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Ajit Pawar after oath as Deputy CM

महाराष्ट्र:  बाल-बाल बचा जनतंत्र, सत्ता के अपहरण की भाजपा की कोशिश विफल हो गयी

महाराष्ट्र:  बाल-बाल बचा जनतंत्र, सत्ता के अपहरण की भाजपा की कोशिश विफल हो गयी

अब जबकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिव सेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार के शिवाजी पार्क में शपथ ग्रहण (Sworn in Shivaji Park of Shiv Sena-NCP-Congress government led by Uddhav Thackeray) के साथ, महाराष्ट्र में नंगई से, छल से भी ज्यादा केंद्र में शासन के बल से, सत्ता के अपहरण की भाजपा की कोशिश विफल हो गयी है (BJP’s attempt to hijack power has failed), एक हफ्ते से भी कम का यह तूफानी घटनाक्रम एक भयंकर अघट से बाल-बाल बचने की जो सनसनी पीछे छोड़ गया है, उस पर भी एक नजर डाल लेना जरूरी है।

आखिरकार, क्या यह हमारे जनतंत्र की घातक वेध्यता को ही नहीं दिखाता है कि 288 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत से कोसों दूर होने के बावजूद और वास्तव में विधानसभाई चुनाव में जनता द्वारा पिछले चुनाव के मुकाबले सीटों में पंद्रह फीसद से ज्यादा की कमी कर, उसके नेतृत्व वाले पांच साल के शासन से साफ तौर पर नाखुशी जताए जाने के बावजूद, भाजपा सिर्फ इसलिए सत्ता पर काबिज हो गयी होती कि केंद्र में उसकी सरकार है और वह बड़े गर्व से चाणक्य नीति पर चलती है–साम, दाम, दंड, भेद; सत्ता के लिए शब्दश: हर हथियार का इस्तेमाल जायज है।

अब जबकि महाराष्ट्र का यह तूफान गुजर गया है, इस सचाई का एहसास कोई बहुत तसल्ली देने वाला नहीं है कि सिर्फ और सिर्फ दो चीजें थीं जिन्होंने, भाजपा के महाराष्ट्र में जबरन सत्ता लूटने के खेल को नाकाम किया है। जाहिर है कि इनमें पहली चीज तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी पर, बुजुर्ग मराठा नेता शरद पवार की करीब-करीब मुकम्मल पकड़ ही थी, जिसे कम कर के आंकने की गलती ने, भाजपा के सत्ता मद के साथ जुड़क़र, उसे बुरी तरह से मुंह के बल गिराया है। परिवार-आश्रित क्षेत्रीय पार्टियों के आम चरित्र की ही पुष्टि करते हुए, शरद पवार ने अपने महत्वाकांक्षी भतीजे, अजीत पवार की बगावत को उसे इस कदर अकेला कर के विफल कर दिया कि उसे आखिरकार, उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर, चाचा की शरण में वापस आना पड़ा।

यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा, अजीत पवार की बगावत पर दांव लगाकर या सिंचाई घोटाले से संबंधित आरोपों से उसकी गर्दन छुड़ाने की शुरूआत करने तक ही नहीं रह गयी थी।

खबरों के अनुसार मुंबई के सबसे बड़े उद्यमी के निजी विमान से अजीत पवार समर्थक विधायकों का मुंबई से बाहर ले जाने से लेकर, एनसीपी समेत सभी विरोधी पार्टियों के विधायकों के होटलों में जासूसी कराने सहित, हर तरह के संसाधन उसने एनसीपी की बगावत को सफल करने के लिए लगाए थे। इसके बावजूद, शरद पवार ने साबित कर दिया कि एनसीपी में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं खटक सकता है।

