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Home / जो ‘बीमार’ नहीं है वो सवालों के घेरे में हैं ! …. रवीश को पत्र लिखने वाले को एक पत्रकार का जवाब
सुशांत जी, दरअसल ये आपका दोष नहीं है। पत्रकारिता में आयी नई पीढ़ी के लिए ये पेशा महज रोटी हासिल करने का एक साधन मात्र बनकर रह गया है।

नई दिल्ली। एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार को पत्र लिखकर ‘बीमार’ बताने वाले टीवी एंकर/ मीडियाकर्मी सुशांत सिन्हा को एक अन्य पत्रकार महेंद्र मिश्र ने जवाब देते हुए कहा है कि मौजूदा दौर में जो ‘बीमार’ नहीं है वो सवालों के घेरे में हैं !

महेंद्र मिश्र ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लंबा उत्तर पोस्ट किया है। महेंद्र मिश्र की पोस्ट का मजमून निम्न है -

प्रिय सुशांत जी,

माफ करिएगा! आपने रवीश कुमार के पीएम को लिखे पत्र के जवाब में उन्हें एक पत्र लिखा है। अमूमन तो ये काम पीएमओ या फिर उसके किसी कारिंदे का बनता है। लेकिन उसकी जिम्मेदारी आपने उठायी है। कोई मुझसे भी पूछ सकता है कि आप क्यों पत्र लिख रहे हैं इसकी जिम्मेदारी तो रवीश की थी। सवाल सही है लेकिन चूंकि संदर्भ पत्रकारिता का है और मामला सरकार से जुड़ा हुआ है इसलिए मैंने इसमें हस्तक्षेप करना जरूरी समझा।

मैं इस बात की पड़ताल में नहीं जाना चाहूंगा कि आपकी एनडीटीवी से नौकरी क्यों छूटी और क्यों आपको लोग ‘राष्ट्रवादी’ कह रहे हैं। मैं सिर्फ यहां आपके उठाए गए सवालों और रवीश के पत्र के संदर्भ तक ही अपने को सीमित रखूंगा। हालांकि इस दौर में जब युद्ध चल रहा है और मोर्चे बिल्कुल साफ हैं। और नतीजे के तौर पर हमले और हत्याएं तक हो रही हैं। ऐसे में कौन कहां खड़ा है ये बात बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे दौर में जबकि गौरी लंकेश से लेकर कुलबर्गी और पनसारे लेकर डाभोलकर तक की हत्याएं कर दी जा रही हैं। दलित लेखक कांचा इलैया को खुद को अपने घर में कैद कर लेना पड़ रहा है और सार्वजनिक तौर पर उन्हें सत्ता से जुड़े लोगों से हत्या की धमकियां मिल रही हैं। मुरुगन जैसे लेखक को खुद को मृत घोषित करना पड़ जा रहा है। और यह सब कुछ इसलिए है क्योंकि ये लोग खुलकर लिख और बोल रहे थे और रहे हैं। और उन्हें अपने इसी ‘कृत्य’ का खामियाजा भुगतना पड़ा था और पड़ रहा है। ऐसे में एक लिखने और बोलने वाले पत्रकार ने अगर अपना ही काम एक दूसरे तरीके से किया है तो उस पर किसी को क्यों एतराज होना चाहिए? और एक पत्रकार होने के नाते आपकी स्वाभाविक जिम्मेदारी बनती थी कि आप उसके पक्ष में खड़े होते। लेकिन आप ने अपने लिए एक दूसरा पक्ष चुना।

चलिए लोकतंत्र है इसमें हर किसी को अपनी बात कहने की आजादी है। और विचारों को वैसे भी दबाया नहीं जाना चाहिए। उन्हें बाहर आने देने की स्वतंत्रता ही हमारे लोकतंत्र और संविधान की खूबसूरती है। जिसमें बोलने की आजादी को मौलिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है।

अगर आप रवीश के पत्र का जवाब दे रहे थे तो उसके पूरे संदर्भ को समझना चाहिए था और फिर उसमें उठाए गए सवालों के तुर्की ब तुर्की जवाब देने चाहिए थे। लेकिन आपने उसमें से अपनी पसंद कहिए या फिर सुविधा के मुताबिक चीजों को उठाया और अपने कुछ व्यक्तिगत अनुभवों के साथ मिलाकर उन्हें पेश कर दिया।

