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Manisha Kulshreshtha's novel 'Mallika'
मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास 'मल्लिका',

शुद्ध रूप से एक विधवा की प्रेम कथा है, प्रणय-प्रेम गाथा है मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘मल्लिका’

भारतेन्दु बाबू के प्रणय-प्रेम की एक कथा मल्लिका

आज मनीषा कुलश्रेष्ठ का हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘मल्लिका’ (Manisha Kulshreshtha’s novel ‘Mallika’) पढ़ गया। मल्लिका, बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की ममेरी बहन, बंगाल के एक शिक्षित संभ्रांत घराने की बाल विधवा (child widow)। तत्कालीन बंगाली मध्यवर्ग (Bengali middle class) के संस्कारों के अनुरूप जीवन बिताने के लिये काशी को चुनती है। संयोग से काशी में वह भारतेन्दु हरिश्चंद्र (Bharatendu Harishchandra) के मकान के पिछवाड़े की गली के सामने के मकान में ठहरती है। मल्लिका के यौवन की झलक और साहित्यानुराग ने भारतेन्दु बाबू को सहज ही अपनी ओर खींच लिया। दोनों के प्रणय-प्रेम का यह आख्यान भारतेन्दु बाबू की असमय मृत्यु तक चलता है। काशीवासी मल्लिका अंत में वृंदावनवासी बनने के लिये रवाना हो जाती है !

यह है भारतेन्दु बाबू की बंगाली प्रेमिका मल्लिका पर केन्द्रित इस उपन्यास के कथानक का मूल ढांचा। इस ढांचे को देखने से ही साफ हो जाता है कि बांग्ला नवजागरण (Bengali Renaissance) की पीठिका से आई मल्लिका का हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु से संपर्क के बावजूद इस प्रणय कथा में उनके स्वतंत्र चरित्र के विकास की कोई कहानी नहीं बनती दिखाई देती है। यह किसी खास परिपार्श्व के संसर्ग से बनने-बिगड़ने वाले चरित्र की कथा नहीं है जो अपने जीवन संघर्षों और अन्तरद्वंद्वों की दरारों से अपने समय और समाज को भी प्रकाशित करता है। यह शुद्ध रूप से एक विधवा की प्रेम कथा है, प्रणय-प्रेम गाथा है, जिसका रूपांतरण उसके काशीवास से वृंदावनवास में स्थानांतरण तक ही होता है। एक स्वाधीन प्रेमी पुरुष की जीवन-लीला का पार्श्व चरित्र।

प्रणय — सचमुच इसकी कथाओं का भी कोई अंत नहीं हुआ करता है। इसकी सघनता एक स्वायत्त, समयोपरि सर्वकालिक सत्य का संसार रचती है, ऐसे एकांतिक सत्य का जो दो प्रेमियों का पूरी तरह से अपना जगत होता है। समाज जो कुल, क्रम की श्रृंखलाओं को मानता है, प्रेम की ऐसी एकांतिक सर्वकालिकता पर सवाल करता है ; स्त्री-पुरुष के बीच के दैहिक संबंधों को अलग सांस्कृतिक स्वीकृति देने से परहेज करता है। आज वैसे ही विरह प्रेम को मध्ययुगीन खोज बताने वाले कम नहीं है। इसे स्त्रियों का विषय भी कहा जाता है। लेकिन पुरुष प्रणय के प्रति उदासीन नहीं बल्कि उत्साहित ही रहता है — इसी सत्य के आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों की वासना और सुख सर्वकालिक सत्य है।

प्रणय-निवेदन के असंख्य और पूरी तरह से अलग-अलग रूप हो सकते हैं, लेकिन यह स्वयं में एक सत्य की अनुभूति का भाव है। प्रणय कथाओं के स्वरूप मूलत: इसके सामाजिक परिप्रेक्ष्य के भेदों पर टिके होने पर भी इसके अपने जगत का आधारभूत अभेद एक एकांतिक, स्वायत्त भाव होता है। मनुष्य के सामान्य क्रिया-कलापों के बीच दो व्यक्तियों का, एक युगल का अलग टापू — ‘नदी के द्वीप’।