The thing that blocked the path of loot of BJP

कहने की जरूरत नहीं है कि अगर शरद पवार के लिए इस सचाई को इतने जोरदार तरीके से साबित करना संभव हुआ, तो इसमें उन्हें इसके भरोसे की भी मदद हासिल थी कि वह चुनाव के नतीजे आने के बाद से जिस गैर-भाजपा गठबंधन (Non-BJP alliance) का प्रयास कर रहे थे, वह एक अर्से  से सत्ता से दूर बनी हुई एनसीपी को, सचमुच सरकार में साझीदारी तक पहुंचा सकता था।

भाजपा की सत्ता की लूट का रास्ता रोकने वाली दूसरी चीज, जैसाकि सभी जानते ही हैं, सुप्रीम कोर्ट ही साबित हुई। शनिवार को सुबह तडक़े जिस तरह चोरी-छिपे और वास्तव में तख्तापलट के अंदाज में राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने देवेंद्र फडनवीस और अजीत पवार को क्रमश: मुख्यमंत्री तथा उप-मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलायी (हालांकि, उप-मुख्यमंत्री के पद की शपथ की वैधता अपने आप में संदिग्ध है), उसके खिलाफ शिव सेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका पेश की गयी, उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा छुट्टी के बावजूद उसी रोज विचार के लिए एडमिट ही नहीं कर लिया गया, रविवार होते हुए भी अगले ही दिन उस पर सुनवाई भी शुरू कर दी गयी।

इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के और देवेंद्र फडनवीस तथा अनाम भाजपा विधायकों के वकीलों की, सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के अनुचित या गैर-जरूरी होने की दलीलों से लेकर, मामले को टालने की तिकड़मों तक को खारिज कर दिया और अगले ही दिन राज्यपाल के शपथ दिलाने के निर्णय से जुड़े, समर्थन के पत्र तथा राज्यपाल की ओर से सरकार बनाने का आमंत्रण जैसे दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया।

अगले दिन, इन दस्तावेजों को देखने और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला अगली सुबह साढ़े दस बजे तक के लिए सुरक्षित कर दिया।

मंगलवार की सुबह, सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति के बाद, विधायकों को शपथ दिलाए जाने के बाद, अगली ही शाम पांच बजे से विधानसभा में बहुमत का परीक्षण कराए जाने का जो आदेश दिया, उसके बाद के घटनाक्रम के बारे में सभी जानते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (Supreme Court’s decision on the coup in Maharashtra) के घंटे भर के अंदर-अंदर नव-नियुक्त उप-मुख्यमंत्री के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर इस्तीफा देने की खबर आ चुकी थी और इसके घंटे भर में ही मुख्यमंत्री की प्रैस कान्फ्रेंस की घोषणा आ चुकी थी और फडनवीस के भी इस्तीफा देने की अटकलें लगायी जाने लगी थीं। साढ़े तीन बजे संवाददाता सम्मेलन ने फडनवीस ने इस्तीफा देने के फैसले का एलान भी कर दिया।

The decision of the Supreme Court made the game of power-hijacking ‘over’

खबरों के अनुसार, दिल्ली में भाजपा की शीर्ष जोड़ी ने विधानसभा में निश्चित हार से होने वाली और किरकिरी से बचने के लिए, उन्हें फौरन इस्तीफा देने का निर्देश दिया था।

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए, यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ही सत्ता-अपहरण का ‘खेल खत्म’ कराया था। वर्ना जैसाकि सुप्रीम कोर्ट में ही उजागर हुआ, कोश्यारी ने फडनवीस को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए पूरे 14 दिन का समय दिया था।

और जैसाकि खबरों से और खुद भाजपा के जिम्मेदार नेताओं के बयानों से जाहिर था, गुप्त कार्पोरेट चंदों के बड़े ताल में ऊब-चूभ हो रही सत्ताधारी पार्टी को इससे बड़ी उम्मीदें थीं कि ‘बाजार में और विधायक हैं’ और उसके पास खरीदने की अकूत ताकत थी।

Capturing the country’s financial capital !

