Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / झारखंड लिंचिंग और आदिवासियों का हाशियाकरण
News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

झारखंड लिंचिंग और आदिवासियों का हाशियाकरण

तथ्यांवेषण रिपोर्ट : पुलिस की लापरवाही

इस मामले में पुलिस की भूमिका अत्यंत निंदनीय रही है। पीड़ितों को लगभग तीन घंटे तक बेरहमी से पीटा जाता रहा परंतु पुलिस उन्हें बचाने घटनास्थल पर नहीं पहुंची। सरोज हैबराम ने दल को बताया कि भीड़ के कुछ सदस्यों ने पुलिस को घटनास्थल पर आकर पीड़ितों को गिरफ्तार करने के लिए कहा था. पुलिस को यह भी बताया गया था कि पीड़ितों को पीटा जा रहा हैं. परन्तु पुलिस वहां नहीं पहुंची. पुलिस का कहना था कि वह रात के अँधेरे में नक्सली हमले के डर की वजह से स्थल पर नहीं गई. पुलिस थाने और जयरागी गाँव के बीच केवल 4 किलोमीटर की दूरी है. फिर, भीड़ ने एक निजी वाहन से पीड़ितों को थाने पहुँचाने का निर्णय लिया. उन्हें थाना परिसर में स्थित एक शेड में पटक दिया गया.

पुलिस को उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना था. इससे उनकी जान बच सकती थी. परन्तु वे चार घंटे तक शेड में पड़े रहे. उनका खून बहता रहा और डॉक्टरी मदद के अभाव में उनकी जान चली गई. यह साफ़ है कि हमलावर भीड़ को न तो कानून का डर था और ना ही पुलिस का. अपना काम खत्म कर लेने के बाद, भीड़ ने स्वंय पुलिस से संपर्क किया. पुलिस के कहने पर भीड़ ने पीड़ितों को थाने पहुँचाया. ज़ाहिर है कि उसे पुलिस का संरक्षण प्राप्त था.

शेड में पुलिस और अपराधियो द्वारा उन्हें फिर से पीटा गया. अतंत: 11 अप्रैल को तड़के 4 बजे पुलिस उन्हें अस्पताल ले कर गयी. प्रकाश लकड़ा शेड में ही मर गया था. पुलिस ने चिकित्सा अधिकारी पर दबाव बनाया कि अपनी रपट में वह लिखे कि लकड़ा को जब अस्पताल लाया गया तब वह जीवित था. मेडिकल ऑफिसर ने ऐसा करने से इंकार कर दिया.

पुलिस ने हासी से पीड़ितों के विरुद्ध एफ़.आई.आर दर्ज करवाई. हासी मौके पर मौजूद नहीं था परंतु पुलिस चाहती थी कि एफ.आई.आर ऐसी हो जिससे पीड़ितों पर हमले को उचित ठहराया जा सके.

एफ़.आई.आर में सुधार

सुक्खु हासी ने पीड़ितों के खिलाफ 11 अप्रैल 2019 को शाम 6.05 बजे एफ़.आई.आर दर्ज करवाई. वह मौके पर मौजूद नहीं था परंतु फिर भी उसने पूरे आत्मविश्वास से लिखवाया कि बैल जिंदा था. एफ.आई.आर, घटना के लगभग 24 घंटे बाद कायम की गई. पुलिस को घटना के बारे में आधी रात को ही पता चल गया था जब भीड़ के सदस्यों ने उसे सूचना दी थी. इसके बाद घायलों को पुलिस थाने लाया गया था. एफ.आई. आर. दर्ज करने में इस देरी का कोई कारण नहीं बताया गया. ऐसा लगता है कि देरी इसलिए हुई क्योंकि पुलिस चाहती थी कि एफ़.आई.आर ऐसी हो जिससे अपराधियों और पुलिस दोनों का बचाव हो सके.

पीड़ितों पर आरोप

पुलिस ने पीड़ितो को चिकित्सा सहायता उपलब्ध करवाने में जान-बूझकर कर देरी की. अगर ऐसा नहीं किया गया होता तो प्रकाश लकड़ा की जान बच सकती थी. एफ़.आई.आर को सुधारा भी गया है. परन्तु पीड़ितों के परिवारों, उनके गाँव के रहवासियो और नागरिक समाज को जो चीज सबसे अधिक अन्यायपूर्ण लग रही है वह यह है कि पीड़ितों को ही झारखण्ड गोवंश (वध प्रतिषेध) अधिनियम 2005 के तहत आरोपी बना दिया गया है. जब दल गाँव में था उसी दौरान सत्र न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत आवेदन ख़ारिज कर दिया गया. पीड़ितों के घाव अब भी पूरी तरह से भरे नहीं थे परंतु उन्हें गिरफ्तारी के डर से अपना गाँव छोड़कर भागना पड़ा. प्रकरण में यदि वे दोषसिद्ध हो गए तो उन्हें लंबी अवधि की सजा हो सकती है. एक पीड़ित अपने पिता की अंतिम क्रिया में शामिल नहीं हो सका क्योंकि उसे डर था कि अगर वह अपने गाँव गया तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. जहाँ तक हमलावरों का सवाल है, वे आराम से है.