दरअसल ये आपका दोष नहीं है। पत्रकारिता में आयी नई पीढ़ी के लिए ये पेशा महज रोटी हासिल करने का एक साधन मात्र बनकर रह गया है। पत्रकारिता कोई मिशन है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए कुर्बानी भी दी जा सकती है। नौकरी जाने की बात तो दूर है। ये शायद ही कोई सोच पाता होगा। और तब आपके लिए रवीश का नौकरी जाने का संदर्भ सबसे बड़ा हो जाता है। लेकिन रवीश का पत्र पढ़िएगा तो उसमें नौकरी से ज्यादा अपनी हत्या की आशंका का जिक्र है। जिसमें उन्हें आये दिन धमकियां मिलती रहती हैं। लेकिन आपने उसका जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा। या फिर प्रधानमंत्री ऐसे घटिया और गलीच लोगों को ट्विटर पर फालो करते हैं इस पर आपने कोई राय जाहिर नहीं की। और अगर ये सब कुछ पीएम के संज्ञान में हो रहा है तब तो मामला और गंभीर हो जाता है। लेकिन आपने उसको कोई तवज्जो नहीं दी। रवीश की चिंता कोई गैरवाजिब चिंता नहीं है। पनसारे, दाभोलकर और हाल में गौरी लंकेश की हत्याओं ने उसको और पुष्ट करने का ही काम किया है।

जिस नौकरी को लेकर आपने सबसे ज्यादा कागज काला किया है उसको भी आपने बहुत सीमित दायरे में बांध दिया है। पत्रकारिता में नौकरी सिर्फ अपना पेट और बच्चा पालने का संदर्भ नहीं होता है। अगर सचमुच में कोई पत्रकार है तो उसके लिए अपने कलम की स्वतंत्रता सबसे बड़ी कसौटी होगी और इस कड़ी में वो जरूरत पड़ने पर खुद क्या अपने बीबी और बच्चों के कुर्बानी की हद तक जाने का जज्बा रखता होगा। लिहाजा यहां नौकरी को किसी पेट पालने के साधन की बजाय एक ऐसे प्लेटफार्म से वंचित होने के खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए जिसकी गैरमौजूदगी एक पत्रकार के तौर पर उनकी भूमिका को बहुत कम कर देगी। इससे रवीश का जो भी नुकसान हो उससे ज्यादा देश और समाज का नुकसान होगा। एनडीटीवी से हटने के बाद क्या रवीश को जीटीवी या फिर इंडिया टीवी नौकरी पर रखेंगे और उन्हें उतनी ही स्वतंत्रता देंगे? शायद आप भी इस सवाल का उत्तर जानते हैं। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा है। तब इस नुकसान की तरफ अगर वो इशारा कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत बात है?

आपने कहा कि भला पीएम को एक पत्रकार की नौकरी की क्या चिंता है। लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता में बैठे ऐसे लोग सरकार की आंख का कांटा बने हुए हैं। सरकार के गठन के बाद बारी-बारी से ऐसे लोगों को ठिकाने लगाया जा रहा है। पिछले तीन सालों का इतिहास मीडिया पर सरकार और सरकार समर्थित कारपोरेट के कसते शिकंजे का इतिहास है। और उसमें ऐसे पत्रकारों को चुन-चुन कर बाहर फेंका गया है। एनडीटीवी ने भी इस काम को किया है। एक दौर में एनडीटीवी ने भी सरकार से समझौते की कोशिश के तहत कुछ ऐसे फैसले लिए थे। जिसमें बरखा का जाना भी उसी का हिस्सा बताया जाता है। पठानकोट की घटना के मसले पर एनडीटीवी पर लगाई गयी एक दिनी पाबंदी (जिसे बाद में सरकार को वापस लेना पड़ा था) के बाद उसने एक बार फिर कुछ इसी तरह की कोशिश की थी। जिसके तहत न केवल खबरों को सरकार की पक्षधरता के साथ चलाया गया था बल्कि रवीश को भी अपने शो में तब्दीली करने के लिए मजबूर कर कर दिया गया था। जिसको उसके दर्शकों ने भी उस दौरान महसूस किया था। हालांकि बाद में जब लगा कि सरकार फिर भी पसीजने वाली नहीं है तब एनडीटीवी फिर अपने पुराने रुख पर लौट आया।

