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Why Modi Matters to Indias Divider in Chief

मिल गया-मिल गया टुकड़े टुकड़े गैंग का सही पता मिल गया

जब किसी राजनीतिक दल के प्रचारकों द्वारा उछाले गये जुमले को देश का प्रधानमंत्री दुहराने लगे तो यह निश्चित है कि या तो मामला बहुत गम्भीर है या प्रधानमंत्री गैर गम्भीर है।

तीन वर्ष पहले एक वीडियो एक छात्र संगठन द्वारा उछाला गया था, जिसमें देश के सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (Jawaharlal Nehru University) में कुछ युवा अफज़ल गुरु की वरसी (Afzal Guru’s death anniversary) पर नारे लगाते हुए दिख रहे हैं, जिनमें से एक नारा, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’, भी है।

कहा जाता है कि अफज़ल गुरु को फांसी मिलने के बाद जेएनयू के छात्रों का एक छोटा सा गुट जो संसद पर हुए हमले में अफज़ल गुरु को निर्दोष मान कर, प्रति वर्ष 9 फरबरी को यह खुला आयोजन करता रहा है। यही आयोजन उसने सन्दर्भित वर्ष 2016 में भी किया था। अंतर इतना था कि तब तक देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन चुकी थी।

उल्लेखनीय यह भी है कि जे एन यू में देश की श्रेष्ठतम युवा मेधा अध्ययन और शोध करती है और विभिन्न विचारों के पुष्प एक साथ खिल कर एक सही लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान के सच्चे विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।

इस विश्व विद्यालय की स्थापना के समय से ही यहाँ के छात्र संघ पर वामपंथी रुझान के छात्र संघों का प्रभुत्व रहा है जो भाजपा जैसे दक्षिणपंथी और काँग्रेस जैसे मध्यम मार्गी दलों व उनके छात्र संगठनों को अखरता रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही यह विश्व विद्यालय उनके निशाने पर आ गया था।

उल्लेखनीय है कि भाजपा नेता व राज्यसभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार बनते ही जेएनयू को बन्द करने की मांग रख दी थी। इस विश्व विद्यालय में सन्दर्भित वर्ष में एआईएसएफ [सीपीआई] छात्र संगठन के कन्हैया कुमार छात्र परिषद के अध्यक्ष थे, और आइसा [ सीपीआई एमएल] के छात्र संगठन की शहला रशीद उपाध्यक्ष थीं। अन्य पदों पर भी वापपंथी छात्र संगठन के छात्र पदाधिकारी थे।

जब सुनिश्चित तिथि को कश्मीरी छात्रों के गुट ने स्मृति कार्यक्रम का आयोजन किया तो संसद पर हमले के एक मृत्यु दण्ड प्राप्त आरोपी को देशद्रोही मानने वाले एबीवीपी [भाजपा] छात्र संगठन के लोगों ने पहले से वीडियोग्राफी की व्यवस्था के साथ उन्हें रोकने या उनसे टकराने की कोशिश की थी।

छात्रों के बीच झगड़े की खबर सुन कर कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेता भी उपस्थित हो गये थे। एबीवीपी ने इसे अवसर की तरह लिया और उसकी शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने जो केन्द्र सरकार के अधीन होती है, कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था और उन पर ही आरोप लगा दिया कि उन्होंने “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा इल्लाह” के नारे लगाये।

बाद में कोर्ट ने पाया कि कन्हैया के खिलाफ जो वीडियो प्रस्तुत किया गया था उसमें छेड़ छाड़ की गयी थी इसलिए कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी। यदि ऐसे नारे लगाये गये थे तो नारे लगाने वालों को पुलिस कभी गिरफ्तार नहीं कर सकी।

कन्हैया कुमार को जमानत के लिए ले जाते समय कुछ वकीलों ने पुलिस हिरासत में कन्हैया के साथ मारपीट की व कोर्ट परिसर में तिरंगे झंडे लहराये। इन्हीं वकीलों के फोटो भाजपा के बड़े बड़े मंत्रियों व नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये किंतु पुलिस हिरासत में कोर्ट ले जाते समय कन्हैया पर किये गये हमले के सन्दर्भ में की गयी किसी दण्डात्मक कार्यवाही की कोई खबर देश को नहीं मिली।

इस सब से देश भर में धारणा यह बनायी गयी कि वामपंथी व उसके छात्र संगठन के छात्र देश द्रोही हैं और वे देश के टुकड़े करना चाहते हैं। भले ही अदालत की ओर से उन्हें कोई सजा नहीं मिली किंतु भाजपा पक्ष की ओर से इन्हें लगातार ‘टुकड़े टुकड़े गैंग” की तरह सम्बोधित किया गया। यहाँ तक कि चुनावी प्रचार सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी इस जुमले का प्रयोग किया गया।

यह वैसा ही था कि जब भी कोई इस सरकार से सच जानने की कोशिश करता था तो उसे देशद्रोही कह दिया जाता था।

उल्लेखनीय यह भी है कि देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, लेखकों की हत्या के बाद जब सरकारी दल के संगठनों द्वारा हत्या के आरोपियों का पक्ष लिया गया, उनको संरक्षण दिया गया तो उसके विरोध में अपने पुरस्कार वापिस कर देने वाले देश के प्रतिष्ठित लोगों को ‘अवार्ड वापिसी गैंग’ (award wapsi gang) कह कर पुकारा गया और इस जुमले को चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी ने भी दुहराया।

कोई आन्दोलनकारी जब भी कोई नारा लगाता है तो वह चाहता है कि उसे और उसकी विचारधारा को उस नारे के साथ पहचाना जाये। कन्हैया कुमार जिस लोकतांत्रिक संगठन से सम्बन्धित था उसका राष्ट्रीय एकता से तो सम्बन्ध है किंतु वे किसी भी तरह से अलगाववाद से नहीं जुड़े हैं और न ही उनका ऐसा कोई इतिहास रहा है।