कुल 40 आरोपियों में से केवल सात को गिरफ्तार किया गया है. जुरमू गाँव के रहवासियो का कहना है कि कई आरोपी खुलेआम वहां घूमते रहते है. जब पुलिस से पूछा गया कि आरोपी गिरफ्तार क्यों नहीं हुए हैं तो उसका जवाब था कि वे फरार है. पुलिस ने आरोपियों पर अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के तहत आरोप नहीं लगाए हैं.

पुलिस की मिलीभगत : मुख्य आरोपी संजय साहू, बजरंग दल से जुड़ा हुआ है

क्षेत्र में साहू समुदाय का वर्चस्व है. साहू एक हिन्दू समुदाय है, जिसके सदस्य खेती करते है, ईट भट्टे चलाते है और शराब बनाते हैं. मामले में मुख्य आरोपी संजय साहू, बजरंग दल से जुड़ा हुआ है. उसके खिलाफ कई आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं. उस पर अवैध वसूली के लिए तीन आदिवासियों की हत्या का आरोप भी है. कई मामलों में जमानत पर होने के बावजूद, साहू ने जिस तरह खुल्लम-खुल्ला हिंसा की, उससे ज़ाहिर है कि उसे पुलिस और राजनेताओं का सरंक्षण प्राप्त है. अपने पुनर्निर्वाचन के बाद, भाजपा सांसद सुदर्शन भगत ने अपना विजय जुलूस जयरागी गाँव के चौक में समाप्त किया. वे शायद अपनी पार्टी के हमलावर भीड़ से निकट रिश्तों को रेखांकित करना चाह रहे थे.

हमला योजनाबद्ध था

गाँव के लोगो ने बताया कि लिंचिंग की यह घटना आम चुनाव और रामनवमी के ठीक पहले हुई. झारखण्ड में हिन्दू श्रेष्ठतावादी काफी समय से रामनवमी का प्रयोग, समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिए करते आये हैं. इस दिन वे हथियारों का प्रदर्शन करते है और आक्रामक गीत गाते है. चूँकि आम चुनाव नजदीक था इसलिए सत्ताधारी पार्टी के लिए ध्रुवीकरण और महत्वपूर्ण बन गया था. यह हमला यकायक नहीं हुआ बल्कि पूर्व नियोजित था.

इसके पहले, 10 अप्रैल को भी आदिवासियों ने एक मृत बैल को ठिकाने लगाया था. उस समय भी साहू समुदाय के सदस्यों और आदिवासियों में तनातनी हुई थी. परंतु चूँकि यह घटना दिन के समय हुई थी इसलिए विवाद ने हिंसक स्वरूप ग्रहण नहीं किया.

साहू, मौके की तलाश में था और यह मौका उसे तब मिला जब उसने कुछ आदिवासियों को एक बैल की खाल उतारते देखा. बिना इस बात का पता लगाए कि बैल पहले से मरा हुआ था या नहीं, उसने एक घंटे में घातक हथियारों से लैस लोगों की भीड़ ज़मा कर ली. इतने कम समय में हमलावर इतने सारे हथियार ला सके, इसी से यह स्पष्ट है कि वे इसकी तैयारी कर रहे थे.

इलाके में अंतरसामुदायिक रिश्ते

जुरमु के ईसाई आदिवासियो और पड़ोसी गाँव जयरागी के साहुओं के रिश्ते अत्यंत तनावपूर्ण थे. दोनों के बीच लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक रिश्ते थे. साहू समुदाय भी मृत जानवरों को आदिवासियों को सौपते थे ताकि वे उनके मांस और खाल का उपयोग कर सके. प्रकाश लकड़ा भी एक साहू की मुर्गा बेचने वाली दुकान में काम करता था. साहू समुदाय व्यापार में भी आगे है और उसके सदस्यों की आसपास के इलाके में बहुत सी दुकानें हैं. अपने शोषण और साहूओं की दादागिरी से परेशान होकर आदिवासियों ने उनके साथ लेनदेन बंद कर दिया. आदिवासी, साहूओं की दुकानों से से खरीदारी नहीं करते हैं और न ही उनके ईट भट्टों में काम करते है. जुरमू में एक साहू और 10 हिन्दू आदिवासी परिवार रहते है. शेष 106 परिवार ईसाई आदिवासियों के हैं.