दरअसल रवीश फेनामिना को समझने की जरूरत है। इसमें रवीश के बड़ा बनने में किसी और से ज्यादा परिस्थितियों का हाथ है। उत्पीड़न जब गहरा होता है तो उसके खिलाफ लड़ाई भी उतनी ही तीखी हो जाती है। और फिर उसकी अगुवाई करने वालों में नायक बनने की संभावना भी उतनी ही प्रबल हो जाती है। ये कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में इस दौर से हम गुजर चुके हैं। इमरजेंसी के दौरान अरुण शौरी और इंडियन एक्सप्रेस की पूरी एक कहानी है। जिसके बारे में आडवाणी का प्रेस और पत्रकारिता के बारे में वो वक्तव्य अक्सर दोहराया जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब उनसे झुकने के लिए कहा गया तो वो रेंगने लगे। ये काफी हद तक सच के करीब था। ऐसे ही दौर में इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका अकेले थे जिन्होंने झुकने से इंकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि राजस्थान से एक लोटा और डोरी लेकर दिल्ली आए थे और जरूरत पड़ी तो वही लेकर वापस चले जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे। और अगर आज रवीश ये कह रहे हैं कि मोतिहारी से एक टीन का बक्शा लेकर आए थे और उसी के साथ लौटने के लिए तैयार हैं। तब किसी को अगर उनमें अपने पेशे के प्रति मिशनरी प्रतिबद्धता की बजाय नौकरी की चिंता ज्यादा दिखती है तो ये उसकी दृष्टि का दोष है।

ऐसे में आज अगर एनडीटीवी ने कोई स्टैंड लिया है और उसमें रवीश जैसे लोग उसके अगुवा चेहरे बन रहे हैं तो इसमें पत्रकारिता, लोकतंत्र, संविधान, समाज और देश के पक्ष में सोचने वालों को भला क्या एतराज हो सकता है।

रही बात एनडीटीवी के भीतर के कामकाज और उसके प्रबंधकीय संचालन की तो इसके बारे में न तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई बड़ी जानकारी है और न ही बहुत कुछ कहने की स्थिति में हूं। लेकिन सामान्य परिस्थितियों के मुकाबले एनडीटीवी एक असमान्य दौर से गुजर रहा है। लिहाजा किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालने से पहले उसकी इन परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

एक दौर में अपने कर्मचारियों के वेतन और दूसरी सुविधाओं के लिहाज से उसे चंद बेहतर संस्थानों में गिना जाता था और उसकी मिसाल दी जाती थी। लेकिन अब जबकि चारों तरफ से उस पर हमले हो रहे हैं और सरकार का एकसूत्रीय काम उसे ध्वस्त करना रह गया है और इस लिहाज से उसके संसाधनों में हर स्तर पर कटौती हो रही है तब उसके लिए एक आपात स्थिति जैसी बात है। ऐसे में अगर वो किसी आपद धर्म जैसा व्यवहार कर रहा है तो उसे भी समझे जाने की जरूरत है। हां ये बात सही है कि रवीश को उसमें क्या और कैसा स्टैंड लेना चाहिए ये सवाल हो सकता है। लेकिन उस बड़े संदर्भ के दायरे में ही उसका उत्तर ढूंढा जाना चाहिए। आईबीएन-7 की छटनी और एनडीटीवी की छटनी में फर्क जरूर किया जाना चाहिए। आईबीएन-7 के पास न तो पूंजी का संकट था और न ही इस तरह का कोई दबाव। लेकिन एनडीटीवी एक वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। लिहाजा उसमें निकाले जाने वाले कर्मचारियों के प्रति दूसरे कर्मचारियों का रवैया एक सहानुभूति से ज्यादा और क्या हो सकता है? बावजूद इसके बताया जा रहा है कि निकलने वाले कर्मचारी खुद अपने पैकेज से संतुष्ट हैं।