यह सब जानते हैं कि देश की सबसे प्रमुख इंटेलीजेंस संस्था के प्रमुख के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री को तो इस सच का पता ही होगा। इसके बाद भी अगर वे देश के वामपंथियों के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग और अवार्ड वापिसी गैंग जैसे जुमलों का प्रयोग करते हैं, तो यह शर्म की बात है, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री से चुनाव प्रचार में भी गलतबयानी की उम्मीद नहीं की जाती। किसी अन्य प्रधानमंत्री ने कभी ऐसी भाषा या गलत जानकारी का प्रयोग नहीं किया।

देशद्रोह के कानून (law of sedition) के गलत इस्तेमाल ने उस कानून का मखौल बना कर रख दिया है। कोर्ट का फैसला है कि एक लोकतांत्रिक देश में बिना किसी सैनिक तैयारी के सरकार के खिलाफ बोलना देशद्रोह नहीं होता। यदि किसी ने अति क्रोध में ऐसे नारे भी लगाये हैं तो उसे सजा देने के लिए दूसरी अनेक धाराएं हैं। बार-बार बात-बात में देशद्रोह का आरोप लगाना देश की सैनिक शक्ति का भी अपमान है।

दूसरी ओर यह सच है कि देश में विभाजन का खतरा बढ रहा है और उन असल ताकतों को पहचानने की जरूरत है जिनके कारण यह खतरा बढ रहा है। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में पाकिस्तान की मांग से पहले ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ का नारा आया था। यह नारा स्वयं में विभाजन के बीजारोपण करने वाला था, और हिन्दी के साथ मिल कर तो बड़े विभाजन के बीज बो रहा था। यही कारण था कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रभक्त महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन किया था और उसका मुख्यालय दक्षिण में बनाया था, जिससे दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को बढा कर राष्ट्रीय एकता अनायी जा सके।

आज एक ऐसी सरकार है जो बार-बार खुद की पहचान एक हिन्दूवादी सरकार की तरह कराने की कोशिश कर रही है। देश के अन्य अल्पसंख्यकों को जिस तरह से गौहत्या, लवजेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, आदि के नाम पर प्रताड़ित किया जाने लगा है और बात-बात में उन्हें पाकिस्तान जाने को कहा जाने लगा ह। इसका परिणाम यह हुआ कि एक बड़ी आबादी अपने घर में ही खुद को पराया महसूस करने लगी है।

इतना ही नहीं दलित जातियों को जिस तरह प्रताड़ित किया जाने लगा है, उससे लगता है कि गैरदलित जातियों के वर्चस्व के लोग सत्ता में हैं और वे कम होते रोजगार के अवसरों व सरकारी नौकरियों के कम होते जाने से जनित संभावित विरोध को आरक्षण से जोड़ना चाहते हैं, ताकि विरोध को विभाजित कर सकें।

उत्तरपूर्व में वर्षों से चल रहे अलगाववादी आन्दोलनों को इस दौरान नयी हवा मिली है। आदिवासियों द्वारा अपने जंगलों और जमीनों के दोहन के खिलाफ किये गये प्रतिरोध को पुलिस दमन से दबाये जाने के प्रकरणों में वृद्धि हुयी है। विरोध करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी कह कर उस दमन को सही ठहराया जाता है।

सीमा पर होने वाली हलचलों के समय पूरा देश एक साथ सरकार का सहयोग करता रहा है, किंतु अब देश के प्रमुख राजनीतिक दलों तक को सही सूचनाएं नहीं दी जा रही हैं, और पूछने पर उन्हीं को देशद्रोही व दुश्मन को खुश करने वाला बताया जाने लगा है।

अपने चुनावी लाभ के लिए जातियों के विभाजन का लाभ लेने के लिए जातिवादी आधार पर टिकिट दिये जाते हैं। साक्षी महाराज को लोधी वोटों के आधार पर, व निरंजन ज्योति को मल्लाह वोटों के आधार पत टिकिट दिया गया। ठाकुर दिग्विजय सिंह के वोटों को काटने के लिए प्रज्ञा ठाकुर को लेकर आये। जहाँ जातियों के आधार पर चुनाव होते हैं, वहाँ चुनावों के दौरान पड़ी दरारें बाद तक बनी रहती हैं।

हाल ही मैं शिक्षानीति में हिन्दी को अनिवार्य करने के नाम पर दक्षिण में सोये हुए हिन्दी विरोध को फिर से कुरेद दिया गया है। उल्लेखनीय है कि चुनावों के दौरान अपने भाषण में सुप्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर ने सही कहा था कि समाज को विभिन्न कारणों से विभाजित करने वाली टुकड़े टुकड़े गैंग तो सत्ता में बैठे हुए लोग हैं जो अपनी गलत नीतियों, व गलत राजनीति से टुकड़ों टुकड़ों में बाँट रही हैं। टाइम पत्रिका ने अगर नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को डिवाइडर इन चीफ (divider in chief) बताया है जो बिल्कुल निराधार तो नहीं है।

यह जरूरी है कि चुनाव हो जाने के बाद देश में पदारूढ सरकार चुनावी मूड से बाहर निकले व प्रधानमंत्री अपने विभाग में बैठे सैकड़ों प्रतिभाशाली अधिकारियों से प्राप्त जानकारी लेकर ही अपनी बात कहने की आदत डालें, जिससे उनके भाषणों में होने वाली त्रुटियों को देश की त्रुटियों में न गिना जाये। राष्ट्रीय एकता सलामत रहे।

वीरेन्द्र जैन

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Ram Puniyani राम पुनियानी, लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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