यही वजह है कि लेखकों का एक वर्ग आपको ऐसा मिलेगा जो अक्सर सिर्फ प्रणय-प्रेम कथाएं ही लिखता है। वे जीवन भर प्रणय की अनुभूतियों को व्यक्त करने के नानाविध अलंकारों, भाव-भंगिमाओं से लेकर काम क्रिया तक के प्रकरणों की अभिव्यक्ति को साध कर उसे अलग-अलग स्थानिकताओं की लाक्षणिकताओं के साथ उतारते रहते हैं। सारी फार्मूलाबद्ध हिंदी फिल्मों की शक्ति भी इसी प्रणय के जगत की एकांतिकता के सत्य से तैयार होती है। इन प्रणय कथाओं में आम तौर पर स्थानिक विशिष्टता को उकेरने के लिये इकट्ठा किये गये सारे अनुषंगी उपादान लगभग महत्वहीन होते हैं, मूल होता है प्रणय के अपने जगत के उद्वेलनों में पाठक-दर्शक को डुबाना-तिराना।

लेखक प्रणय के इस उद्वेलन के अनुरूप ही भौतिक परिवेश को भास्वरित करता है, मसलन् इसी उपन्यास में —

“ ‘धिक्क…’ कहकर उनके हाथ से पन्ना छीनने लगी। उन्होंने उसे बाह से थाम लिया मानो वहीं पर सारा मनोभाव संप्रेषित हो चुका था। आगे बात करना असंभव हो रहा था। बातें बस आँखों ही आँखों में थीं कभी अपेक्षा से देखती आँखें तो कभी शर्म से झुकती आंखें। दोनों के बीच जो लहर प्रवाहित हो रही थी उसे दोनों महसूस कर रहे थे और एक उत्कट आकांक्षा उफान मारने लगी थी। लैंप की बत्तियां नीची हो गईं…छाया और प्रकाश परछाइयों का मद्धिम जादू नींद से जाग गया। वह नैसर्गिक निकटता और विश्वास ही था कि वह उस दिन दैहिक रूप से उनके करीब आ गई। पहला दैहिक संसर्ग…। पहली-पहली तुष्टि।…तेज हवा वाली रात थी, मल्लिका के मन का संशय मीठे अनुनाद में बदल गया। चंद्रमा क्षितिज से ऊपर उठ गया था। संकोच के बंध टूट रहे थे।” (पृष्ठ – 85)

इतनी ही सुनिश्चित होती है इस एकांतिक जगत के युगल की शंकाएँ, अंतरबाधाएं —

“मैं आरंभ से जानती हूँ कि आप आधिपत्य की वस्तु नहीं हो। आपसे आकृष्ट हो मैंने सामाजिक रीतियों को तोड़ा है। संसार के प्रति नहीं अपने हेतु अपराध किया है।” (पृष्ठ – 102)

“मैंने क्या बुरा किया उस आलीजान को दूसरे के कोठे से उठा कर घर खरीद दिया। उसे शुद्ध कर माधवी बना दिया। अब वह मेरे संरक्षण में है, अब वह केवल मुजरों में जाती है। महफिलों में गाती है।’

“मल्लिका बुझ गई। संरक्षण, संरक्षिता, रक्षिता !!” (पृष्ठ – 104)

इसी प्रकार तयशुदा होता है ऐसे लेखन में भाषाई अतिरेक। देखिए मल्लिका के घर की चारदीवारी में प्रणय के दृश्य का ब्रह्मांड-व्यापी स्वरूप —

“ज्यू के मांसल अधर पहली बार मल्लिका के अधरों के अधीन थे। सूर्यास्त हो ही रहा था, वातावरण में दूर-दूर तक रंगराग छा गया था। गवाक्ष से भीतर आते समीर में चंपई गंध थी। धरती और ब्रह्मांड एक-दूसरे के विपरीत गति में संचालित थे। इस विचित्र घूर्णन में प्रकृति भ्रमित-सी थी। पक्षी नीड़ों की ओर लौटते हुए चुप-से थे।” (पृष्ठ – 133)

और माणिकमोहन कुंज के प्राचीन मंदिर के अलौकिक वातावरण में हरिश्चन्द्र और मल्लिका के आपस में मालाओं के आदान-प्रदान के बाद के भावोद्वेलन का बयान —

“क्या हुआ जो मैं आज तुम पर भर-भर अंजुरियाँ मंदार पुष्प न बरसा सकी, तुम्हें तो इन सूखे बेलपत्रों से रीझ जाना चाहिए था। तुममें और मुझमें घना अंतर है ! तुममें तो भर प्याला देने की क्षमता है, वो तो मैं हूँ, बूँद-बूँद के लिए तृषित चातक।’

“मल्लिका मैं तुम्हें प्रकृति और परमेश्वर द्वारा प्रदत्त भीतरी और बाहरी सौंदर्य की विपुल राशि मानता हूँ,’ ज्यू उसे अंक में भरते हुए बोले।” (पृष्ठ – 143)

और इन सबमें जो अंतरनिहित हैं, वह है प्रणय प्रेम के दैहिक और भावनात्मक सत्य की शाश्वतता।

“ ‘उई, केश मत खींचिए ना, जो भी हो, हम ऐसी ही मल्लिका है, ज्यू आपको हमें प्रेम करना होगा।’ निराले स्त्रैण ढंग से दीवार की ओर करवट ले कर, मान करते हुए मल्लिका बने हरिश्चन्द्र बोले।…हरिश्चन्द्र उधर मुख किए-किए मुस्कुराए। मल्लिका ने उनकी कमर पर हाथ रखा और उन्हें पलटा कर अपने दुर्बल बाहुबंद में भर लिया और ज्यू से बोली —’कुछ बोलोगी नहीं ?’

‘प्रेम में निरत युगल के बीच मौन ही तो बोलता है।…

‘हम तो आज वाचाल है, हमारे अधर बढ़ कर बंद कर दो न ज्यू,’ कह कर ज्यू ने मल्लिका को स्वयं पर गिरा लिया।” (पृष्ठ -132-133)

“क्या हुआ खल लोग तुझे मेरी आश्रिता कहते रहे…तुझे इससे क्या, तेरा प्रेमी और तू जिसकी सरबस है…उसने तो तुझे धर्म-गृहीता माना है। देखना…आगे ऐसे लोग भी उत्पन्न होंगे जो तेरा नाम आदर से लेंगे। मेरी और तेरी जीवन पद्धति समझेंगे। इस प्रेम के दर्शन को मान देंगे।”

दरअसल, सच्चा और अकूत प्रेम ही ऐसे प्रणय आख्यानों के सत्य की अनंतता का स्रोत होता है। उसमें कथा को मिथकीय और साथ ही नाटकीय रूप देने की क्षमता होती है। प्रणय का हर दृश्य उसके यथार्थ स्वरूप से काफी विशाल होता है, श्री कृष्ण के विराट रूप की तरह। इसीलिये मिथकीय होता है, ईश्वरीय कृपा और दिव्य नियति स्वरूप। इसमें स्थानिकता अथवा परिवेश के अन्य पहलू नितांत निर्रथक और अनुर्वर होते हैं। प्रणय से हट कर प्रेम के विछोह की दरारों से जो प्रकट होते हैं, जो पूरे कथानक को दूसरे फलक पर ले जाते हैं, उनका शुद्ध प्रणय कथाओं में कोई मूल्य नहीं होता। यहां भी नहीं है।

बहरहाल, देह और भाषाओं की आदमी की दुनिया में प्रेम के भुवन का सत्य भी कोई अलग या भिन्न नहीं है। प्रणय उसी के देह पक्ष की सच्चाई को विराट, मिथकीय, नाटकीय रूप देता है। ‘मल्लिका’ में लेखिका ने इसे ही साधने की एक और कोशिश की है।

भारतेन्दु बाबू के जीवन के अन्य सारे प्रसंग अथवा मल्लिका के पिता के संसार के बंगाल के तथ्य, नवजागरण की आधुनिक और क्रांतिकारी बातें सिर्फ उनके लिये ही मायने रखते हैं, जो उनसे पहले से ही परिचित है। ये सब उपन्यास के सजावटी अनुषंगी मात्र है। भारतेन्दु युग के बौद्धिक विमर्श यहां इसलिये भी निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि मल्लिका-भारतेन्दु के संबंधों में उनका कोई स्थान नहीं होता और मल्लिका की बंगाल की बलिष्ठ पृष्ठभूमि के बावजूद उसके लिये उन बातों का कोई बहुत ज्यादा अर्थ नहीं होता।

कहना न होगा, बंकिम युग की अनुभूतियों और भाषा का यह विन्यास उस युग के अपने सामाजिक अंतरविरोधों के व्यापक वितान से बाहर की एक स्वायत्त प्रणय की एकांतिक अनुभूति का जगत है। मल्लिका और हरिश्चन्द्र महज सुविधाजनक अवलम्ब हैं।

—अरुण माहेश्वरी

About अरुण माहेश्वरी

अरुण माहेश्वरी, प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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