखा कि हक़ीकत का इकहरा आख्यान ही लोगों तक पहुंचे, मगर दूसरा पक्ष वास्तव में क्या कहता है इसका पता तक न चले।

चार्वाक 3 को देखें – जो मानते थे कि ‘मिथकों, रीति रिवाजों का निर्माण ब्राहमणों ने किया है ताकि लोगों को सज़ा दी जा सके या उन्हें पुरस्क्रत किया जा सके। लोगों को नियंत्रित करने के लिए निर्मित की गयी जाति व्यवस्था पर जिनका मुख्य जोर था’, जिनके नाम से चर्चित दर्शन की इस प्रणाली ने ज्ञान के एकमात्रा स्त्रोत के तौर पर संवेदन/अनुभूति/परसेप्शन को ही तवज्जो दी थी और बोध से ज्ञात पदार्थ को ही सच्चाई माना, जिसका गठन चार तत्वों से हुआ था। और बुद्धि इन चार तत्वों का ही उत्पाद थी – तो क्या कहा जा सकता है। मालूम हो कि उनके तमाम ग्रंथ नष्ट कर दिए गए। यह अलग बात है कि भारतीय दर्शन में खंडन मंडन की परम्परा चलती आयी है, जिसके तहत दर्शन की अन्य शाखाओं ने चार्वाक को खारिज करने के लिए ही सही उसके विचारों को / अपने हिसाब से/ रखा तथा बाद में उनका खंडन किया, जिसके चलते हम उनके विचारों की थोड़ी बहुत झलक पा जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार से लेकर दावतों तक में चार्वाक / या उनके अनुयायी/ मज़ाक का पात्रा बना दिए गए हैं। 4

फातिमा शेख या लाजो एवं मातादीन के बहाने लेख के पहले हिस्से में 19 वीं सदी के मध्य के कुछ प्रसंगों की चर्चा हुई है तो थोड़ा आगे बढ़ कर आज़ादी के आन्दोलन को और विस्तार से देखें, जिसे उसकी समाप्ति के सत्तर सालों बाद अभी भी स्याह एवं श्वेत की बायनरी में ही देखा जा रहा है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि अंग्रेजों का यहां आगमन किन्हीं उदात्त उददेश्यों के तहत नहीं हुआ था, और भारत जैसे देश को उपनिवेश बनाने में यहां की जनता के व्यापक कल्याण का उनका उददेश्य कत्तई नहीं था। यह भी स्पष्ट है कि ब्रिटिशों द्वारा मुल्क के बड़े हिस्से पर कायम सैनिक एवम प्रशासकीय नियंत्राण के बाद मुल्क में खुली लूट का दौर जारी रहा, किस तरह जमीन पर लादे गये करों और असमान व्यापार विनिमय के चलते भारी मात्रा में राजस्व को इंग्लैंण्ड भेजा जाता रहा, किस तरह अंग्रेजों द्वारा जारी इस लूट का प्रभाव यह था कि बड़े बड़े अकाल पड़े जिसमें सूबा बंगाल की लगभग एक तिहाई आबादी कालकवलित हो गयी।

अलबत्ता अभी भी इस बात की पड़ताल नहीं की जाती कि अंग्रेजों के आगमन का जातियों, वर्गों में बंटे भारतीय समाज पर किस तरह अलग अलग किस्म का प्रभाव पड़ा, क्या वह उतने ही खुश/नाखुश थे अंग्रेजों के आगमन से जिस तरह बाकी तबके थे ; न इस बात की विवेचना की जाती है कि आखिर भारतीय समाज की वह कौनसी आंतरिक विसंगतियां, दरारें थीं जिसके चलते सात समुन्दर पार से आए बर्तानवियांे को दुनिया के इस विशाल भूभाग पर नियंत्राण करना मुमकिन हुआ।

आखिर असहज कर सकनेवाले इन प्रश्नों को पूछने से कौन और किसे रोक रहा है ?