वास्तव में, फडनवीस को आधी-रात के षडयंत्र के जरिए मुख्यमंत्री के पद पर बैठाए जाने के फौरन बाद, इस धतकर्म का बेशर्म हमले के जरिए बचाव करते हुए, केंद्रीय कानून मंत्री, रविशंकर प्रसाद जैसे तैश में ‘देश की वित्तीय राजधानी पर कब्जा करने’ के अपने विरोधियों के षडयंत्र पर आग बरसा रहे थे, उसमें कहीं न कहीं इसका भी इशारा था कि राजनीति में हजारों करोड़ रुपए सलाना के वैध-अवैध कार्पोरेट निवेश पर लगभग एकछत्र कब्जा कर चुकी भाजपा के लिए, उस महाराष्ट्र में सत्ता पर कब्जा करना क्यों अतिरिक्त रूप से जरूरी था, जिसकी राजधानी मुंबई है!

आखिरकार, मोदी सरकार की चुनावी बांड योजना के लागू होने के बाद गुजरे करीब डेढ़ साल में, कुल 6 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के जो चुनावी बांड धन्नासेठों द्वारा राजनीतिक पार्टियों को दिए गए हैं, उनमें से करीब 30 फीसद यानी पूरे 1,880 करोड़ रु0 के बांड देश की इस वित्तीय राजधानी में ही खरीदे गए थे। अचरज नहीं फडनवीस सरकार के समर्थन के लिए विपक्षी विधायकों को सौ करोड़ रु0 तक के ऑफर दिए जाने की खबरें थीं।

जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने फौरन, शक्ति परीक्षण कराने के आदेश के जरिए, भाजपा को कथित चाणक्य नीति के अवैध हथकंडों से अपने प्रकट अल्पमत को बहुमत में तब्दील करने का मौका नहीं दिया, जिसमें भाजपा महारत हासिल कर चुकी है।

वास्तव में 2014 में नरेंद्र्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भाजपा ने जितने राज्यों में बहुमत के बल पर या विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बल पर सरकार बनायी थी, उससे ज्यादा नहीं तो कम से कम उतने ही राज्यों में उसने विधानसभा में दूसरों से पीछे छूट जाने के बाद भी, सिर्फ दूसरी पार्टियों के साथ गठजोड़ कर के ही नहीं, दूसरी पार्टियों को तोडऩे तथा विधायकों व छोटी-छोटी पार्टियों को भी खरीदने के जरिए, सरकारें बनायी थीं। मणिपुर, मिजोरम आदि उत्तर-पूर्वी राज्यों अलावा गोवा इसका खास उदाहरण रहा है। और कर्नाटक में तो येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने ‘ऑपरेशन कमल’ के नाम से, दूसरी पार्टियों में दलबदल करा के अपनी सरकार बनाने की एक खास ‘तकनीक’ ही ईजाद की है, जिसका जिक्र महाराष्ट्र के हाल के संकट के दौरान में सुनाई देने लगा था।

वास्तव में, 2018 में हुए कर्नाटक के विधानसभाई चुनाव में भाजपा के बहुमत से ठीक-ठाक पीछे रह जाने और कांग्रेस तथा जनता दल (सेकुलर) द्वारा स्पष्ट बहुमत के समर्थन के आधार पर कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा किए जाने के बावजूद, मोदी सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी और उन्हें विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने के लिए दो हफ्ते से ज्यादा का समय दे दिया था। उस फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी और सुप्रीम कोर्ट ने चौबीस घंटे में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण कराने का आदेश दिया था, जिसके बाद अल्पमत को बहुमत में तब्दील करने के भाजपा के मंसूबों पर पानी फिर गया और विधानसभा में मतदान से पहले ही येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा। यह दूसरी बात है कि येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा ने फिर भी हार नहीं मानी और ‘ऑपरेशन कमल’ के जरिए, कांग्रेस-जदसे गठबंधन के करीब डेढ़ दर्जन विधायकों से इस्तीफा दिलवाकर, विधानसभा के सदस्यों की वास्तविक संख्या को ही घटाकर, अपने अल्पमत को बहुमत बना लिया और येदियुरप्पा को फिर से मुख्यमंत्री बनवा दिया। भाजपा के अल्पमत को बहुमत बनाने के लिए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले विधायकों में ज्यादातर, अब भाजपा के टिकट पर अपनी ही सीटों से उपचुनाव लड़ रहे हैं। उधर ‘ऑपरेशन कमल’ के लाभार्थी एक विधायक के दावे के अनुसार, उसने तो 700 करोड़ रु0 मांगे थे, पर येदियुरप्पा ने 1000 करोड़ दे दिए! क्यों न हो, बंगलूरु देश की वित्तीय राजधानी नहीं है तो क्या हुआ, बेल्लारी खनन माफिया की राजधानी जरूर है!