हां ये बात जरूर है कि शायद कुछ जगहों पर रवीश स्टैंड न लिए हों या फिर उनके व्यक्तित्व में एक अहंकार का कोई पक्ष दिखा हो। इसके खतरे जरूर हैं। और अगर रवीश इसको नहीं समझ पाएंगे तो इतिहास में एक शख्सियत के तौर पर उनके लिए जो एक बड़ी संभावना बन रही है उससे वो वंचित हो जाएंगे। ये बात उन्हें भी समझनी होगी।

और हां आखिरी और जरूरी बात। अपने को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कहिए या फिर समाजशास्त्री और डाक्टर घोषित करते हुए आपने रवीश को बीमार घोषित कर दिया है। अमूमन तो इस तरह के व्यक्तिगत आरोप का सार्वजनिक विमर्श में कोई स्थान ही नहीं है। इसमें किसी तर्क और स्वस्थ पक्ष की बजाय सामने वाले की कुंठा ज्यादा दिखती है। लेकिन शायद एक धारा की सोच और उसके व्यवहार का तरीका ही यही है कि विरोधी पर व्यक्तिगत आक्षेप और चरित्र हनन के जरिये उसे चुप करा दिया जाए। बावजूद इसके आपके आरोप उत्तर की मांग करते हैं। इस दौर में जबकि देश और समाज में घृणा और नफरत फैलाने वाली पूरी एक बीमार सोच की धारा चल रही है जिसे सत्ता का खुला संरक्षण हासिल है। और वो न केवल देश को बल्कि पूरे समाज को धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग, वर्ण आदि अनादि हिस्से में बांट देना चाहती है। ऐसे में अगर कोई इसका विरोध कर रहा है और समाज में भाईचारे और सहिष्णुता की बात कर रहा है तो क्या उसे बीमार करार दिया जा सकता है? इसके उलट उसे सबसे ज्यादा संवेदनशील और स्वस्थ कहा जाएगा।

सच्चाई ये है कि इस घृणा, नफरत और मॉब हत्याओं के दौर में अगर कोई ‘बीमार’ (आप द्वारा परिभाषित) नहीं है तो वो जरूर सवालों के घेरे में है।

धन्यवाद।

आपका महेंद्र मिश्र

एक पत्रकार

जो ‘बीमार’ नहीं है वो सवालों के घेरे में हैं ! …. रवीश को पत्र लिखने वाले को एक पत्रकार का जवाब

सुशांत जी, दरअसल ये आपका दोष नहीं है। पत्रकारिता में आयी नई पीढ़ी के लिए ये पेशा महज रोटी हासिल करने का एक साधन मात्र बनकर रह गया है।

नई दिल्ली। एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार को पत्र लिखकर ‘बीमार’ बताने वाले टीवी एंकर/ मीडियाकर्मी सुशांत सिन्हा को एक अन्य पत्रकार महेंद्र मिश्र ने जवाब देते हुए कहा है कि मौजूदा दौर में जो ‘बीमार’ नहीं है वो सवालों के घेरे में हैं !

महेंद्र मिश्र ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लंबा उत्तर पोस्ट किया है। महेंद्र मिश्र की पोस्ट का मजमून निम्न है –

प्रिय सुशांत जी,

माफ करिएगा! आपने रवीश कुमार के पीएम को लिखे पत्र के जवाब में उन्हें एक पत्र लिखा है। अमूमन तो ये काम पीएमओ या फिर उसके किसी कारिंदे का बनता है। लेकिन उसकी जिम्मेदारी आपने उठायी है। कोई मुझसे भी पूछ सकता है कि आप क्यों पत्र लिख रहे हैं इसकी जिम्मेदारी तो रवीश की थी। सवाल सही है लेकिन चूंकि संदर्भ पत्रकारिता का है और मामला सरकार से जुड़ा हुआ है इसलिए मैंने इसमें हस्तक्षेप करना जरूरी समझा।