अगर हम दलितों को ही देखें तो उनके लिए ब्रिटिशों का आगमन किस मायने में ब्रिटिशपूर्व राजे रजवाड़ों के शासन से अलग था ? 1818 में पेशवाओं की हार हुई और अंग्रेजों ने उनके नियंत्राणवाले हिस्से पर भी कब्जा किया। कैसे हालात थे दलितों के पेशवाओं के शासन के अन्दर ! अपने आलेख ‘जातिभेद का उन्मूलन’ में डा अम्बेडकर ने पेशवाओं के शासन में दलितों की स्थिति पर रौशनी डाली है:

‘मराठा देश के पेशवाओं के शासन में यदि एक हिन्दू आ रहा है तो उस आम रास्ते का प्रयोग एक अछूत को करने की अनुमति नहीं थी ताकि उसकी छाया से भी हिन्दू अपवित्रा न हो जाये। हिन्दू गलती से भी छूकर अपने को अपवित्रा होने से बचा सके इसलिए अछूतों के लिए अनिवार्य था कि वे अपनी कलाई या गले में प्रतीक या चिन्ह स्वरूप काला डोरा बांधे। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिए कमर पर झाडू बांध कर चलना आवश्यक था तथा अपनी गर्दन में मिट्टी का बर्तन लटका कर चलना आवश्यक था’ ताकि हिन्दू अपवित्रा न हो जाये।’

अंग्रेजी शासन कायम होने के बाद कमसे कम मनुस्मृति के विधान पर संचालित पेशवा के नेतृत्व वाले सामाजिक ढांचे में तब्दीलियों का – जातिभेद के अनुसार मानी गयी उच्च-नीच की अवधारणा और भेदभाव के समाप्त हो जाने का – रास्ता खुला। पेशवाओं के राज में अगर जातिभेद की विषमता और आपसी भेदभाव को कानून मान कर उसे सख्ती से लागू करना शासक अपना कर्तव्य समझते थे, यहां तक कि रहन-सहन, पोशाक, रीति-रिवाज आदि के बारे में ब्राह्मणों का अनुकरण करना भी कानूनन अपराध माना जाता था, उस पर रोक लगी।

ध्यान दिया जा सकता है कि ब्रिटिश हुकूमत को लेकर दलितों के अलग रूख को – लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन हेतु अम्बेडकर ने जो आलेख प्रस्तुत किया था, जो बाद में ‘अनटचेबल्स एण्ड द पैक्स ब्रिटानिका’ नाम से उनकी संकलित रचनाओं में शामिल किया गया – उसमें देखा जा सकता है। इसमें वे बताते हैं कि

‘वे कौन लोग थे जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में भरती हुए और जिन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटिशों की मदद की ? मैं जो उत्तर दे सकता हूं और – वह काफी सारे अध्ययन पर आधारित है – कि वे लोग जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बनायी गयी सेना में शामिल हुए वह भारत के अछूत थे। प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के साथ जो लोग लड़े वे दुसाध थे और दुसाध अछूतों की श्रेणी में आते हैं। कोरेगांव की लड़ाई में जो लोग लड़े वे महार थे और महार अछूत होते हैं। इस तरह चाहे उनकी पहली लड़ाई या आखरी लड़ाई हो अछूत ब्रिटिशों के साथ लड़े और उन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटेन की मदद की। इस सच्चाई को मार्केस आफ टिवडलीडेल ने पील आयोग के सामने पेश अपनी नोट में रेखांकित किया है, जिसका गठन भारतीय सेना के पुनर्गठन के बारे में रिपोर्ट तैयार करने के लिये 1859 में किया गया था।