बहरहाल, खतरा सिर्फ यही नहीं है कि येदियुरप्पा की तरह देवेंद्र फडनवीस भी, सुप्रीम कोर्ट के समय न देने की वजह से कारसाज न हुए ‘आपरेशन कमल’ (Operation Lotus) या किसी अन्य नये ऑपरेशन के जरिए, दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने की कोशिश कर सकते हैं।

आखिरकार, विधानसभा चुनाव में अपनी सीटों में 15 फीसद कमी होने के बावजूद, भाजपा इसका दावा तो बार-बार कर ही रही है कि जनादेश तो फडनवीस के नेतृत्व में सरकार बनाने का ही था। डर की बात यह भी है कि ऐसे नंगे हमले से जनतंत्र को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के भरोसे सुरक्षित नहीं माना जा सकता है। और तब तो हर्गिज नहीं, जब मोदी सरकार बड़ी नंगई से उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों को प्रभावित करने की कोशिशों में लगी रही है और सुप्रीम कोर्ट के पिछले दो मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकालों में, केंद्र सरकार से संबंधित मामलों में आए अनेक निर्णयों में, इन कोशिशों का कुछ न कुछ असर भी दिखाई दिया है।

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

यह नहीं भूलना चाहिए कि महाराष्ट्र के वर्तमान मामले में भी तुरंत शक्ति परीक्षण कराने का स्वाभाविक तथा अनेक पूर्व-निर्णयों से पुष्ट निर्णय देते हुए भी, सुप्रीम कोर्ट ने छल से बनी फडनवीस सरकार को दो दिन का जो अतिरिक्त समय दिया, उससे शायद बचा जा सकता था।

आज जनतंत्र के लिए इस डर की बात करना इसलिए जरूरी है कि मोदी-शाह की जोड़ी से महाराष्ट्र में मुंह की खानी के बाद भी, कोई जनतांत्रिक सबक लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

याद रहे कि पिछले साल कर्नाटक में कुछ इसी तरह मुंह की खाने के बाद, इस बार महाराष्ट्र में उनके इशारे पर जनतांत्रिक व्यवस्था पर और मुकम्मल हमला किया गया। सेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के उद्धव ठाकरे को अपना नेता चुनने की घोषणा करते ही, इस गठबंधन के बहुमत से सरकार बनाने का दावा पेश करने से पहले ही, भाजपा को सत्ता सौंपने के मध्यरात्रि के षडयंत्र में राज्यपाल से आगे बढक़र, प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के पदों तक को बाकायदा घसीट लिया गया और चोरी-छिपे, यहां तक कि सरकारी समाचार चैनल प्रसार भारती तक की अनुपस्थिति में और भाजपा-आरएसएस समर्थक समाचार एजेंसी एएनआइ  को ही गवाह बनाकर, शपथग्रहण करा दिया गया। अगली बार… लेकिन इससे आगे क्या? संघ-भाजपा की इस तनाशाहाना मिजाज की सरकार से जनतंत्र की रक्षा करने के लिए, जनतंत्र से प्यार करने वाली ताकतों को लगातार लड़ते रहना होगा, जब तक देश को इस सरकार से मुक्ति नहीं मिल जाती है।

0 राजेंद्र शर्मा

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