मैं इस बात की पड़ताल में नहीं जाना चाहूंगा कि आपकी एनडीटीवी से नौकरी क्यों छूटी और क्यों आपको लोग ‘राष्ट्रवादी’ कह रहे हैं। मैं सिर्फ यहां आपके उठाए गए सवालों और रवीश के पत्र के संदर्भ तक ही अपने को सीमित रखूंगा। हालांकि इस दौर में जब युद्ध चल रहा है और मोर्चे बिल्कुल साफ हैं। और नतीजे के तौर पर हमले और हत्याएं तक हो रही हैं। ऐसे में कौन कहां खड़ा है ये बात बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे दौर में जबकि गौरी लंकेश से लेकर कुलबर्गी और पनसारे लेकर डाभोलकर तक की हत्याएं कर दी जा रही हैं। दलित लेखक कांचा इलैया को खुद को अपने घर में कैद कर लेना पड़ रहा है और सार्वजनिक तौर पर उन्हें सत्ता से जुड़े लोगों से हत्या की धमकियां मिल रही हैं। मुरुगन जैसे लेखक को खुद को मृत घोषित करना पड़ जा रहा है। और यह सब कुछ इसलिए है क्योंकि ये लोग खुलकर लिख और बोल रहे थे और रहे हैं। और उन्हें अपने इसी ‘कृत्य’ का खामियाजा भुगतना पड़ा था और पड़ रहा है। ऐसे में एक लिखने और बोलने वाले पत्रकार ने अगर अपना ही काम एक दूसरे तरीके से किया है तो उस पर किसी को क्यों एतराज होना चाहिए? और एक पत्रकार होने के नाते आपकी स्वाभाविक जिम्मेदारी बनती थी कि आप उसके पक्ष में खड़े होते। लेकिन आप ने अपने लिए एक दूसरा पक्ष चुना।

चलिए लोकतंत्र है इसमें हर किसी को अपनी बात कहने की आजादी है। और विचारों को वैसे भी दबाया नहीं जाना चाहिए। उन्हें बाहर आने देने की स्वतंत्रता ही हमारे लोकतंत्र और संविधान की खूबसूरती है। जिसमें बोलने की आजादी को मौलिक अधिकार का दर्जा मिला हुआ है।

अगर आप रवीश के पत्र का जवाब दे रहे थे तो उसके पूरे संदर्भ को समझना चाहिए था और फिर उसमें उठाए गए सवालों के तुर्की ब तुर्की जवाब देने चाहिए थे। लेकिन आपने उसमें से अपनी पसंद कहिए या फिर सुविधा के मुताबिक चीजों को उठाया और अपने कुछ व्यक्तिगत अनुभवों के साथ मिलाकर उन्हें पेश कर दिया।

दरअसल ये आपका दोष नहीं है। पत्रकारिता में आयी नई पीढ़ी के लिए ये पेशा महज रोटी हासिल करने का एक साधन मात्र बनकर रह गया है। पत्रकारिता कोई मिशन है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए कुर्बानी भी दी जा सकती है। नौकरी जाने की बात तो दूर है। ये शायद ही कोई सोच पाता होगा। और तब आपके लिए रवीश का नौकरी जाने का संदर्भ सबसे बड़ा हो जाता है। लेकिन रवीश का पत्र पढ़िएगा तो उसमें नौकरी से ज्यादा अपनी हत्या की आशंका का जिक्र है। जिसमें उन्हें आये दिन धमकियां मिलती रहती हैं। लेकिन आपने उसका जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा। या फिर प्रधानमंत्री ऐसे घटिया और गलीच लोगों को ट्विटर पर फालो करते हैं इस पर आपने कोई राय जाहिर नहीं की। और अगर ये सब कुछ पीएम के संज्ञान में हो रहा है तब तो मामला और गंभीर हो जाता है। लेकिन आपने उसको कोई तवज्जो नहीं दी। रवीश की चिंता कोई गैरवाजिब चिंता नहीं है। पनसारे, दाभोलकर और हाल में गौरी लंकेश की हत्याओं ने उसको और पुष्ट करने का ही काम किया है।

जिस नौकरी को लेकर आपने सबसे ज्यादा कागज काला किया है उसको भी आपने बहुत सीमित दायरे में बांध दिया है। पत्रकारिता में नौकरी सिर्फ अपना पेट और बच्चा पालने का संदर्भ नहीं होता है। अगर सचमुच में कोई पत्रकार है तो उसके लिए अपने कलम की स्वतंत्रता सबसे बड़ी कसौटी होगी और इस कड़ी में वो जरूरत पड़ने पर खुद क्या अपने बीबी और बच्चों के कुर्बानी की हद तक जाने का जज्बा रखता होगा। लिहाजा यहां नौकरी को किसी पेट पालने के साधन की बजाय एक ऐसे प्लेटफार्म से वंचित होने के खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए जिसकी गैरमौजूदगी एक पत्रकार के तौर पर उनकी भूमिका को बहुत कम कर देगी। इससे रवीश का जो भी नुकसान हो उससे ज्यादा देश और समाज का नुकसान होगा। एनडीटीवी से हटने के बाद क्या रवीश को जीटीवी या फिर इंडिया टीवी नौकरी पर रखेंगे और उन्हें उतनी ही स्वतंत्रता देंगे? शायद आप भी इस सवाल का उत्तर जानते हैं। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा है। तब इस नुकसान की तरफ अगर वो इशारा कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत बात है?



आपने कहा कि भला पीएम को एक पत्रकार की नौकरी की क्या चिंता है। लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता में बैठे ऐसे लोग सरकार की आंख का कांटा बने हुए हैं। सरकार के गठन के बाद बारी-बारी से ऐसे लोगों को ठिकाने लगाया जा रहा है। पिछले तीन सालों का इतिहास मीडिया पर सरकार और सरकार समर्थित कारपोरेट के कसते शिकंजे का इतिहास है। और उसमें ऐसे पत्रकारों को चुन-चुन कर बाहर फेंका गया है। एनडीटीवी ने भी इस काम को किया है। एक दौर में एनडीटीवी ने भी सरकार से समझौते की कोशिश के तहत कुछ ऐसे फैसले लिए थे। जिसमें बरखा का जाना भी उसी का हिस्सा बताया जाता है। पठानकोट की घटना के मसले पर एनडीटीवी पर लगाई गयी एक दिनी पाबंदी (जिसे बाद में सरकार को वापस लेना पड़ा था) के बाद उसने एक बार फिर कुछ इसी तरह की कोशिश की थी। जिसके तहत न केवल खबरों को सरकार की पक्षधरता के साथ चलाया गया था बल्कि रवीश को भी अपने शो में तब्दीली करने के लिए मजबूर कर कर दिया गया था। जिसको उसके दर्शकों ने भी उस दौरान महसूस किया था। हालांकि बाद में जब लगा कि सरकार फिर भी पसीजने वाली नहीं है तब एनडीटीवी फिर अपने पुराने रुख पर लौट आया।

दरअसल रवीश फेनामिना को समझने की जरूरत है। इसमें रवीश के बड़ा बनने में किसी और से ज्यादा परिस्थितियों का हाथ है। उत्पीड़न जब गहरा होता है तो उसके खिलाफ लड़ाई भी उतनी ही तीखी हो जाती है। और फिर उसकी अगुवाई करने वालों में नायक बनने की संभावना भी उतनी ही प्रबल हो जाती है। ये कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में इस दौर से हम गुजर चुके हैं। इमरजेंसी के दौरान अरुण शौरी और इंडियन एक्सप्रेस की पूरी एक कहानी है। जिसके बारे में आडवाणी का प्रेस और पत्रकारिता के बारे में वो वक्तव्य अक्सर दोहराया जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब उनसे झुकने के लिए कहा गया तो वो रेंगने लगे। ये काफी हद तक सच के करीब था। ऐसे ही दौर में इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका अकेले थे जिन्होंने झुकने से इंकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि राजस्थान से एक लोटा और डोरी लेकर दिल्ली आए थे और जरूरत पड़ी तो वही लेकर वापस चले जाएंगे लेकिन पीछे नहीं हटेंगे। और अगर आज रवीश ये कह रहे हैं कि मोतिहारी से एक टीन का बक्शा लेकर आए थे और उसी के साथ लौटने के लिए तैयार हैं। तब किसी को अगर उनमें अपने पेशे के प्रति मिशनरी प्रतिबद्धता की बजाय नौकरी की चिंता ज्यादा दिखती है तो ये उसकी दृष्टि का दोष है।

ऐसे में आज अगर एनडीटीवी ने कोई स्टैंड लिया है और उसमें रवीश जैसे लोग उसके अगुवा चेहरे बन रहे हैं तो इसमें पत्रकारिता, लोकतंत्र, संविधान, समाज और देश के पक्ष में सोचने वालों को भला क्या एतराज हो सकता है।