ऐसे कई हैं जो अछूतों द्वारा ब्रिटिश सेना में शामिल होने को देशद्रोह का दर्जा देते हैं। देशद्रोह हो या न हो, अछूतों की यह कार्रवाई बिल्कुल स्वाभाविक थी। इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है कि किस तरह एक मुल्क के लोगों के एक हिस्से ने आक्रमणकारियों से सहानुभूति दिखायी है, इसी उम्मीद के साथ कि आगुंतक उन्हें अपने देशवासियों के उत्पीड़न से मुक्ति दिला देगा। वे सभी जो अछूतों की आलोचना करते हैं उन्हें चाहिये कि वे अंग्रेज मजदूर वर्ग द्वारा जारी घोषणापत्रा को थोड़ा पलट कर देखें।’’

प्रश्न उठता है कि अंग्रेजों की सेना में दलितों की इस भागीदारी को किस तरह परिभाषित किया जाए ?

जाहिर है कि मौजूदा विमर्श में न केवल ब्रिटिश आगमन की द्धंद्धात्मक पद्धति से विवेचना की जाती है ताकि हम इस आगमन में निहित दो परस्पर विरोधी लगने वाले पहलुओं को सामने ला सकें, मगर होता यही है कि चीजों को ‘ब्लैक’ और ‘व्हाईट’ में देखने की हमारी आदत के चलते हम वहीं कदमताल किए जाते हैं। ब्रिटिश आगमन की कोई महीन समझदारी विकसित नहीं कर पाते।

एक क्षेपक के तौर बता दें कि इस मामले में मार्क्स बिल्कुल नयी जमीन तोड़ते हैं। 5

अगर मार्क्स-एंगेल्स की रचनाओं, खासकर 1857 के महासमर पर प्रकाशित उनके लेखों के संकलन को देखें तो आप को दोनों किस्म के लेख मिलेंगे, एक तरफ जहां वे बर्तानवी औपनिवेशिक हुकूमत के विध्वंसात्मक प्रभावों की बात करते मिलते हैं वहीं वे उसके ‘पुनर्जननात्मक’(रिजनरेटिव) प्रभावों की बात भी करते दिखते हैं। उन्होंने यहभी कहा कि ‘यह सही है कि इंग्लैंड ..हिन्दुस्तान में एक सामाजिक क्रान्ति कर रहा है, निकृष्टतम स्वार्थों से प्रेरित है और उन्हें लागू करने का उसका तरीका मूर्खता से भरा है। ’ कहने का तात्पर्य यह है कि जिस द्वंद्वात्मक भौतिकवादी पद्धति का अनुसरण उन्होंने पूंजीवाद के विश्लेषण में किया, उसी तरह उन्होंने उपनिवेशवाद को भी अपनी पैनी नज़र से समझने एवम उस पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश की।

आज़ादी के आन्दोलन में फुले – पेरियार – अययनकली – अम्बेडकर जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों की भूमिका को प्रश्नांकित करता आया वर्चस्वशाली चिन्तन कभी इस बात पर गौर नहीं करना चाहता कि किस तरह इस धारा ने राष्ट्र निर्माण की अलग धारणा पेश की थी और यह बुनियादी सवाल उठा दिया था कि जातियों में बंटे समाज में क्या ‘‘राष्ट्र’’ की धारणा आकार भी ले सकती है। महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपनी चर्चित किताब ‘सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक’ (प्रकाशन: 1891) में पूछा था:

आर्यों के पाखण्डी, स्वार्थी धर्म की वजह से धूर्त आर्य ब्राह्मण अज्ञानी शूद्रों को नीच मानते हैं। अज्ञानी शूद्र अज्ञानी महारों को नीच मानते हैं। और अज्ञानी महार लोग मातंग को नीच मानते हैं। लेकिन अतिशुद्ध आर्य ब्राह्मण शूद्रादि-अतिशूद्रो को नीच मान कर ही नहीं रूकते, बल्कि उन्होंने इन सभी लोगों में आपस में रोटी व्यवहार और बेटी-व्यवहार नहीं होना चाहिए, इसलिए प्रतिबन्ध भी लगाए हैं। मतलब उन सभी के भिन्न-भिन्न प्रकार के आचार-विचार, खाना-पीना, रस्म-रिवाज आपस में एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। फिर ऐसे अट्ठारह प्रकार के लोगों में एकता होकर उनकी चटपटी नमकीन, मतलब, एक जान जीव (एकात्म समाज)  ‘Nation’  कैसे बन सकेगा ?

( ज्योतिबा फुले रचनावली -2, पेज 165)

1857 के महासमर के लगभग अस्सी साल बाद 1936 में प्रकाशित अपनी रचना ‘जातिभेद का उन्मूलन’ (पेज 35-36, सागर प्रकाशन, मैनपुरी) में डा. अम्बेडकर ने इसी प्रश्न को अलग ढंग से पूछा था और जाति आधारित संरचना को देखते हुए उसके अन्दर ‘राष्ट्र जैसी भावना’ के विकसित होने में समस्याओं का उल्लेख किया था:

हिन्दू समाज जैसा कोई अस्तित्व में नहीं है। यह केवल जातियों का संग्रह है। प्रत्येक जाति को अपने अस्तित्व की चेतना है, उनका प्रथम और अन्तिम उद्देश्य उनके अस्तित्व को जीवित रखने में है। जातियां संघ का निर्माण भी नहीं करती हैं। किसी जाति की भावना यह नहीं कि यह दूसरी जातियों से सम्बधित है। यह भावना माना हिन्दु-मुस्लिम झगड़ों के समय होती है, दूसरे सभी अवसरों पर प्रत्येक जाति केवल अपने में ही सीमित रहती है।… समाजवादी जिसे सामाजिक चेतना कहते हैं हिन्दुओं में उनका अत्यन्त अभाव है। किसी हिन्दू में सामाजिक चेतना नहीं है, प्रत्येक हिन्दू में जो चेतना पायी जाती है वह है उसकी जाति चेतना है। यही कारण है कि हिन्दू क्यों समाज, राष्ट्र नहीं बनाते कहा जाता है ? फिर भी अनेक भारतीय है जिनकी देशभक्ति उन्हें यह स्वीकार करने की अनुमति नहीं देती कि भारतीय एक राष्ट्र नहीं है और वह मनुष्यों की एक निरूद्देश्य भीड़ है। वे आग्रह करते हैं कि जो विषमताएं दिखाई देती हैं उनके बीच मूलभूत एकता है जो हिन्दुओं की जीवन पद्धति में देखी जा सकती है जैसे सारे भारत के हिन्दुओं में आदत, विश्वास और विचार में समानता पाई जाती है। परन्तु यह निष्कर्ष कोई स्वीकार नहीं कर सकता है कि इसीलिए हिन्दू एक समाज हैं।

क्या राष्टनिर्माण की यह वैकल्पिक समझदारी नहीं है, मगर वह समाज के बहस मुबाहिसे का हिस्सा नहीं बनी क्यांेकि वर्चस्वशाली तबकों के लिए जिन्होंने बर्तानिया की हुकमत बनाम भारतीय अवाम नामक बाइनरी को लगभग स्थापित कर दिया था, जिसमें इस तरह के अलग किस्म के प्रश्नों की गुंजाइश नहीं थी।

3.

यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह मनुवाद या ब्राहमणवाद के इस दबदबे ने समाज के विशाल हिस्से को ज्ञान से वंचित रखा तथा उसे मनुष्य से कमतर जीवन जीने के लिए सदियों तक मजबूर किया। भारत का यह श्रेणीबद्ध समाज – जिसे वैधता ही नहीं बल्कि दैवी स्वीक्रति प्राप्त थी – जो अन्दर से बेहद बंट गया था वह बाहरी आक्रमण के लिए गोया मुफीद जमीन बन गया। यह अकारण नहीं कि बुद्ध धर्म की अवनति और ब्राहमण धर्म के उत्थान के बाद यहां एक के बाद बाहरी आक्रमणों का सिलसिला शुरू हुआ।

इस पूरी आपाधापी में यह बात छूट जाती है कि इसके दबदबे ने तकनीकी कला और वैज्ञानिक भावना का लोप आम बन गया। इस मामले पर बहुतों ने लिखा है, ‘प्राचीन भारत में विज्ञान’ शीर्षक किताब / सेतु प्रकाशन, दिल्ली, 2009 / में प्रख्यात विज्ञान लेखक गुणाकर मुले ने रौशनी डाली है, सेवा सिंह ने ‘ब्राहमणवाद और जनविमर्श’ / आधार प्रकाशन, 2012/ में चर्चा की है। फिलवक्त़ हम इस मामले में डा प्रफुल्ल चंद्र रे, जो विद्वान, देशभक्त थे और ब्रिटिश काल में रसायन के क्षेत्रा के अग्रणी थे, उनके विचारों पर गौर करेंगे। मुल्क में सबसे पहली आधुनिक रासायनिक फैक्टरी ‘बंगाल केमिकल वर्क्स’ की स्थापना करनेवाले डा रे के विचार ‘‘ए हिस्टरी आफ हिन्दू केमिस्टी फ्रॉम  द एर्लिएस्ट टाईम्स टू द मिडल आफ द सिक्सटिन्थ सेंचुरी ए.डी.’ शीर्षक से उनकी दो खंडों में प्रकाशित किताब में मिलते हैं। पहला खण्ड 1903 में आया तो दूसरा खण्ड 1909 में प्रकाशित हुआ था। नीचे दिए गए लम्बे उद्धरण में वह बता रहे हैं कि शुरूआती मध्ययुगीन भारत में विज्ञान की अवनति/पतन कैसे हुई ?6

‘‘वैदिक युग में ऋषि या पुरोहित अपने स्तर पर किसी विशिष्ट जाति का निर्माण नहीं करते थे मगर अपनी रूचियों या सुविधाओं के अनुसार अलग अलग पेशों का पालन करते थे।.. मगर यह सब बदल गया जब बौद्ध धर्म के ढलान या उसके निष्कासन के साथ ब्राहमणों ने अपना वर्चस्व कायम किया।

जाति प्रथा अधिक सख्त रूपों में नए सिरे से पुनर्स्थापित कर दी गयी। मनु और बाद के पुराणों का रूझान पुरोहित तबके के महिमामंडन की दिशा में दिखता है, जिसने जबरदस्त अहंकारी और अपमानजनक बहानों का बढ़ावा दिया। सुश्रुत के मुताबिक लाशों की चीरफाड़ शल्यक्रिया के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है और इस समझदारी के तहत प्रयोग और अवलोकन से हासिल ज्ञान पर अधिक जोर दिया जाता था। मगर मनु के लिए वह कुछ मंजूर नहीं था। लाश का महज स्पर्श, मनु के मुताबिक, ब्राहमण जैसे पवित्रा व्यक्ति को दूषित कर सकता था। इस तरह हम देखते हैं कि वाग्भट के समय के बाद, नश्तर लगाने की छुरी के इस्तेमाल को भी निरूत्साहित किया जाने लगा और शरीरशास्त्रा और शल्यक्रिया दोनों  पीछे पड़ते गए ..लुहारखाने में एक आंख के दैत्य की तरह पसीना बहाना भी अब उतना ही अप्रतिष्ठित हो गया। …

‘‘ कला को इस तरह निम्न जातियों के लिए सौंप कर और पेशों को आनुवंशिक बना कर, निश्चित ही एक हद तक सुंदरता, निपुणता हासिल की गयी मगर इसके लिए भारी कीमत अदा करनी पड़ी। समुदाय के बौद्धिक तबके ने इस तरह कला में सक्रिय भागीदारी से दूरी बना ली, परिघटना की क्या और कैसे, – कारण और परिणाम का समन्वयन – का मामला छूटता गया और खोज की प्रव्रत्ति धीरे धीरे समाप्त होती गयी ..। भारत ने एक बार प्रायोगिक और आगमनात्मक/निगमनात्मक/ इंडक्टिव विज्ञानों से तौबा की। उसकी भूमि किसी बॉयल, देकार्त या न्यूटन के जनम के लिए नैतिक तौर पर बेकार हो गयी और उसका नाम तक वैज्ञानिक दुनिया के नक्शे से हट गया। ..

इस अनुच्छेद के अन्त में, जहां वह लिखते हैं कि ‘‘भारत ने एक बार प्रायोगिक और आगमनात्मक/निगमनात्मक/ इंडक्टिव विज्ञानों से तौबा की’’ वह एक फूटनोट भी देते हैं, जो बहुत मार्मिक है, जिसमें लिखा गया है:

‘‘वेदान्त दर्शन, जिसे शंकर द्वारा संशोधित और विस्तारित किया गया, जो भौतिक जगत की अयथार्थता/कल्पना की शिक्षा देता है, वह काफी हद तक भौतिक विज्ञानों के अध्ययन को बदनाम करने के लिए जिम्मेदार है। कणाद और उसकी प्रणाली की भर्त्सना करने में शंकर बहुत निर्मम दिखते हैं।’’

4.

ब्राहमणवाद ने भारतीय समाज को तथा विशेषकर हिन्दी समाज को किस तरह प्रभावित किया है, इस चर्चा को काफी दूर तक ले जाया जा सकता है। विडम्बना ही है कि प्रबुद्ध कहे जा सकने वाले समाज में अभी भी इसका गहराई तक एहसास नहीं है। वरना अभी भी यह स्थिति क्यों बनी है कि न हिन्दी की पाठयपुस्तकों में न स्वामी अछूतानन्द को स्थान मिला है, न ललई सिंह यादव ‘पेरियार’ स्थान पा सके हैं और न ही रामस्वरूप वर्मा जैसे मानववादी चिन्तक के विचारों को और उनकी अगुआई में चले सामाजिक सांस्क्रतिक आन्दोलन के बारे में बताया जा रहा है।

वही स्वामी अछूतानन्द जिन्होंने कहा था:

निश दिन मनुस्मृति ये, हमको जला रही है।

ऊपर न उठने देती, नीचे गिरा रही है।।

ऐ हिन्दू कौम! सुन ले, तेरा भला न होगा,

जो बेकसों को ‘हरिहर’ गर तू रूला रही है।7

संदर्भ

1

हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी

हमनी के सहेब से मिनती सुनाइबि।

हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते,

हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।

पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,

बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,

हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे,

बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि ।।१।।…..

हीरा डोम

(http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=954&pageno=1 )

  1. नं. 70, बंगाली पलटन के कैप्टन राइट द्वारा मेजर बांेंटीन, दमदम के नाम 22 जनवरी 1857 को लिखी चिट्ठी – सन्दर्भ, दलितों की भागीदारी, अनिल चमडिया, लोकमत समाचार, दीपावली विशेषांक, 206

3

चार्वाक का मशहूर उद्धरण है

न कोई स्वर्ग है, न अंतिम मुक्ति

न दूसरी दुनिया में कोई अन्य आत्मा,

न चार जातियों की सक्रियता या उनके आदेश

कुछ असली प्रभाव पैदा कर पाते हैं ।

अग्निहोत्रा, तीनों वेद, न साधु की तीन लाठियां और

न राख से अपने आप को पोतना ,

इन सभी का निर्माण प्रक्रति ने ऐसे लोगों के जीवनयापन के लिए किया

जो ज्ञान और पुरूषार्थ से वंचित थे।

4.

उनके फलसफे के तौर पर यही श्लोक अधिक चर्चित रहा है:

‘‘यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृक्रत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः’’

इसका अर्थ है कि जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नही है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है ?

5.

ब्रिटिश उपनिवेशवाद का आगमन भारतीय समाज को किस तरह प्रभावित कर रहा है उसे समझने में भी मार्क्स की गहरी रूचि थी, वहीं वह इस समस्या से भी रूबरू थे कि सदियों पुराने स्थिर, सामाजिक आधार को तोड़े बगैर ठहरे हुए ऐसे शान्त, अनाक्रामक लगने वाले समाजों की इन्सानियत क्या अपने आदर्श गंतव्य तक पहंुच सकती है। इस सिलसिले में अपनी समझदारी व्यापक समुदाय के साथ साझा करने के लिए उन्होंने कई सारे लेख लिखे जो न्यूयॉर्क से प्रकाशित प्रगतिशील विचारों वाले अख़बार ‘न्यूयार्क डेली ट्रिब्युन’ में प्रकाशित हुए थे।

हिन्दोस्तां पर ब्रिटिश हुकूमत के प्रभावों की चर्चा करते हुए उन्होंने जहां इस बात को ठीक से पहचाना कि उसके द्वारा वहां लादे गये कहर और इसके पहले हिन्दोस्तां पर हुए आक्रमणों में क्या बुनियादी फर्क रहा है और किस तरह इसके पहले के आक्रमणों का प्रभाव यहां के समाज के सतह के नीचे नहीं जा सका। 1857 का महासमर जब शुरू हुआ तब उन्होंने विद्रोहियों की प्रति अपनी पक्षधरता को बार बार स्पष्ट किया, इतनाही नहीं उन्होंने विद्रोहियों के हाथों अंजाम दिये गये अत्याचारों एवम बर्तानवी हुकूमत द्वारा विजित जनता पर किये गये बर्बर अत्याचारों में भी फर्क किया और यह बताने की कोशिश की कि किस तरह दोनों में अन्तर है। इतनाही नहीं भारतीय जनता पर किये गये अत्याचारों के लिए उन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों की लगातार भर्त्सना की और उनके द्वारा विद्रोहियों के अत्याचारों के अतिरंजित चित्रा पेश करने को लेकर भी उनकी खिंचाई की। इस संग्राम की व्यापकता को देखते हुए, उसमें जनता के अच्छे खासे हिस्से की सहभागिता को देखते हुए उन्होंने उसे भारतीय जनता के ‘स्वाधीनता संग्राम’ के तौर पर सम्बोधित किया। यूं तो प्राप्त सूचनाओं की अपनी सीमायें थी, इसके बावजूद उन्होंने यथार्थपरक दृष्टि से तेजी से बदलते घटनाक्रम का सटीक विश्लेषण किया।

6.

एस जी सरदेसाई, प्रोग्रेस एण्ड कांजर्वेटिजम इन एन्शेन्ट इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, पेज 188-189

  1. https://www.forwardpress.in/2016/09/achootanand-dalit-aandolan-ke-aadhar-stambh

उनकी एक और रचना है

..शूद्रों गुलाम रहते, सदियाँ गुजर गई हैं।

जुल्मों सितम को सहते, सदियाँ गुजर गई हैं।

अब तो जरा विचारो, सदियाँ गुजर गई हैं।

अपनी दशा सुधारो, सदियाँ गुजर गई हैं।

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About Subhash Gatade

Subhash Gatade ( born 1957) is a left activist, writer and translator. He has done M Tech ( Mech Engg 1981) from BHU-IT, Varanasi. He has authored few books including Modinama : On Caste, Cows and the Manusmriti ( Leftword, in press), Charvak ke Vaaris ( Authors Pride, Hindi, 2018), Ambedkar ani Rashtriya Swayamsevak Sangh ( Sugava, Marathi, 2016), Beesavi Sadi Mein Ambedkar ka Sawal ( Dakhal, Hindi, 2014), Godse ki Aulad ( Pharos, Urdu, 2013) , Godse’s Children – Hindutva Terror in India (Pharos, 2011), The Saffron Condition ( Three Essays, 2011) He also occasionally writes for children. Pahad Se Uncha Aadmi ( NCERT, Hindi, 2010)

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