इस घटना ने आदिवासियों को धार्मिक आधार पर विभाजित कर दिया है. ईसाई आदिवासियों की अपेक्षा थी कि हिन्दू आदिवासी उनका साथ देंगे – आदिवासी होने के कारण भी और इस कारण भी कि वे उसी गाँव में रहते हैं और सही तथ्यों से वाकिफ हैं. परंतु हिन्दू आदिवासी, साहूओं के साथ खड़े हो गए. इससे ईसाई आदिवासी ठगा सा महसूस कर रहे है. जयरागी में साहू, ईसाई आदिवासी बच्चों से भी भेदभाव कर रहे है. उन्हें सार्वजनिक हैण्डपंपों से पानी नहीं लेने दिया जा रहा है. ईसाई आदिवासियों को लग रहा है कि उनके साथ विश्वासघात हुआ है. वे चाहते हैं कि लिंचिंग के दोषियों को गिरफ्तार किया जाए और उन्हें सजा मिले.

आदिवासियों की गरीबी और बीफ

झारखण्ड के आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से बेदखल कर दिया गया है और वे अपनी जीविका के साधन खो रहे हैं. उन्हें धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत कर, उनका ध्यान उनके अधिकारों के प्रजातान्त्रिक संघर्ष से भटकाया जा रहा है. आदिवासी, राजनीतिक और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से हाशिए पर हैं. अगर वे बीफ खाते हैं तो उसका कारण उनकी गरीबी है. वे इसलिए बीफ नहीं खाते ताकि वे यह दिखा सकें कि बीफ खाना उनका अधिकार है. उन्हें मृत मवेशी ठिकाने लगाने का काम सौंपा जाता है और इन जानवरों के मांस से उन्हें थोडा-बहुत पोषण उपलब्ध होता है. उनके खिलाफ हिंसा इसलिए की जाती है ताकि समाज में उनका निम्न दर्जा होने की धारणा को पुष्ट किया जा सके.

मुआवजे के लिए भी लड़ाई

प्रकाश लकड़ा का परिवार उन्हें देय मुआवजा पाने के लिए दर-दर भटक रहा है. उसका दामाद सूरज, जो बंबई में काम करता है, परिवार की सहायता के लिए जुरमू आया हुआ है. वह मुआवजे के लिए कई दिनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है परंतु उसका कोई नतीजा नहीं निकला है. माब लिंचिंग पर उच्चतम न्यायालय के मार्गनिर्देशों के अनुसार, पीड़ित चाहे किसी भी धर्म, वर्ग, समुदाय या जाति का हो, उसे 2 लाख रुपये का मुआवजा मिलना चाहिए.

सिफारिशें

  1. जुरमू के आदिवासियों पर गोहत्या से सबंधित प्रकरण वापस लिया जाना चाहिए.
  2. सामूहिक हिंसा के सभी दोषियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए .
  3. पीडितों को डॉक्टरी सहायता उपलब्ध करवाने में देरी और उन पर गोहत्या का झूठा प्रकरण दर्ज करने के लिए स्थानीय पुलिस के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए .
  4. मृतक के परिवार को 15 लाख और घायलों को 10-10 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा स्वीकृत किया जाना चाहिए.
  5. लिंचिंग के मामले में उच्चतम न्यायलय के हालिया निर्णय का पालन होना चाहिए.

निष्कर्ष:

प्रकाश लकड़ा की भीड़ द्वारा क्रूर हत्या ने जुरमू के आदिवासियो के दिलों पर बहुत गहरे घाव किये हैं. लिंचिंग के कारण दोनों समुदायों के रिश्तों में खासी खटास आ गई है. पुलिस की भूमिका संदेहास्पद और निंदनीय रही है. झारखण्ड में लिंचिंग की घटनाएँ (Incidents of lynching in Jharkhand) निरंतर जारी हैं. इसका कारण है राजनीतिक संरक्षण. आदिवासियों और मुसलमानों को दबाने के प्रयास हो रहे हैं. माब लिंचिंग को धार्मिक ध्रुवीकरण का हथियार बना दिया गया है. इससे आदिवासियों का हशियाकरण और बढेगा और भेदभाव व शोषण के खिलाफ उनकी लड़ाई कमजोर होगी.

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

About हस्तक्षेप

Check Also

Savarkar apologized to the British rulers six times

सावरकर के लिए भारत रत्न की वकालत ! आरएसएस/भाजपा ने अपनी राष्ट्र-विरोधी विरासत की ही पुष्टि की

अँगरेज़ शासकों से सावरकर ने छह बार क्षमा माँगी Savarkar apologized to the British rulers …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: