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Home /  22 मार्च की कहानी : नहारी मिल जाएगी लेकिन आज आखिरी दिन है 

रॉबिन वर्मा

 मार्च की 22 तारीख थी। जैसे हर तारीख आती -जाती है वैसे 22 मार्च भी था। जिसको इतिहास शायद अपने पन्ने में नहीं समेटेगा और समेट भी नहीं सकता। वैसे यह सिर्फ मेरा अनुभव नहीं है न जाने कितनों की यादें जुड़ी होंगी मोबिन की नहारी की दुकान से।

सुबह के 11 बजे थे। सदर तहसील अपने रफ़्तार से चल रही थी। वकील अपने मुवक्किलों के केस में व्यस्त थे, जो खाली थे वो राजनीति के हार -जीत के समीकरण को सुलझाने में मशगूल थे।

बात जैसे ही नयी सरकार की आयी वैसे ही कुछ भक्त कसीदे पढ़ने में लग गए तो कुछ ने अपना विरोध जताना शुरू ही किया था कि एक भारी सी आवाज थोड़े धीरे से आयी तो लखनऊ से कबाब - नहारी को भी बंद कर दिया। कोई कसर मत छोड़ना सब बंद करवा के ही दम लीजियेगा।

पता नहीं किसी ने यह आवाज सुनी की नहीं। पर जैसे सुबह -सुबह कोई नहारी का नाम लेता है तो मोबिन की नहारी की याद आ जाती है।

इतना सुनने के बाद ख्याल आया कि तो मोबिन की दुकान भी बंद हो जाएगी क्या ?

शायद यह पहली बार था कि नहारी के बारे नहीं, मोबिन की दुकान के बारे में सोच रहा था। 

सदर तहसील से अकबरी गेट जाने में करीब 20 मिनट लगता है। आज का 20 मिनट कुछ ज्यादा लंबा था। मने जैसे लग रहा था कि मिनट घंटे तब्दील गया हो और डालीगंज के पुल का जाम तो पूछिये ही नहीं।

अकबरी गेट से अंदर जाते ही सवाल जेहन में तेजी से उठ रहा था कि क्या मोबिन की दुकान बंद हो गयी होगी। लग रहा था कि दिमाग कह रहा है की दुकान बंद होगी पर दिल कह रहा था नहीं खुली होगी।

खैर मोबिन की दुकान खुली थी। दिल और दिमाग की लड़ाई में दिल जीत गया था। भीड़ पहले से कुछ कम थी। देख कर राहत महसूस हुई।

कोने वाले मेज पर बैठा ही था कि 30 - 32 साल का आदमी आकर पूछा क्या लगा दूँ ? नहारी लाईये। बोलते वक्त लगा जैसे दिल बैठ रहा है।

नहारी मिल जाएगी लेकिन आज आखिरी दिन है। फिर नहीं मिल पायेगी।

वेटर की आवाज थोड़ी भारी हो गयी थी। 

नयी सरकार जैसे ही आयी पहला हमला खाने - पीने वालों पर हुआ।

बात को घूमा -फिरा के नहीं कहा जाये तो पहला हमला मुसलमानों पर है जिसमें कुछ और लोग पिस रहे हैं। जो सरकार की नज़र में मुसलमानों जैसे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए कि यह खाने -पीने की आज़ादी पर हमला है बल्कि इसको इस तरह से परखा जाये की यह हमला अभी मुसलमानों पर है जो "शायद" आगे कुछ लोगों पर होगा। बस दिक्कत इसी "शायद" से है। यह "शायद" ही वह च्रकव्यूह जिसको हम और आप नहीं समझ पा रहे है। अगर समझ पाते तो 112 साल की टुंडे और 44 साल की पुरानी मोबिन की दुकान बंद होने पर खुश नहीं होते बल्कि परेशान होते, चाहे आप कबाब - नहारी खाते हो या ना खाते हों।