रही बात एनडीटीवी के भीतर के कामकाज और उसके प्रबंधकीय संचालन की तो इसके बारे में न तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई बड़ी जानकारी है और न ही बहुत कुछ कहने की स्थिति में हूं। लेकिन सामान्य परिस्थितियों के मुकाबले एनडीटीवी एक असमान्य दौर से गुजर रहा है। लिहाजा किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालने से पहले उसकी इन परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

एक दौर में अपने कर्मचारियों के वेतन और दूसरी सुविधाओं के लिहाज से उसे चंद बेहतर संस्थानों में गिना जाता था और उसकी मिसाल दी जाती थी। लेकिन अब जबकि चारों तरफ से उस पर हमले हो रहे हैं और सरकार का एकसूत्रीय काम उसे ध्वस्त करना रह गया है और इस लिहाज से उसके संसाधनों में हर स्तर पर कटौती हो रही है तब उसके लिए एक आपात स्थिति जैसी बात है। ऐसे में अगर वो किसी आपद धर्म जैसा व्यवहार कर रहा है तो उसे भी समझे जाने की जरूरत है। हां ये बात सही है कि रवीश को उसमें क्या और कैसा स्टैंड लेना चाहिए ये सवाल हो सकता है। लेकिन उस बड़े संदर्भ के दायरे में ही उसका उत्तर ढूंढा जाना चाहिए। आईबीएन-7 की छटनी और एनडीटीवी की छटनी में फर्क जरूर किया जाना चाहिए। आईबीएन-7 के पास न तो पूंजी का संकट था और न ही इस तरह का कोई दबाव। लेकिन एनडीटीवी एक वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। लिहाजा उसमें निकाले जाने वाले कर्मचारियों के प्रति दूसरे कर्मचारियों का रवैया एक सहानुभूति से ज्यादा और क्या हो सकता है? बावजूद इसके बताया जा रहा है कि निकलने वाले कर्मचारी खुद अपने पैकेज से संतुष्ट हैं।

हां ये बात जरूर है कि शायद कुछ जगहों पर रवीश स्टैंड न लिए हों या फिर उनके व्यक्तित्व में एक अहंकार का कोई पक्ष दिखा हो। इसके खतरे जरूर हैं। और अगर रवीश इसको नहीं समझ पाएंगे तो इतिहास में एक शख्सियत के तौर पर उनके लिए जो एक बड़ी संभावना बन रही है उससे वो वंचित हो जाएंगे। ये बात उन्हें भी समझनी होगी।



और हां आखिरी और जरूरी बात। अपने को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कहिए या फिर समाजशास्त्री और डाक्टर घोषित करते हुए आपने रवीश को बीमार घोषित कर दिया है। अमूमन तो इस तरह के व्यक्तिगत आरोप का सार्वजनिक विमर्श में कोई स्थान ही नहीं है। इसमें किसी तर्क और स्वस्थ पक्ष की बजाय सामने वाले की कुंठा ज्यादा दिखती है। लेकिन शायद एक धारा की सोच और उसके व्यवहार का तरीका ही यही है कि विरोधी पर व्यक्तिगत आक्षेप और चरित्र हनन के जरिये उसे चुप करा दिया जाए। बावजूद इसके आपके आरोप उत्तर की मांग करते हैं। इस दौर में जबकि देश और समाज में घृणा और नफरत फैलाने वाली पूरी एक बीमार सोच की धारा चल रही है जिसे सत्ता का खुला संरक्षण हासिल है। और वो न केवल देश को बल्कि पूरे समाज को धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग, वर्ण आदि अनादि हिस्से में बांट देना चाहती है। ऐसे में अगर कोई इसका विरोध कर रहा है और समाज में भाईचारे और सहिष्णुता की बात कर रहा है तो क्या उसे बीमार करार दिया जा सकता है? इसके उलट उसे सबसे ज्यादा संवेदनशील और स्वस्थ कहा जाएगा।

सच्चाई ये है कि इस घृणा, नफरत और मॉब हत्याओं के दौर में अगर कोई ‘बीमार’ (आप द्वारा परिभाषित) नहीं है तो वो जरूर सवालों के घेरे में है।

धन्यवाद।

आपका महेंद्र मिश्र

एक पत्रकार

About हस्तक्षेप

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