 22 मार्च की कहानी : नहारी मिल जाएगी लेकिन आज आखिरी दिन है 

रॉबिन वर्मा

 मार्च की 22 तारीख थी। जैसे हर तारीख आती -जाती है वैसे 22 मार्च भी था। जिसको इतिहास शायद अपने पन्ने में नहीं समेटेगा और समेट भी नहीं सकता। वैसे यह सिर्फ मेरा अनुभव नहीं है न जाने कितनों की यादें जुड़ी होंगी मोबिन की नहारी की दुकान से।

सुबह के 11 बजे थे। सदर तहसील अपने रफ़्तार से चल रही थी। वकील अपने मुवक्किलों के केस में व्यस्त थे, जो खाली थे वो राजनीति के हार -जीत के समीकरण को सुलझाने में मशगूल थे।

बात जैसे ही नयी सरकार की आयी वैसे ही कुछ भक्त कसीदे पढ़ने में लग गए तो कुछ ने अपना विरोध जताना शुरू ही किया था कि एक भारी सी आवाज थोड़े धीरे से आयी तो लखनऊ से कबाब – नहारी को भी बंद कर दिया। कोई कसर मत छोड़ना सब बंद करवा के ही दम लीजियेगा।

पता नहीं किसी ने यह आवाज सुनी की नहीं। पर जैसे सुबह -सुबह कोई नहारी का नाम लेता है तो मोबिन की नहारी की याद आ जाती है।

इतना सुनने के बाद ख्याल आया कि तो मोबिन की दुकान भी बंद हो जाएगी क्या ?

शायद यह पहली बार था कि नहारी के बारे नहीं, मोबिन की दुकान के बारे में सोच रहा था। 

सदर तहसील से अकबरी गेट जाने में करीब 20 मिनट लगता है। आज का 20 मिनट कुछ ज्यादा लंबा था। मने जैसे लग रहा था कि मिनट घंटे तब्दील गया हो और डालीगंज के पुल का जाम तो पूछिये ही नहीं।

अकबरी गेट से अंदर जाते ही सवाल जेहन में तेजी से उठ रहा था कि क्या मोबिन की दुकान बंद हो गयी होगी। लग रहा था कि दिमाग कह रहा है की दुकान बंद होगी पर दिल कह रहा था नहीं खुली होगी।

खैर मोबिन की दुकान खुली थी। दिल और दिमाग की लड़ाई में दिल जीत गया था। भीड़ पहले से कुछ कम थी। देख कर राहत महसूस हुई।

कोने वाले मेज पर बैठा ही था कि 30 – 32 साल का आदमी आकर पूछा क्या लगा दूँ ? नहारी लाईये। बोलते वक्त लगा जैसे दिल बैठ रहा है।

नहारी मिल जाएगी लेकिन आज आखिरी दिन है। फिर नहीं मिल पायेगी।

वेटर की आवाज थोड़ी भारी हो गयी थी। 

नयी सरकार जैसे ही आयी पहला हमला खाने – पीने वालों पर हुआ।

बात को घूमा -फिरा के नहीं कहा जाये तो पहला हमला मुसलमानों पर है जिसमें कुछ और लोग पिस रहे हैं। जो सरकार की नज़र में मुसलमानों जैसे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए कि यह खाने -पीने की आज़ादी पर हमला है बल्कि इसको इस तरह से परखा जाये की यह हमला अभी मुसलमानों पर है जो "शायद" आगे कुछ लोगों पर होगा। बस दिक्कत इसी "शायद" से है। यह "शायद" ही वह च्रकव्यूह जिसको हम और आप नहीं समझ पा रहे है। अगर समझ पाते तो 112 साल की टुंडे और 44 साल की पुरानी मोबिन की दुकान बंद होने पर खुश नहीं होते बल्कि परेशान होते, चाहे आप कबाब – नहारी खाते हो या ना खाते हों।

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